रहस्य कृति ‘अमृतांजलि’

अवधेश कुमार ‘अवध’
मेघालय
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पुस्तक समीक्षा…………………..
पुस्तक-अमृतांजलि (काव्य संग्रह) के रचनाकार श्री चन्द्रप्रकाश ‘रहस्य’ हैं। निरुपमा प्रकाशन(मेरठ)ने इस प्रथम संस्करण की कीमत बहुत कम रखी है। कुकुरमुत्ते सरीखे स्वयंभू छत्रप कवि एवं अस्तित्वहीन कविताओं की घनगर्जना से बच पाना प्राय: नामुमकिन है। साहित्य विस्तार करने के असफल प्रयास में विखराव के कगार पर खड़ा है। उपभोक्तावादी परिवेश में पला-बढ़ा मनुष्य जाने-अनजाने,चाहे-अनचाहे क्रय- विक्रय को विवश है। नैतिकता और सदाचार की अपेक्षा करना गुजरे जमाने की गुजरी बातों जैसी हैं। सामाजिक समस्या जनित कुसंस्कार नई पौध को अबोध काल में असमय ही लील रहा है। मानवता और मानव समाज से फिसलते हुए हम चले जा रहे हैं नर-मादा की पाशविक पद्धति की ओर…। इसी बीच तमस को चीरता हुआ एक रहस्यमय जुगनू चमक उठता है हमारे आस-पास हाथों में लेकर ‘अमृतांजलि’।
जब-जब तमसावृत समाज को उजाले की जरूरत पड़ी,एकमात्र साहित्य का ही द्वार खटखटाना पड़ा। साहित्य ही वह कल्पद्रुम है,जिससे हर हाल में क्षुधापूर्ति हो सकती है। काव्य में ही हमारी अन्तहीन पिपासा को तृप्ति मिलती है। इसी तृषा को तृप्त करने के लिए कवि, लेखक,सम्पादक एवं गौ,गीता व गायत्री के प्रचारक चन्द्रप्रकाश ‘रहस्य’ लेकर आए पैतीस कविताओं से सुसज्जित ‘अमृतांजलि’। अमृतांजलि के पावन गर्भ में भरा है माँ एवं माँ के रूपान्तरित रिश्ते का सदय अस्तित्व। कलमकार के शब्दों में,-“माँ केवल ‘माँ’ कहने भर तक सीमित नहीं है,बल्कि वह कभी बेटी तो कभी भगिनी, कभी अर्द्धांगिनी तो कभी प्रेयसी बनकर विभिन्न प्रकल्पों में हमारी सहायता करती ही रहती है…।” जीवन की पूरक व आधारशिला माँ से शुरु होकर उसके विविध रूपों से गुजरकर अमृतांजलि में सामाजिक समस्या व सम्बंधित समाधान तक पहुँचती है।
मैनपुरी(उत्तर प्रदेश) में एक जुलाई उन्नीस सौ अठत्तर को क्षत्रिय कुल में जन्म लेकर पत्रकारिता एवं विपणन में उच्च उपाधि धारण करके महाप्राण निराला की भाँति “लखकर अनर्थ आर्थिक पथ पर….” कभी नहीं गए,बल्कि सामाजिक बुराइयों एवं कुरीतियों के उन्मूलन में सक्रिय हैं। माँ रानी देवी और पिता देवेश चन्द्र को समर्पित अमृतांजलि वस्तुत: काव्यांजलि है जो आवश्यकतानुसार संत को परशुधारी राम बना देती है। सांस्कृतिक गौरव, सामाजिक मूल्य एवं नैतिक आचरण के अवमूल्यन के दौर में मृतप्राय मानवता को अमृतपान कराती है….पुनर्जीवन देती है।
कवि की ओजस्वी लेखनी यह साबित करने में सक्षम है कि,समाज में बदलाव के लिए ज्ञानात्मक,भावात्मक (कलात्मक) और क्रियात्मक तीनों पक्षों से हमें सबल,सक्षम और शिक्षित होना पड़ेगा और कवि का पूरा जोर इसी पर केन्द्रित है।
‘माँ’ कविता में कवि कहता है,-“वाणी में मीठा-मीठा अमृत,
सुनकर बालक हो जाता विस्मृत।
लगता जैसे हिन्दी में संस्कृत,
तन-मन सब हो जाए झंकृत॥”
‘समाज’ कविता में कवि सर्वथा अलग सोच रखता है,-“नारी कभी विधवा नहीं होती,
क्योंकि वह एक प्रकृति है।”
कुरीतियों से आहत होकर कवि व्यंग्य का तीर छोड़ देता है ‘बेटी’ कविता में,-“चींटी को मारना पाप,
बेटी को मारना धर्म।
क्यों कर रहा,जन-मानस कुकर्म ?”
सामाजिक कुरीतियों पर कवि का प्रहार,-“मत जाओ तुम, कहीं भी,
अत्याचार के दलदल में,
मत डूबो तुम कहीं भी,
सुरा-सुन्दरी के यौवन में,
सबका सहायतार्थ हूँ,
मैं यथार्थ हूँ।”
नारी,अश्लीलता,आहट,स्वार्थ और राज इस कृति की प्रमुख कविताएँ हैं।
समर्पण,सहृदयता,सद्भावना,उपदेश, सुझाव और चेतावनी द्वारा कवि अपने हृदय के उद्गार को जनमानस तक पहुँचाने में सक्षम हुए हैं। इस महायज्ञ में साथ-साथ है सरल, सटीक व सरस हिन्दी। कोई अलंकारिक चमत्कार नहीं, छंदों के चाबुक की मार नहीं, रसों की बलात् निष्पत्ति का प्रयोजन नहीं, बोलचाल के शब्दों के प्रवेश पर प्रतिबंध नहीं,बल्कि कविता में जीकर कवितामयी उद्भव है ‘अमृतांजलि’।

पढ़ते हुए न जाने कब तीन दर्जन पृष्ठों की इतिश्री हो जाती है तो पाठक ठगा-सा,अतृप्त-सा महसूस करता है और दिल से एक हूक निकलती है कि काश कुछ कविताएँ और होतीं! मुख पृष्ठ से पार्श्व पृष्ठ तक कविसम्पादक और प्रकाशक की श्रमसाध्य भूमिका परिलक्षित है। आइए,हम प्रबुद्ध पाठक की भूमिका को निभाएँ।
परिचय-अवधेश कुमार विक्रम शाह का साहित्यिक नाम ‘अवध’ है। आपका स्थाई पता मैढ़ी,चन्दौली(उत्तर प्रदेश) है, परंतु कार्यक्षेत्र की वजह से गुवाहाटी (असम)में हैं। जन्मतिथि पन्द्रह जनवरी सन् उन्नीस सौ चौहत्तर है। आपके आदर्श -संत कबीर,दिनकर व निराला हैं। स्नातकोत्तर (हिन्दी व अर्थशास्त्र),बी. एड.,बी.टेक (सिविल),पत्रकारिता व विद्युत में डिप्लोमा की शिक्षा प्राप्त श्री शाह का मेघालय में व्यवसाय (सिविल अभियंता)है। रचनात्मकता की दृष्टि से ऑल इंडिया रेडियो पर काव्य पाठ व परिचर्चा का प्रसारण,दूरदर्शन वाराणसी पर काव्य पाठ,दूरदर्शन गुवाहाटी पर साक्षात्कार-काव्यपाठ आपके खाते में उपलब्धि है। आप कई साहित्यिक संस्थाओं के सदस्य,प्रभारी और अध्यक्ष के साथ ही सामाजिक मीडिया में समूहों के संचालक भी हैं। संपादन में साहित्य धरोहर,सावन के झूले एवं कुंज निनाद आदि में आपका योगदान है। आपने समीक्षा(श्रद्धार्घ,अमर्त्य,दीपिका एक कशिश आदि) की है तो साक्षात्कार( श्रीमती वाणी बरठाकुर ‘विभा’ एवं सुश्री शैल श्लेषा द्वारा)भी दिए हैं। शोध परक लेख लिखे हैं तो साझा संग्रह(कवियों की मधुशाला,नूर ए ग़ज़ल,सखी साहित्य आदि) भी आए हैं। अभी एक संग्रह प्रकाशनाधीन है। लेखनी के लिए आपको विभिन्न साहित्य संस्थानों द्वारा सम्मानित-पुरस्कृत किया गया है। इसी कड़ी में विविध पत्र-पत्रिकाओं में अनवरत प्रकाशन जारी है। अवधेश जी की सृजन विधा-गद्य व काव्य की समस्त प्रचलित विधाएं हैं। आपकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी भाषा एवं साहित्य के प्रति जनमानस में अनुराग व सम्मान जगाना तथा पूर्वोत्तर व दक्षिण भारत में हिन्दी को सम्पर्क भाषा से जनभाषा बनाना है। 

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