राहुल के फैसलों पर नेताओं का बिदकना 

राकेश सैन
जालंधर(पंजाब)
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भाजपा के प्रवक्ता अकसर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की तुलना अंतिम मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर से करते हैं,यह उनकी प्रवंचना या टीवी पर बहस जीतने की शैली हो सकती है,परंतु जफर केवल मुगलिया सल्तनत के पतन के ही नहीं,बल्कि कमजोर नेतृत्व के भी एतिहासिक प्रतीक कहे जा सकते हैं। तख्त पर वे अवश्य बैठे थे,परंतु दरबार में भी उनकी नहीं बल्कि ब्रिटिश इंडिया कंपनी की चलती थी। दरबान उनके प्रवेश पर उन्हें शाह आलम बताते तो औपचारिकता में सिर झुकाए कुछ दरबारी कानाफूसी करते हुए एक-दूसरे से पूछते कि-‘अरे मियां,कहां के शाह आलम’ और साथ वाला उत्तर देता ‘बस, लाल किला से पालम।’ अभी हाल ही में कांग्रेस दल से ऐसे संकेत मिले हैं कि नेहरू,इंदिरा और सोनिया गांधी के दरबार में घिघियाए-सकुचाए से खड़े रहने वाले नेताओं व क्षत्रपों ने केवल कानाफूसी ही शुरू नहीं की,बल्कि दबे स्वरों में तख्त के खिलाफ आवाज भी उठानी शुरू कर दी है। राहुल गांधी २०१९ की वैतरणी पार करने को छोटे-छोटे दलों से भी गलबहियां डालने को बेताब हैं तो उनके दरबारी गठबंधन के गर्भाधान में ही रोड़े अटकाते नजर आ रहे हैं,याने माँ तो दरवज्जे-दरवज्जे गोबर के चौथ बटोरती फिरे,और बेटे फिरें बिटोड़े ढहाते।
लोकसभा चुनाव में विपक्ष की संभावित सवारी हाथी बिदक गया है। बहुजन समाज पार्टी ने छत्तीसगढ़,मध्यप्रदेश और राजस्थान के विधानसभा चुनाव अकेले लडऩे की घोषणा कर दी है। दल की सर्वेसर्वा मायावती ने इसका ठीकरा कांग्रेस के बहुचर्चित नेता दिग्विजयसिंह पर यह कहते हुए फोड़ा है कि,इस पार्टी में कुछ जातिवादी व सांप्रदायिक मानस काम कर रहा है। जवाब में दिग्विजय ने कहा है कि,मायावती केन्द्रीय जांच ब्यूरो व प्रवर्तन निदेशालय से भयभीत हैं। बता दें कि मायावती के खिलाफ इन विभागों में भ्रष्टाचार के प्रकरण विचाराधीन हैं और दिग्गी राजा के कहने का भाव है कि केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा के भय से मायावती ने गठजोड़ से इंकार किया है। मध्यप्रदेश में दिग्विजय इस उम्मीद में हैं कि,वहां लंबे समय से सत्तारूढ़ भाजपा के खिलाफ अब व्यवस्था विरोधी रुझान है और कांग्रेस राज्य में सत्ता में आती है तो उनकी राजनीतिक यायावरी खत्म हो सकती है। बसपा राज्य में हैसियत से अधिक सीटें मांग रही थी और दिग्गी राजा नहीं चाहेंगे कि,उनके सपनों की सरकार बैसाखियों पर टिकी हो। इसीलिए,उन्होंने मायावती की नाराजगी के कई बहाने पैदा करवाए,जिनका परिणाम योजनानुसार ही निकला कि बुआजी लाड़ले बबुओं से अलग हो गर्इं।
मायावती के राजनीतिक गुरु बाबू काशीराम कहा करते थे,-`जिसकी जितनी संख्या भारी,उतनी उसकी भागीदारी।` वे मजबूत नहीं,बल्कि मजबूर सरकारें चाहते थे जिन पर बसपा के पैबंद लगे हों। यह सर्वविदित है कि,मायावती देश की प्रधानमंत्री बनना चाहती हैं और स्पष्ट कर चुकी हैं कि उन्हें बुआ कहो या भाभी,परंतु जब तक सत्ता की चाबी उनके हाथ आती नहीं दिखेगी तब तक वे किसी तरह के गठजोड़ का हिस्सा नहीं बन सकती। तीन राज्य में कांग्रेस के साथ गठंबधन पर टूटी बात के बारे में यही माना जा रहा है कि,मायावती जितनी सीटें मांग रही थीं कांग्रेस के लिए उतनी देना संभव नहीं था। कुछ कांग्रेसी नेताओं को यह भी भरोसा हो चला है कि वे अपने दम पर भी अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं। राजस्थान में कुछ हद तक ऐसी तस्वीर दिखती है,लेकिन मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की स्थिति अलग हैl यहां बसपा का साथ कांग्रेस का काम आसान करता,लेकिन दिग्गी राजा जैसे कई क्षत्रपों ने तुनकमिजाज मायावती को कोपभवन भेज दिया,जिससे राहुल गांधी का महागठबंधन का सपना टूटता दिख रहा है। यहां यह भी कहना बनता है कि,इन तीन राज्यों में ज्यादा सीटों की मायावती की मांग अतिरेक नहीं। यहां बसपा का जनाधार है। मध्य प्रदेश में बसपा को १९९३ के विधानसभा चुनाव में ११ सीटें मिलीं। पिछले विधानसभा चुनाव में भी ६.४२ प्रतिशत मतों के साथ बसपा के चार विधायक बने। राजस्थान में बसपा को ३.४ प्रतिशत मतों के साथ २ सीट मिलीं तो छत्तीसगढ़ में भी पिछले चुनाव में उसे ४ प्रतिशत मत मिले। यहां उसका एक विधायक भी है।
मध्य प्रदेश के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को पंजाब के मुख्यमंत्री कै. अमरिंदर सिंह व कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष चौधरी सुनील कुमार जाखड़ ने स्पष्ट कर दिया है कि,प्रदेश कांग्रेस किसी से समझौता नहीं करेगी। बुधवार को दिल्ली में कैप्टन सिंह व सुनील जाखड़ ने पार्टी के केन्द्रीय नेताओं के सम्मुख यह साफ किया कि उन्हें अपने यहां किसी के सहयोग की जरूरत नहीं है। पंजाब देश का ऐसा राज्य है,जहां दलितों का जनसंख्या प्रतिशत देश में सर्वाधिक ३२ है। बहुजन समाज पार्टी यहां कांग्रेस पार्टी के साथ गठजोड़ कर ३-४ सीट तक जीतती रही है। इसके अतिरिक्त सीपीआई व सीपीएम भी कांग्रेस के पुराने साथी हैं। पंजाब के क्षत्रपों ने कांग्रेस के दिल्ली दरबार के सामने बसपा के साथ-साथ वामपंथियों का पल्लू भी झटक दिया है। दूसरी तरफ बंगाल में भी कांग्रेस का स्थानीय नेतृत्व वामपंथियों के साथ-साथ तृणमूल कांग्रेस से गठजोड़ पर नाक-भों सिकोड़ रहा है। याने कांग्रेस पार्टी के अंदरूनी हालातों का लब्बो-लुआब यह है कि राहुल गांधी कुछ और करना चाहते हैं पर शक्तिशाली क्षत्रप कुछ और। बसपा का गठजोड़ से छिटकना बताता है कि योजनाएं सफल हो रही कांग्रेसी क्षत्रपों की दिख रही हैं। किसी समय कांग्रेस में मजबूत नेतृत्व के चलते दिख रहा अनुशासन अब कमजोर होता महसूस हो रहा है तभी तो पार्टी के केन्द्रीय स्तर के फैसलों या योजनाओं को लेकर सार्वजनिक रूप से प्रादेशिक नेताओं द्वारा विचार व्यक्त किए जा रहे हैं। किसी समय १० जनपथ पर सिर झुकाए खड़े रहने वाले और प्रादेशिक नेता आज केन्द्रीय नेतृत्व के अधिकार क्षेत्र में आने वाले फैसलों पर अपनी राय दे रहे हैं,और वह भी सार्वजनिक रूप से मीडिया में। दिग्विजयसिंह,कैप्टन अमरिंदरसिंह,सुनील जाखड़ के प्रसंग और बसपा का बिदकना बताता है कि,राहुल के दरबार में बहादुरशाह जफर जैसी अनुशासनहीनता व दरबारियों में स्वेच्छाचारिता का समावेश होने लगा है। राहुल के सम्मुख पहले ही अनेक परेशानियां हैं,जिन पर उन्हें काबू पाना हैl अगर घर से ही उन्हें चुनौती मिलनी शुरू हो गई,तो उनका राजनीतिक हश्र भी उसी जफर जैसा होगा जिसने कभी अपना दुख अपनी नज्म में लिखा था-
`न तो मैं किसी का हबीब हूँ,न तो मैं किसी का रकीब हूँ।
जो बिगड़ गया वो नसीब हूँ,जो उजड़ गया वो दयार हूँ।`

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