रेल हादसे:केवल चर्चा नहीं,क्रियान्वयन हो

राकेश सैन
जालंधर(पंजाब)
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विजयादशमी वाले दिन अमृतसर के जोड़ा फाटक के पास भीषण ट्रेन दुर्घटना में ६० से भी ज्यादा लोगों की मौत हो गई और करीब ५० लोग घायल हो गए। रावण दहन के वक्त काफी लोग पास ही स्थित ट्रैक पर खड़े थे। इसी दौरान वहां से लगातार २ ट्रेन गुजर गईं और सैंकड़ों लोग इनकी चपेट में आ गए। इतना भीषण हादसा शोक के साथ क्षोभ से भी ग्रस्त करने वाला है, क्योंकि यदि स्थानीय प्रशासन ने तनिक भी सतर्कता और समझदारी का परिचय दिया होता तो उल्लास-उमंग से भरे लोगों को मौत के मुंह में जाने से बचाया जा सकता था। भले ही इस हादसे के बाद भी वही होगा,जो अभी तक होता आया है। सरकारों ने मुआवजे व न्यायिक जांच की तो घोषणा कर ही दी है, अब अखबारों के साथ-साथ विभिन्न मंचों पर बुद्धिजीवी घटना का आपरेशन करेंगे,वातानुकूलित कमरों में चर्चा होगी और कुछ समय बाद पूरे मामले को भुला दिया जाएगा। यह देश में होने वाली हर बुरी घटना के बाद की स्थाई परम्परा बन चुकी है। हम न तो किसी दुर्घटना से सबक सीखते हैं और न ही उनसे बचने के पूर्व प्रबंध कर पाते हैं और प्रतीक्षा करते हैं अगली दुर्घटना की। माना कि भारत एक बड़ी आबादी वाला उत्सवप्रिय देश है,लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि यहां लोग उत्सवों के दौरान हादसों का शिकार होते रहें। अमृतसर में हुई इस दुर्घटना के पीछे १० पहलू गिनवाए जा सकते हैं, जिन पर चिंता व गौर किए बिना भविष्य में होने वाले हादसों को रोका जाना संभव नहीं होगा।
#गैर-जिम्मेवार आयोजक
हादसे के कारणों की मीमांसा करते हुए देखने में आ रहा है कि दशहरा समारोह के आयोजक पूरी तरह से गैर-जिम्मेवारी से काम करते दिखे। शहर में जगह-जगह होर्डिंग लगा कर हजारों लोगों को एकत्रित तो कर लिया परंतु उनकी सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं किए गए। समारोह स्थल इतना संकीर्ण था कि रावण के जलते हुए पुतले के गिरने के लिए भी पर्याप्त स्थान नहीं था। रेलवे ट्रैक की ओर एलईडी लगा कर मंच पर चल रहे लोकगायक बूटा मोहम्मद के रंगारंग कार्यक्रम का सीधा प्रसारण किया गया जिससे सैंकड़ों लोग रेलवे ट्रैक पर ही जुट गए। आरोप लग रहे हैं कि आयोजन की प्रशासन से मंजूरी भी नहीं ली गई।
# पर्वों का राजनीतिकरण
जिस तरह से हमारे पर्वों का राजनीतिकरण हो रहा है, वह भी कहीं न कहीं इस घटना के लिए जिम्मेवार है। अब शोभायात्रा हो या दशहरा या जागरण,वीआईपी विशेषकर नेताओं से फीता कटवाना प्रचलन बन गया है। जब इस तरह के समारोह में नेता जुटते हैं तो वे भीड़ की भी मांग करते हैं और इसके लिए तरह-तरह के प्रपंच किए जाते हैं और समारोह में भीड़ जुटने की प्रतीक्षा की जाती है। उक्त समारोह में यह बात देखने में आई और दुर्घटना के लिए बहुत बड़ा कारण बनी।
# लापरवाह जिला प्रशासन
इस दुर्घटना में सिविल प्रशासन यह तर्क देकर अपनी जिम्मेवारी से नहीं बच सकता कि उनसे इसकी अनुमति नहीं ली गई और बिना मंजूरी के यह क्रम कई सालों से चल रहा है। अगर ऐसा है तो प्रशासन अभी तक इस तरह के आयोजन क्यों होने देता रहा है। जब इस कार्यक्रम के पूरे शहर में बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगे थे तो प्रशासन यह नहीं कह सकता कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं थी। अगर जानकारी थी तो प्रशासन ने स्वत: संज्ञान लेकर यहां बंदोबस्त क्यों नहीं किए। कहा जाता है कि जब आयोजन स्थल पर कई दिनों से प्रशासन साफ-सफाई करवा रहा था तो बाकी के प्रबंध क्यों नहीं किए गए?
# कानून की आँख पर पट्टी
पुलिस नियमावली के अनुसार कुआं,जौहड़,नहर या नदी या संवेदनशील जगह आयोजन होने पर बैरिकेट्स लगाने जरूरी हैं। अगर ऐसा नहीं है तो पुलिस जवानों की ऐसी कठोर दीवार तैयार की जाती है कि लोग इन स्थानों तक जा न पाएं। रेलवे परिसर के आसपास इतना बड़ा आयोजन खुद में अति संवेदनशील मामला है तो पुलिस प्रशासन क्यों आँखें मूंदे बैठा रहा ?
#रेल प्रशासन की लापरवाही
रेल प्रशासन को जब जानकारी थी कि उक्त स्थान पर हर साल दशहरा आयोजित किया जाता है तो ट्रेन ड्राईवर को सावधानी आदेश क्यों नहीं दिया गया ? रेलवे नियमावली के तहत बिना गेट वाले फाटक, फाटक जंपिंग करने वाले स्पॉट,रेल लाइनों पर संभावित आवागमन वाली जगहों पर ड्राईवर को काशन दिया जाता है। फाटक पर तैनात फ्लैगमैन ने हरी झंडी दिख्राते समय ट्रेन चालक को काशन क्यों नहीं दिया? हादसे के कुछ वीडियो में दिख रहा है कि रेल पूरी तेजी से भीड़ को चीरती हुई जा रही है। ऐसे में सवाल है कि रेल चालक को क्या एक बड़ी भीड़ दिखाई नहीं दी? चालक को अगर भीड़ दिख गई थी तो उसने लगातार हॉर्न बजाया या नहीं ? लगातार हॉर्न बजाने के अलावा चालक ने गाड़ी की गति कम क्यों नहीं की ?
#वीआईपी संस्कृति
यह बीमारी बहुत पुरानी और कई बार जानलेवा साबित हो चुकी है। देखने में आता है कि वीआईपी की सुरक्षा के लिए सैंकड़ों पुलिस जवान तैनात कर दिए जाते हैं परंतु जनसाधारण की सुरक्षा पर इतना ध्यान नहीं दिया जाता। उक्त स्थान पर उमड़े ७-१० हजार व्यक्तियों के लिए मात्र ६-७ पुलिस के जवान तैनात थे जबकि इससे अधिक जवान तो समारोह में मुख्य मेहमान के तौर पर पहुंची नवजोत कौर सिद्धू व अन्य की सुरक्षा में दिखाई दिए। वीआईपी संस्कृति के चलते ही किसी कार्यक्रम में अगर किसी बड़े आदमी का नाम जुड़ जाए तो देखने में आता है कि नागरिक प्रशासन इनको लेकर आँखें बंद कर लेता है और इन समारोहों में नियमों को ताक पर रखा जाता है। इनके परिणामस्वरूप ही होते हैं अमृतसर जैसे हादसे।
# लापरवाह व असावधान लोग
किसी दुर्घटना के लिए पीड़ित को चाहे जिम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता परंतु नियमों को लेकर जनसाधारण में लापरवाही व असावधानी के चलते दुर्घटनाएं हो जाती हैं,जिनका खमियाजा अंतत: आम आदमी को ही भुगतना पड़ता है। उक्त घटना को लेकर भी कहा जा सकता है कि जब सभी जानते हैं कि अमृतसर-दिल्ली रेल मार्ग देश का अति व्यस्ततम रेल मार्ग है तो लोग रेल लाइनों पर एकत्रित ही क्यों हुए। ऊपर से सामने चल रही एलईडी व जलते हुए रावण से फूटती आतिशबाजी के शोर ने उन्हें काल के गाल में समा दिया। बताया जाता है कि मौके पर मरने वाले बहुत से लोग अपने मोबाइल पर दशहरे की वीडियो बना रहे थे। अगर वे सावधान होते तो शायद इतना बड़ा हादसा न होता। देखने में आ रहा है कि जीवन में मोबाइल की बढ़ती भूमिका व यातायात नियमों का उल्लंघन लोगों के लिए जी का जंजाल बन रहा है।
#हिंदू पर्वों की उपेक्षा
बड़े दुखी हृदय से लिखना पड़ रहा है कि पंजाब में चाहे किसी भी दल की सरकार हो परंतु हिंदू पर्वों की उपेक्षा ही की जाती रही है और उपेक्षा का क्रम इतना लंबा है कि पंजाब में रहने वाले हिंदुओं को अब यह बात सामान्य-सी लगने लगी है। अन्य धर्मों के पर्वों पर सरकारें विज्ञापन जारी करती,सरकारी अवकाश की घोषणा करती,एक दिन पहले निकलने वाली शोभायात्राओं के लिए आधे दिन का अवकाश घोषित करती व पूरे बंदोबस्त करती है परंतु हिंदू पर्वों पर कंजूसी बरती जाती है। दशहरे पर्व पर हुआ हादसा और प्रशासन की भूमिका इसका जीवंत उदाहरण है। अभी हाल ही में दो दिन पहले लोगों ने कंजक पूजन किया। उस दिन अवकाश नहीं था और कंजक पूजन करते-करते बच्चों को सुबह विद्यालयों के लिए देरी हो गई। इसके चलते बहुत से बच्चों की गाड़ी छूट गई या देर हो गई। समय पर पहुंचने के लिए शाला के वाहन  चालकों को ज्यादा गति से वाहन चलाने पड़े। ऐसे में अगर हादसा होता तो कौन जिम्मेवार होता। केवल इतना ही नहीं,दीपावली हो या कृष्ण जन्माष्टमी या होलिका दहन, छठ पूजन जैसे सार्वजनिक पर्व इनके बंदोबस्त को कोई भी विभाग या सरकार इतना महत्व नहीं देती।
#संवेदनहीनता
जनता के प्रति यह संवेदनहीनता ही है कि घटना के तुरंत बाद इस पर राजनीति होनी शुरू हो गई और राज्य के मुख्यमंत्री को मौके पर पहुंचने में १७ घंटे से अधिक समय लग गया। मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह का दावा है कि वे इसराईल जाने वाले थे इसी कारण देरी से पहुंचे। वास्तविकता यह है कि उनका इसराईल दौरा २१ अक्तूबर से आरंभ होना है और घटना १९ की रात को हुई। वे उस समय दिल्ली में थे जहां हवाई मार्ग से कुछ घंटों के बाद ही अमृतसर पहुंच सकते थे। जब रेल राज्यमंत्री आधी रात को दिल्ली से अमृतसर पहुंच सकते हैं तो कैप्टन अमरिंदर सिंह क्यों नहीं?
#धर्म कम दिखावा ज्यादा
देखने में आ रहा है कि समाज में धर्म के नाम पर दिखावा बढ़ रहा है और इससे न केवल दुर्घटनाएं हो रही हैं बल्कि जनसाधारण को भी परेशानी का सामना करना पड़ता है। पंजाब में लंगर की श्रेष्ठ परम्परा है परंतु देखने में आता है कि राजमार्ग पर लगने वाले लंगरों व छबीलों के चलते दुर्घटनाएं भी हो चुकी हैं। इसी तरह विभिन्न शहरों में निकलने वाली शोभायात्राओं के चलते बाजारों में भीड़ बढ़ जाती है जिससे लोग परेशानी झेलते हैं। जागरण के नाम पर सडक़ों को बंद कर दिया जाता है। श्रद्धा के प्रतीक धार्मिक आयोजनों में भौंडापन हावी होता जा रहा है और अब इससे लोगों की जान भी सांसत में फंसती  दिख रही है। किसी ने सही कहा है कि पहले धर्मस्थान कच्चे थे पर आस्था पक्की,और आज हालात उलट दिखते हैं।

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