रात्रि वैवाहिक भोज बंद करने का संकल्प प्रशंसनीय,अन्य सुधार अपेक्षित

डॉ.अरविन्द जैन
भोपाल(मध्यप्रदेश)
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जबसे नव धनाडय लोगों का समाज में वर्चस्व हुआ है या बना है,तब से विसंगतियां बहुत होना शुरू हुई। आज समाज में समाज का स्थान नहीं है। समाज में पंचायत नामक संस्था का कोई अस्तित्व नहीं है। कौन हैं समाज में,जिनका व्यापार अनैतिक ढंग से चल रहा है या जिन्होंने अपने-आपको स्थापित करने का कब्ज़ा न किया हो। आज वे जबरदस्ती के नेता बन गए। पहले कोई भी सामाजिक कार्य,घर में शादी विवाह,शोक का काम होता था तब पंचायत सभा का आना अनिवार्य होता था,या समाज में कोई समस्या आती थी,या पारिवारिक विवाद तो पंचायत का हस्तक्षेप होता था। जब चुनाव ही हिंसा के आधार पर होता है,तब अहिंसा,प्रेम,शांति की बात करना अपने-आपमें बेमानी है। दूसरा अन्य जगहों से आकर रहने से और शहर का विस्तीर्ण होने से आपसी सम्पर्क कम होता है।
रात्रि भोज और विवाह आयोजन न करना समाज का यह कदम स्तुत्य है,पर कितने प्रभावकारी ढंग से क्रियान्वित होगा,यह भविष्य के गर्भ में छिपा है। वैसे यह कदम बहुत ही लाभप्रद है। सबसे पहले जीव हिंसा से बचाव,बिजली खर्च और अन्य दिखावा कम होना और शराब आदि के प्रचलन में रोक लगेगी। इससे अन्य समाजों में एक अच्छा सन्देश जाएगा कि जैन समाज अहिंसा के पालन में कितना जागरूक है। इसके अलावा यदि जैन समाज के बंधु अन्य समाज के आयोजनों में भी भोज न करें तो बहुत अच्छा कदम होगा,पर आजकल सब-कुछ चलता है,इससे हमारी शिथिलता के कारण हम रात्रि भोजन स्वीकार कर लेते हैं। यह कदम व्यक्तिगत के साथ जातिगत है।
हमारे समाज में अनेक विसंगतियां पनप रही हैं या चुकी हैं और अब उनका निराकरण संभव नहीं हो पा रहा है। सबसे पहले हमारे समाज में दहेज़ का चलन बहुत ऊंचाई पर है। हर लड़का वाला पढ़ी-लिखी नौकरी पेशा सुन्दर,सुशील लड़की चाहता है और उसके बाद दहेज़, जबकि लड़का वाला भी लड़की वाला होता है और उसकी कन्या सर्वगुण संपन्न होने के बाद भी नौकरीपेशा वाली होने पर भी यदि कोई दहेज़ मांगता है तब उसकी क्या प्रतिक्रिया होगी! वह नौकरीपेशा लड़की शादी के उपरान्त आपको लाखों रूपया कमाकर देगी,उसके उपरांत दहेज़ की मांग का क्या औचित्य है ? दूसरा कोई भी कन्या गरीब माँ-बाप की संतान है, तब समाज की क्या भूमिका होती है ?जब वह विजातीय सम्बन्ध स्थापित करती है तब चर्चा होती है,क्यों ? आज समाज से कोई मदद लेना बहुत टेढ़ी खीर है। जब कोई सहायता मांगने जाता है,तब अध्यक्ष,मंत्री और ट्रस्टी ऐसा व्यवहार करते हैं जैसे वह भिखारी हो। उसके बाद अध्यक्ष कहेंगे ,मंत्री से पूछेंगे और मंत्री अध्यक्ष से,पर मत मांगते समय नहीं पूछते यह प्रश्न ?उस समय सच्चे भिखारी होते हैं और बाद में दाता बनते हैं,इसलिए उससे- इससे पूछेंगे ? इस कारण लव जिहाद या अंतर्जातीय या अन्तर संप्रदाय सम्बन्ध हो रहे हैं। इसमें श्रेष्ठीजन भी अछूते नहीं हैं।
आज हम गरीबी की बात करते हैं और हमारे हज़ारों युवक-नवयुवतियां नौकरी की तलाश में दर-दर भटक रहे हैं। आज हमारे समाज में कितने उद्योगपति,कारखानेदार हैं समाज को नहीं मालूम,किस प्रकार का व्यापार है। उसमें यदि हम लोग योग्यता के आधार पर अपने लोगों को प्राथमिकता दें तो उससे समाज के लोग समाज में रहेंगे और कम से कम अपने धर्म की रीति-नीति का पालन करेंगे और स्थानीय स्तर पर रहेंगे।आज घर से बाहर पूना,दिल्ली,मद्रास आदि जगह जाते हैं और उनका आहार,विचार,विहार बिगड़ता है। आज समाज एक ऐसी सूची तैयार करे जिसमें हम सबको जानकारी हो कि कोई अपने समाज में किस-किसका व्यापार,क्या-क्या निर्माण करते हैं और जानकारी के आधार पर संपर्क किया जा सके,पर इस बात में भी हम लोग अपनों का शोषण करने में नहीं चूकते। साथ ही हमारे समाज में कौन-कौन प्रशासकीय पदों पर पदस्थ हैं,कौन- कौन पंडित,विद्वान् साहित्यकार-लेखक-कवि,चिकित्सक,वकील, सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता और पत्रकारों की भी सूची प्रकाशित करना चाहिए,तथा समय -समय पर संशोधित भी करें।
आज जैन समाज की कितनी शैक्षणिक संस्थाओं में मंत्री, जिलाधीश की अनुशसाएं लगती हैं क्या हमारी संस्थाए उन मानकों की पूर्ति करती हैं,जितनी होना चाहिए ?क्या हमारी संस्थाएं सरकारी स्तर पर वेतन लाभ देती हैं या नहीं! इस बात पर समाज को विशेष गौर करना चाहिए कि हम एक ऐसी संस्था बनाएं जो स्तरीय हो,जिसमें प्रवेश के लिए भी अनुशंसाएं लगें।
आजकल बहुत जैन साहित्य लिखा और छापा जा रहा है,पर पाठकों का अभाव है। उसका कारण बुनियादी शिक्षा न होने से उसमें उपयोग होने वाले शब्दों का अर्थ न जानने से उसका मर्म नहीं समझ पाते और बिना पढ़े वे किताबें ग्रंथालय की या तो शोभा बन जाती हैं या कबाड़ में बेच दी जाती हैं। उसके लिए बुनियादी शिक्षा बहुत जरुरी है और वह पाठशालाओं से आएगी। जब तक प्राथमिक ज्ञान न होगा,तब तक विषय वस्तु तक पहुंचना कठिन होगा। आज टी.वी. के माध्यम से शिक्षा देना उतना प्रभावकारी नहीं हैं जितना गुरुमुख से प्रत्यक्ष होना। इस पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए। नहीं तो गधे पर आप सोना लाद रहे या मिटटी,गधे को उससे कोई प्रयोजन नहीं रहता। ऐसा ही हाल हमारा है। ऐसी ही स्थिति साहित्य की हो रही है और होगी ही।
वर्तमान में तीर्थ क्षेत्रों की स्थिति भी बहुत चिंताजनक है। वैसे धर्म निजी-व्यक्तिगत होता है,पर यात्रा के साथ मनोरंजन स्थल होने से बढ़ती भीड़ की दिशा में भी मानसिकता के सुधार की आवश्यकता है।
रात्रि भोजन और विवाह एक शुरूआती कदम बहुत अच्छा है,पर हमें समग्र चिंतन से सामाजिक सुधारों को दृष्टिगत रखना होगा। मुनि सेवा और उनके बताए आदर्शों को न केवल सुनें,पर उनको जीवन में अपनाएं या उतारें। वह काम का है,न कि संघवाद।
वर्तमान समय बहुत ही अधिक संक्रमणकाल का है। इसमें अनेक बुराइयों का होना लाज़िमी है, और समय-काल के प्रभाव से कोई वंचित नहीं हो सकता,पर हमें अपना लोटा साफ़ कर पानी पीना होगा। बातें बहुत बड़ी-बड़ी होती हैं पर उनको जीवन में कोई नहीं उतार रहा है। इस पर बहुत गंभीरता से विचारकर सुधारात्मक कदम उठाना चाहिए।

परिचय- डॉ.अरविन्द जैन का जन्म १४ मार्च १९५१ को हुआ है। वर्तमान में आप होशंगाबाद रोड भोपाल में रहते हैं। मध्यप्रदेश के राजाओं वाले शहर भोपाल निवासी डॉ.जैन की शिक्षा बीएएमएस(स्वर्ण पदक ) एम.ए.एम.एस. है। कार्य क्षेत्र में आप सेवानिवृत्त उप संचालक(आयुर्वेद)हैं। सामाजिक गतिविधियों में शाकाहार परिषद् के वर्ष १९८५ से संस्थापक हैं। साथ ही एनआईएमए और हिंदी भवन,हिंदी साहित्य अकादमी सहित कई संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। आपकी लेखन विधा-उपन्यास, स्तम्भ तथा लेख की है। प्रकाशन में आपके खाते में-आनंद,कही अनकही,चार इमली,चौपाल तथा चतुर्भुज आदि हैं। बतौर पुरस्कार लगभग १२ सम्मान-तुलसी साहित्य अकादमी,श्री अम्बिकाप्रसाद दिव्य,वरिष्ठ साहित्कार,उत्कृष्ट चिकित्सक,पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी आदि हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-अपनी अभिव्यक्ति द्वारा सामाजिक चेतना लाना और आत्म संतुष्टि है।

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