रंगे सियारों से

डॉ.दिलीप गुप्ता
घरघोड़ा(छत्तीसगढ़)
********************************************************
आस तुम क्यों लगाए हो,उन रंगे सियारों से,
भरोसे का जो करते खून,उन नंगे सियारों से।

शहर जब डूबता हो रात से,काले अंधेरों में,
मियां बीबी-सा मिलना अपराधों का रंगे सियारों से।

झोपड़ी को महल औ’ भूख को रोटी मिलाने की,
जुबां से जब बकें,बच लो तुम इन रंगे सियारों से।

शहद-सा बोलें या मिश्री घोलें जनता के कानों,
समझ लो माल मोटा मिल रहा रंगे सियारों से।

मजहबी दंगे करा के वोटों की फसलें है बोता,
जनता बच के रहना तुम जरा रंगे सियारों से।

शपथ लें देशभक्ति जन सेवा राष्ट्र धर्मों की,
दोस्ती पूंजी वालों,स्मगलरों..रंगे सियारों से।

जिधर देखो उधर लहरा रहे दोरंगे-तिरंगे,
अब तो पत्ता नहीं हिलता बिना रंगे सियारों के।

शकुं से जिसको जीना है,किसी रंग में तो रंग जाए,

‘दिलीप’ अब तू भी मिल ले जा किन्हीं रंगे सियारों से॥
परिचयडॉ.दिलीप गुप्ता का साहित्यिक उपनाम `दिल` है। १७ अप्रैल १९६६ को आपका जन्म-घरघोड़ा,जिला रायगढ़ (छग) में हुआ हैl वर्तमान निवास घरघोड़ा स्थित हनुमान चौक में ही हैl छत्तीसगढ़ राज्य के डॉ.गुप्ता ने एम.डी.(मेडीसिन)और डीएसी की शिक्षा हासिल की हैl कार्यक्षेत्र में आप निजी चिकित्सा कार्य करते हैंl सामाजिक गतिविधि में अग्रणी होकर असहायों,गरीबों,बीमारों की हरसम्भव सहायता के साथ ही साहित्यिक सेवाएं-जन जागरण में भी तत्पर रहते हैं। आपकी लेखन विधा-गीत,ग़ज़ल तथा कविताएं हैंl प्रकाशन में खुद की `हे पिता`(ओ बाबूजी)पुस्तक व करीब 20 संकलनों में रचनाएं प्रकाशित हुई है। आपको प्राप्त सम्मान में-कला श्री २०१६,डॉ.अब्दुल कलाम सम्मान सहित साहित्य अलंकरण २०१६ और दिल्ली से `काब्य अमृत` सम्मान आदि ख़ास हैंl २०१६ में कवि सम्मेलन में `राष्ट्रीय सेवा सम्मान` ४ बार प्राप्त किया है। डॉ.दिलीप की लेखनी का उद्देश्य समाज और संसार से बुराइयों को समाप्त कर अच्छाइयों से जन-जन को वाकिफ कराना है।

Hits: 13

आपकी प्रतिक्रिया दें.