रोजगार युवाओं का मूलभूत अधिकार

प्रो.स्वप्निल व्यास
इंदौर(मध्यप्रदेश)
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हम ३५ वर्ष से कम उम्र की हमारी जनसंख्या के ६५ प्रतिशत के साथ सबसे युवा देश हैं। हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं और हमारे पास पालने के लिए एक विशाल घरेलू बाजार है। किसी भी देश के पास भारत की तरह मानव पूंजी और प्रचुर प्राकृतिक संसाधन के साथ रोजगार पैदा करने के ऐसे अवसर नहीं है।
प्रधानमंत्री के इसी विचार से में अपने विषय में प्रवेश कर रहा हूँ कि,आज बेरोजगारी एक बड़़ा सवाल है जो हमारे करोड़़ों देशवासियों विशेषकर समाज के सबसे ऊर्जावान तबके यानी युवाओं को प्रभावित कर रही है। आज हमारे देश में ६६ फीसदी आबादी ३५ वर्ष से कम के युवाओं की है जिसका बहुत बड़ा हिस्सा बेरोजगार है। जाहिर है,विराट मानव सम्पदा की उत्पादक क्षमता से वंचित रह जाना हमारे देश और समाज की भी अपार क्षति है। देश में आज बेरोजगारी की दर ९.४ फीसदी,जो यूरोप को छोड़कर पूरी दुनिया में सर्वाधिक है। आज हमारे देश में ३५.५ फीसदी युवा स्नातक बेरोजगार हैं, तो देश में हर साल पैदा होने वाले ४ लाख अभियंताओं में २ लाख बेरोजगार हो जाते हैं। बेरोजगारी की भयावहता का अंदाजा हाल ही में प्रकाशित रेटिंग एजेंसी क्रिसिल की रिपोर्ट से लगाया जा सकता है,जिसके अनुसार अगले ७ साल में १ करोड़ २० लाख लोग काम के अभाव में शहरों से कृषि क्षेत्र की ओर लौटने के लिए मजबूर हो जाएंगे। शहर से गांव की ओर उल्टे पलायन की यह अभूतपूर्व त्रासदी होगी। जाहिर है यह देश में गिरती विकास दर और रोजगारविहीन विकास के रास्ते का नतीजा है। शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में रोजगार सृजन के लिए विनाशकारी प्रभाव हुआ है।
नौकरियों की संख्या घटाए जाने और ठेकेदारी प्रथा का बोल-बाला हो गया। इन सबके परिणामस्वरूप निजी तथा सरकारी सभी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर रोजगार का खात्मा हुआ। शहरी रोजगार में गिरावट आई। सरकार की सचेत नीति के फलस्वरूप सार्वजनिक क्षेत्र में श्रमिकों की संख्या कम हो गई और सार्वजनिक क्षेत्र में रोजगार वृद्धि की दर ऋणात्मक हो गई। अर्थव्यवस्था को बड़े पैमाने पर असंगठित अनौपचारिक क्षेत्र की ओर ढकेला गया। भारत में दूसरे गरीब देशों की तुलना में असंगठित श्रमिकों का हिस्सा सर्वाधिक है।
सबको रोजगार देने के लिए पूँजी और संसाधनों का प्रश्न बेमानी है। संविधान देश के हर नागरिक को जीवन का अधिकार देता है और रोजगार जीवन की अनिवार्य शर्त है, इसलिए रोजगार हमारा मूलभूत अधिकार है और इसकी हर हाल में गारण्टी राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है,क्योंकि देश में पूँजी की कमी नहीं है। साथ ही हमारे देश में कॉरपोरेट घरानों व अमीरों पर ‘कर’ बेहद कम है। यदि काले धन के रूप में लूटी गई और विदेशी बैंकों में जमा विशाल राष्ट्रीय सम्पदा को वापस लाया जाए,कॉरपोरेट घरानों को दी जा रही कर छूट बंद की जाए तथा उनके ऊपर कर बढ़ाया जाए और इस सारी सम्पदा को जनपक्षीय नीतियों के माध्यम से रोजगार सृजन की दिशा में लगाया जाए तो सभी को रोजगार देने तथा बेरोजगारों को जीवन निर्वाह योग्य पर्याप्त भत्ता देने की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।

परिचय-प्रो.स्वप्निल व्यास का निवास इंदौर में ही है। आपकी जन्मतिथि ३ जुलाई १९८४ तथा जन्म स्थान-इंदौर है।
मध्यप्रदेश राज्य के इंदौर वासी प्रो.स्वप्निल व्यास ने वाणिज्य में स्नातक पश्चात पत्रकारिता में भी स्नातक-स्नातकोत्तर उपाधि हासिल करने के साथ ही पीजीडीबीए,एमबीए,समाज कार्य विषय में एवं लोक प्रशासन में स्नातकोत्तर कर लिया है। आपका कार्य एक निजी महाविद्यालय में सहायक प्राध्यापक का है। सामाजिक गतिविधि-के अंतर्गत सामुदायिक परामर्शदाता का कार्य भी करते हैं। आपकी लेखन विधा-लेख और कविता है,जबकि प्रेरणा पुंज-माता-पिता हैं। स्वप्निल जी के लेखन का उद्देश्य-जागृति,संवाद के लिए स्वतन्त्र लेखन करते रहना है।

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