योग का डर

शैलश्री आलूर ‘श्लेषा’ 
बेंगलूरु (कर्नाटक राज्य)
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कहते हैं योगासन सेहत के लिए बहुत अच्छा और लाभदायक है। योग करने से लंबी उम्र के साथ साथ स्वास्थ्यपूर्ण और आरोग्यदायक जीवन जी सकते हैं। सबको योगा से लाभ ही है,पर न जाने क्यों योगा मुझसे कोसों दूर है! योगा से संबंधित मेरे जीवन में घटी एक नकारात्मक सन्निवेश या घटना को मैं जिंदगीभर नहीं भूल सकती। योगा का नाम सुनते ही आज भी मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। योगा सबको पसंद है,पर बचपन से लेकर मां-पिताजी के प्यार और लाड़लेपन ने मुझे इतना आलसी बना दिया कि मैं योगासन,भागना-दौड़ना इन सबसे कोसों दूर रही। मैंने बचपन से ही अपने शरीर को इतना कोमल बनाया कि,खाना-पीना,शाला जाना,पढ़ाई करना यह छोड़कर बाकी विषयों पर ज्यादा ध्यान नहीं देती थी।
ऐसे ही बचपन से लेकर बी.एड. करते समय तक नाजुक कली ही रही। इन सब कोमलता के कारण जीवन में एक ऐसा डर मन में बैठ गया है कि,सोचती हूं,कुछ न करूं,जैसी हूं,वैसे ही ठीक हूं।
बी.एड. खत्म करके आने के बाद मुझे एक अच्छी और जानी-मानी निजी शाला में नौकरी मिल गई। उस जगह पर शिक्षा और छात्रों के प्रति मेरा प्यार,विश्वास,लगन,सिखाने के तरीके यह सब वहां पर प्रबंधन के सदस्यों को अच्छे लगे। एक बार मुझे शाला से संबंधित जो भी कार्य बाहर प्रशिक्षण के तौर पर मिला, वहां पर मुझे जाना पड़ा।
प्रशिक्षण बेलगाम में था,तो मैं और मेरे साथ शाला के अन्य तीन शिक्षक भी इसके लिए चले गए,जो पंद्रह दिन के लिए था। वहां पर खाने-पीने,रहने की इतनी अच्छी व्यवस्था देखकर मुझे बहुत खुशी हुई। हर रोज शिक्षा संबंधित कक्षाएं होती थी,और खेल भी होते थे। साथ में संस्कृत की कक्षा भी होती थी। मैं सबमें दिलचस्पी दिखाते हुए भाग लेती। कभी-कभी हमें अनाथाश्रम, वृद्धाश्रम भी लेकर जाते थे,जहां पर अपने बारीक और कोमल स्वभाव के कारण मैं उनको देखते ही रो पड़ती।
उस दिन प्रशिक्षण का सातवां दिन था। बारह बज चुके थे,और चौथा काल चल रहा था। हमें सचेत कर दिया गया कि,अब सबको योगा करना है,तो अंदर ही अंदर घबराते हुए मेरा मुँह सिकुड़ने लगा। योगा की अवधि शुरू हो गई। योग की शिक्षिका कुछ सरल योग कराने लगी। पहले उन्होंने `पद्मासन` डालकर बैठने को कहाl मैंने बैठने के लिए पैर तो ऊपर ले लिया,पर ३-४ पल में ही सीधी बैठ गई। मैंने शिक्षिका से विनती की कि,चिकित्सक ने मुझे मना कर दिया है,तो कृपया चुप बैठने का अवकाश दें। उन्होंने सहमति दे दी। मैंने योग से बचने के लिए उन्हें झूठ बोला था। बात इतनी ही होती तो,इतना बड़ा विषय `संस्मरण` नहीं मिलता। अब `योग का डर` शीर्षक सार्थक होने के कारण कहती हूँ।
अब योग शिक्षिका हमें `ध्यान` के साथ `योग विश्रांति` के बारे में बताने लगी। ध्यान के साथ योग विश्रांति कराने से पहले ही वे सबको सचेत आर चुकी थी कि,जिनकी सेहत ठीक नहीं है,या रक्त चाप कम-ज्यादा होता है,वे इसे न करेंl मैंने सोचा-आराम से सोने का आसन है,मेरा कुछ बिगड़ेगा नहीं,तो मैंने भी इसे करना प्रारंभ कर दिया।
शिक्षिका ने बताया कि,जैसे मैं बताती जाती हूँ,उसे महसूस करते हुए उन शब्दों पर ध्यान देते हुए उसी में लीन हो जाओ। हम सब आँखें बंद करके सो गए।
पहले उन्होंने कहा कि-एक घना जंगल है,जहां पर पक्षियों की चहल-पहल है,वैसे ही आगे चलिए,चलते ही रहिएl कुछ देर बाद शिवजी का मंदिर आएगा। मंदिर के अंदर देखिए,शिवजी की एक बहुत बड़ी मूर्ति है। आप शिव की मूर्ति के सामने बैठ जाइए। भगवान शिवजी की आँखों को देखते रहिए,हां बहुत देर तक देखते रहिए……..l
मैं सब महसूस कर रही थी,उनकी आवाज भी मुझे सुनाई दे रही थी। जब मैंने शिवजी की आँखों को देखना शुरू किया तो बाहरी आवाज मेरे लिए बंद हो गई। अब सामने शिवजी की मूर्ति और मैं दो ही हैं। मेरा पूरा शरीर हल्का हो गया था। न मैं पृथ्वी पर थी,न ही आकाश में। मैं बीच में किसी चीज़ के सहारे के बिना ही सोई थी। मुझे लग रहा था कि,मैं स्वर्ग-नरक कहीं पर भी नहीं हूँ, पर मैं कहीं जा रही थी। लग रहा था,सारे भव-बंधन मुझसे छूट रहे हैं। मरने की शंका भी हुई। ध्यानाग्रस्त अवस्था में ही मैंने देखा कि मेरे अंदर की आत्मा भगवान शिव के हृदय में लीन हो गई है। एक अव्यक्त-सा भाव महसूस हो रहा है। मेरी सांस रुक गई थी।आँखें खोल नहीं पा रही हूँ। मेरी आत्मा के जाने के बाद मेरे परिवार के सदस्य,मित्र,गलीवाले सब छाती पीट-पीटकर रो रहे हैंl मैं कहना चाह रही हूं कि मैं यही हूं। मां को बार-बार बोल रही हूं-मां मैं यहीं हूं,पर कोई मुझे नहीं देख रहा है। मैंने अपने हाथों से मां को छूना चाहा,मगर छू न सकी। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि, क्या करूं ?? ओहहह! लिखते-लिखते कांप रही हूं अब भी।
अचानक से शिवजी के हृदय से एक ज्योति बाहर आई,और धीरे से आकर मेरे दिल में समा गई। मैंने जोर से एक बार सांस ली,और हौले से आँखें खोली,तो प्रशिक्षण की जगह योगा कक्षा के सभी शिक्षकगण मेरे पास बैठे थे। सभी के मुख पर घबराहट थी। योग गुरूमाता तो रो रही थी,सब मेरे पैर को गरम कर रहे थे,कुछ सहेलियां हाथ को मल रही थी। मुझे अजीब लगा। पूछने पर पता चला कि योगा को खत्म हुए पूरे पच्चीस मिनट हो गए थे,पर मैं ध्यान से उठी नहीं थी। सबके बोलने के बाद मुझे बहुत डर लगा। योगा शिक्षिका इसलिए डरी थी कि,अभी पांच-दस मिनट मैं जागी नहीं होती तो बहुत अजीब था,वह मेरी दिमागी हालत पर प्रभाव डाल सकता थाl वे डरी हुई थीं,कि कहीं मेरी हालत की वजह से उन्हें जेल न जाना पड़े। उन्होंने मुझसे विनती की कि,आज के बाद प्रशिक्षण खत्म होने तक मैं कुछ न करूं।
बाद में जब मैंने अकेली जाकर योग गुरूमाता को मेरे योग अनुभव के बारे में बताया तो सहसा वह विचलित हो गई और आँखों में आँसू लाते हुए कहा-तुम बहुत भाग्यवान हो कि,साक्षात शिवजी के हृदय में ज्योति जाकर वापस आने का अनुभव पा सकीl ऐसा हजारों में एक को नसीब होता है शैलश्री,पर उस अवस्था में तुम न जागी होती तो मेरा क्या होता ? अगर और कुछ देर तक तुम उठी नहीं होती तो हमेशा के लिए पागल बन सकती थी,और मैं इसे करवाने के लिए जिम्मेदार बनकर जेल में रहती।
मुझे तो एक अदभुत दुनिया का परिचय हुआ था। साथ में मर के फिर से जिंदा होने का अनुभव भी हुआ थाl यह भी डर था कि अगर मैं उसी दिन मरी होती तो मेरा क्या होता ?? इसी डर के कारण आज भी मैं योगा करने का साहस कभी नहीं करती,तो आप सब जान गए होंगे कि मैं योगा से क्यों डरती हूं। आप भी योगा करते समय जागृत रहिएगा।
परिचय-शैलश्री आलूर का साहित्यिक उपनाम-श्लेषा हैl आपकी जन्मतिथि २ सितंबर तथा जन्म स्थान-बादामी हैl वर्तमान में आप देवीनगर(बेंगलूरु)में निवासरत हैं,और यही स्थाई पता भी हैl कर्नाटक राज्य की निवासी शैलश्री आलूर ने एम.ए. और बी.एड. सहित एम.फिल. तथा पी.एच-डी की शिक्षा भी हासिल की है। आपका कार्य क्षेत्र-प्रौढ़ शाला में हिंदी भाषा शिक्षिका का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप अनेक कवि सम्मेलनों में भागीदारी करके सम्मानित हो चुकी हैं। आपकी लेखन विधा-तुकांत-अतुकांत,हाईकु,वर्ण पिरामिड,कहानी, लघुकथा,नाटक,संस्मरण,लेखन,रिपोर्ताज और गीत आदि है। आनलाइन स्पर्धा में आपको महादेवी वर्मा सम्मान(संस्मरण के लिए),प्रताप नारायण मिश्र सम्मान सहित खुर्रतुल-ए-हैदर सम्मान,मुन्शी प्रेमचंद सम्मान भी मिला हैl आप ब्लॉग पर भी कविताएं लिखती हैं। विशेष उपलब्धि एक मंच द्वारा `श्लेषा`,दूसरे मंच द्वारा `लता` उपनाम अलंकरण तथा `श्रेष्ठ समीक्षक` सम्मान मिलना है। आपकी लेखनी का उद्देश्य-मन की भावनाओं को कलम का रूप देना,साहित्य के जरिए समाज में प्रगति लाने की कोशिश करना और समाज में व्याप्त समस्याओं को बिंबित करके उनका हल करना हैl

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