राजनीति समाज को आश्रित बना रही

प्रो.स्वप्निल व्यास
इंदौर(मध्यप्रदेश)
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भारत में राजनीतिक दल चुनाव के मौके पर ज्यादा से ज्यादा लोक-लुभावन वादे कर रहे हैं। पहले युवाओं को लुभाने के लिए लैपटॉप, साइकिल और अन्य सुविधाएं बांटने का वादा किया जाता था,अब स्मार्ट फोन और पेट्रोल आदि देने के वादे किए जा रहे हैं। उच्चतम न्यायालय का मानना है कि राजनीतिक दलों की ओर से किए जाने वाले ऐसे वादे कहीं न कहीं जनता को प्रभावित करते हैं। लोगों को भी लगने लगा है कि,अगर मुफ्त में कुछ हासिल होता है,तो उसे लेने में क्या बुराई है। 
चूंकि,ऐसे लोक-लुभावन वादे आर्थिक नियमों की अनदेखी करके किए जाते हैं,इसलिए उनका असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। हकीकत में इन तरीकों से हम एक ऐसे समाज को जन्म देंगे,जो उत्पादक नहीं बनकर,आश्रित होगा और इसका सीधा असर देश की पारिस्थितिकी और प्रगति,दोनों पर पड़ेगा। सवाल यह खड़ा होता है कि,इस अनैतिक राजनीति का हम कब तक साथ देते रहेंगे ? इस पर अंकुश लगाने का पहला दायित्व तो हम जनता पर ही है,पर शायद इसमें निर्वाचन आयोग को भी सख्ती से आगे आना होगा। निर्वाचन आयोग को देखना चाहिए कि,चुनावी घोषणा-पत्र मतदाताओं के मांग पत्रों के आधार पर तैयार हों। जाहिर है कि इससे समाज की प्राथमिकताओं को बल मिलेगा,और रेवड़ियों की शक्ल वाले मुद्दे स्वत: ही गायब हो जाएंगे।
आखिर जब न्याय पालिका बिगड़ती आबो-हवा पर सरकारों से सवाल पूछ सकती है,तो आवश्यक हो जाता है कि वह दलों के अनैतिक और असीमित प्रस्तावों यानी घोषणा-पत्रों पर भी नियंत्रण लगाए,क्योंकि इस तरह की अनैतिकता जनभावनाओं को तो भ्रमित करती ही है,साथ ही देश की दिशा और प्राथमिकता को भी बदलने का काम करती है।

परिचय-प्रो.स्वप्निल व्यास का निवास इंदौर में ही है। आपकी जन्मतिथि ३ जुलाई १९८४ तथा जन्म स्थान-इंदौर है।  मध्यप्रदेश राज्य के इंदौर वासी प्रो.स्वप्निल व्यास ने वाणिज्य में स्नातक पश्चात पत्रकारिता में भी स्नातक-स्नातकोत्तर उपाधि हासिल करने के साथ ही पीजीडीबीए,एमबीए,समाज कार्य विषय में एवं लोक प्रशासन में स्नातकोत्तर कर लिया है। आपका कार्य एक निजी महाविद्यालय में सहायक प्राध्यापक का है। सामाजिक गतिविधि-के अंतर्गत सामुदायिक परामर्शदाता का कार्य भी करते हैं। आपकी लेखन विधा-लेख और कविता है,जबकि प्रेरणा पुंज-माता-पिता हैं। स्वप्निल जी के लेखन का उद्देश्य-जागृति,संवाद के लिए स्वतन्त्र लेखन करते रहना है।

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