राजनीति की बात करने से भागिए मत

हेमेन्द्र क्षीरसागर
बालाघाट(मध्यप्रदेश)
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राजनीति अब इतनी नागवार लगने लगी है कि राजनीति की बातें करने से लोग परेहज लगे हैं। तभी तो दुकानों में,कार्यालयों में,घरों में तख्ती लटका कर और समूहों में इत्तला देकर सजग किया जाने लगा है कि यहां राजनीति की बातें करना मना है। मना क्यों,बात ही तो कर रहे,उसमें हर्ज किसलिए ? हाँ,दिक्कत तो है इसलिए आनाकानी हो रही है। कारण भी जायज है ना,नीति का राज आज राज की नीति बन गई है,उसमें हरेक दल डुबकी लगाना चाहता है,पर जनता तू-तू,मैं-मैं से लथपथ इस मायावी दलदल में नहीं घुसना चाहती। भूल-भूलैया भरे माहौल की राजनीति से भरोसा जो उठने लगा है। उस पर अपनी-अपनी पीठ थपथपाई बात-बात पर बाँहें तानना मनाही का कारक बन गई है। तभी इससे बचें व बचाओ के बोल वचन गुंजार रहे हैं।
सावधान! इसी फेर में कोई इसके पचड़े में नहीं पड़ना चाहता क्योंकि नजरें हटी और दुर्घटना घटी की भांति राजनीति की बात में कब हो जाए मुक्का-लात,कोई कह नहीं सकता। ऐसे वाकिए घटित होना आम हो गए हैं। बतौर आए दिन कहीं ना कहीं राजनीति की नुक्ता-चीनी,नूरा-कुश्ती बनती जा रही है। बेतरतीब,राजनीति के ये दिन आने लगे कि आमजन इसकी बातचीत करने पर भी कतराने लगे हैं। वह राजनीति जो शुचिता,समानता और राष्ट्रनीति की द्योतक थी,इस दौर में बदनियत, जालसाजी और कूटनीति के दुष्चक्रों का मिथक बनती जा रही है। ये रवैया राजनीति जैसे पवित्र शब्दों को बर्बाद करके छोड़ेगा,जो लोक और तंत्र के लिए हरगिज ठीक नहीं है।
राजनीति का इतना बुरा समय आ गया है कि लोग इसके बारे में अनाप-शनाप राय जाहिर करने लगे हैं। नहीं,बिल्कुल नहीं राजनीति इतनी बुरी नहीं है कि इससे दूरी बनाई जाए,दूर रहेंगे तो दूरमभागी होगी। बेहतर अच्छी सम्मानजक अमली बातें कहकर अपनाने में नजदीकियां बढ़ेगी, तथा यह पहल देश और राजनीति दोनों का भला करेंगी। वो बात अलग है कि बुरे लोग राजनीति में आ गए हैं,इतर राजनीति बुरी लगने और दिखने लगी है। बरबस राजनीति तो गाली जैसी हो गई है,लोग नेताजी बोल कर ताने मारने लगे हैं। मतलब साफ-साफ समझ में आने लगा है कि हालिया राजनीति छल,कपट और षड्यंत्र बनकर रह गई है। या कहें साम, दाम,दंड और भेद की छलनीति जो भी नाम दे दो,कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला है।
लिहाजा,कृपया राजनीति नहीं!, की टोका-टाकी मुँह जबानी हो गई है,जो थमने के बजाए बढ़ते ही जा रही है। इसे रोकना ही जन,वतन और वक्त की नजाकत है लेकिन रुकेगी कैसे, इसका निदान हम सबको मिलकर निकालना होगा। वह मिलेगा अच्छे लोगों के राजनीति में आने से,राज की नीति की तिकड़म से बचने और आत्मा नहीं,अपितु मन की बात सुनने से। तब जाकर राजनीति की बातें करना मनाही नहीं,वरन् सुनाई होगी। आखिर! हम जब तक बात नहीं करेंगे,तब तक बात नहीं बनेगी। वो भी सकारात्मक,समयानुकूल तथा राष्ट्रहितैषी। फलीभूत सारगर्भित परिणाम निश्चित ही अवतरित होंगे।
कवायद में अगर-मगर को दिगर कर जिगर से राजनीतिक स्वच्छता महाभियान का परचम लहराना होगा। डगर के असर में पाक-साफ अंदर और नापाक-गंदे मनोयोगी राजदारी नेता बाहर का रास्ता नापेंगे,यही देश चाहता है। याद रहे,कोई माने या ना माने आखिरकार,राजनीति हमारी दिनचर्या के काफी इर्द-गिर्द रहकर हमारे जीवन को प्रभावित करती है। वास्ते राजनीति के रास्ते को बंद नहीं प्रवाहित रखने में हम सबकी भलाई निहित है। लिहाजा,राजनीति में अपनी सेवादारी, भागीदारी,जिम्मेदारी और जवाबदारी तन,मन,धन,वचन के साथ निर्वहन की बारी अब हमारी है।
अविरल,यहां यह देखना लाजमी है कि हममें से कितने जन प्रहरी, मदहोशी सियासतदारों के चुंगल से राजनिति को बचाने सामने आते हैं। नहीं तो किंतु-परंतु ना करें,बेहतर होगा कि फिर चलने दो जैसा चल रहा है वैसा। उस पर मौकापरस्त हुकमरानों के चाल,चरित्र और चेहरे की दुहाई देना बेईमानी के अलावा कुछ नहीं है। अलबत्ता समझदारी से नेतागिरी की दरबारी ही बात-बात की दमदारी कहलाएगी।

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