रावण का तपोवन धाम

प्रभात कुमार दुबे(प्रबुद्ध कश्यप)
देवघर(झारखण्ड)
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देवघर बाबा बैधनाथ धाम बारह ज्योतिर्लिंगों में अष्टम ज्योतिर्लिंग के रुप में है। इसी पावन भूमि में से एक तपोवन धाम की एक झलक बता रहा हूँ।
यहाँ की मान्यता के अनुसार ये रावण की तपोस्थली है। कहा जाता है कि जब रावण ने तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया तो भगवान शिव प्रगट हुए,और उन्हें वर मांगने को कहा। रावण ने भगवान शिव से निवेदन किया कि आप हमारे गृह नगर में निवास करें। भगवान शिव न चाहकर भी वहां जाने के लिए राजी हो गए,मगर एक शर्त के साथ चलने को तैयार हुए-तुम मेरे शिवलिंग को जहां रखोगे,मैं वहीं स्थापित हो जाऊंगा। रावण इतना बलशाली था कि उसे कभी ये आभास ही नहीं हो पाया कि प्रकृति के सामने हर इंसान बौना है। वो खुशी-खुशी इस शर्त को मानकर भगवान शिव के शिवलिंग को अपने हाथों में उठाकर चलने लगा।
जब उसने देवघर की इस पुण्य भूमि में प्रवेश किया तो उसे जोर से लघुशंका का एहसास हुआ। उसने वहां एक चरवाहे को देखकर उसे शिवलिंग सौंप दिया,यह कहकर कि-मैं लघुशंका से निवृत होकर पुनः ये शिवलिंग तुमसे प्राप्त कर लूंगा। मैं जब तक वापस नहीं लौटूं,तब तक तुम इसे अपने पास रखो। तब भगवान विष्णु के आवाहन पर माँ गंगा,रावण के उदर में प्रवेश कर गई। रावण इतनी देर तक उस जगह पर बैठा रहा,जब तक वह ग्वाला थककर जमीन पर भगवान शिव के शिवलिंग को रख न दिया। जब रावण वापस आया और शिवलिंग को जमीन पर रखा देखा तो अत्यंत क्रोधित हुआ। अत्यंत कोशिशों के बावजूद शिवलिंग को अपने साथ नहीं ले जा सका। तब उसने भगवान शिव की फिर से तपस्या आरंभ कर दी। वह जगह कोई और नहीं,  तपोवन है,जहाँ रावण की तपस्या को भंग करने के लिए साक्षात भगवान हनुमान पहाड़ को चीरते प्रगट हुए और रावण की तपस्या को भंग कर दिया। ये जगह देवघर (झारखंड) से आठ किलोमीटर दूर आज भी अपने रहस्यों के लिए जानी जाती  है। १८८२ ई.में बालानंद ब्रह्मचारी ने यहां आकर तपस्या कर सिद्धियां प्राप्त की। १९३३ में इस जगह पर मंदिर का निर्माण किया गया,और इस परमधाम का फिर से जीर्णोद्धार हुआ। ये जगह आज भी प्रकृति के रमणीय स्थलों में से एक है।

परिचय : प्रभात कुमार दुबे(प्रबुद्ध कश्यप)की शिक्षा-बी.ए.(इतिहास-प्रतिष्ठा) तथा डी.एल.एड. जारी हैl आपका जन्म स्थान-बिहार में जमुई स्थित मालवीया नगर (सोहजना) हैl वर्तमान में देवघर(झारखण्ड)में बसे हुए श्री दुबे का अनूठा कार्य हैl आप २००७ से २००९ तक सरकारी स्कूल (बिहार) में रहेl अब जहाँ भी शिक्षक की कमी हो,मुफ्त में स्कूल में जाकर पढ़ाते हैं,वह भी किसी नाम या शोहरत के बिना हीl आपने २०१० में बैंगलोर में निजी संस्थान में कार्य किया,साथ-साथ एक दल में राजनीतिक सक्रियता भी जारी रखीl वर्तमान में श्री दुबे निजी स्कूल में शिक्षक के रूप में कार्यरत हैंl आपका लेखन कार्य बचपन से आज तक बिना किसी सहायता के सिर्फ माँ सरस्वती के आशीर्वाद से जारी हैl साहित्य की हर विधा को आज भी सीखने को तत्पर रहने वाले श्री दुबे को पता नहीं है कि,कितना लिखा,कब से लिखा और क्या-क्या लिखा है। लेखन पसन्द होकर आप सभी विधाओं में लिखते हैंl लेखन की उपलब्धि यही है कि,ऑनलाइन साहित्यिक मंच पर भी रचनाओं का प्रकाशन हो रहा हैl

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