रोज़गार हो तो कोई भी माध्यम संभव

प्रो. कृष्ण कुमार गोस्वामी

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अगर हिन्दी में चिकित्सकीय पढ़ाई करने वाले छात्रों को रोजगार और नौकरी के अवसर मिल जाते हैं,तो हिन्दी में चिकित्सा की पढ़ाई संभव हो सकती है। नौकरी या रोज़गार हो तो कोई भी माध्यम चल सकता है।  इसके लिए सरकार को भी पहल करनी होगी। चिकित्सकीय शिक्षा देने वाले अध्यापकों को हिन्दी में शिक्षण करना होगा। विद्यार्थियों को हिन्दी में पढ़ने की प्रेरणा देनी होगी। हिन्दी के प्रति चिकित्सकों में जो भ्रम है,उसे दूर करना होगा। अंग्रेज़ी माध्यम की अपेक्षा हिन्दी माध्यम को अधिक महत्व देना होगा। माध्यप्रदेश में भोपाल में अटल बिहारी वाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय में पूर्व कुलपति प्रो.मोहनलाल छीपा के प्रयास से अभियांत्रिकी की पढ़ाई हिन्दी में शुरू हुई,हिन्दी में अनुवाद  की व्यवस्था भी कर दी थी। उनकी योजना में चिकित्सा अर्थात चिकित्सकीय पढ़ाई भी हिन्दी में शुरू करने की थी,लेकिन रोजगार की व्यवस्था न होने और सरकार तथा चिकित्सकों का सहयोग न मिलने के कारण उनकी योजनाएँ पूरी नहीं हो पाई।

मुद्दा हिन्दी में चिकित्सा पढ़ाई का

मैं इस बात का पूरा साक्षी हूँ और उनकी चिंता से वाकिफ हूँ। विडंबना है कि,आज़ादी से पहले उस्मानिया विश्वविद्यालय में चिकित्सा की पढ़ाई उर्दू माध्यम में होती थी,आज़ादी के बाद विदेशी भाषा अंग्रेज़ी को माध्यम के रूप में लागू कर दिया गया,जबकि भारतीय भाषाओं को माध्यम के रूप में लागू करना चाहिए था। आज ७० साल हो गए,लेकिन अंग्रेज़ी आज भी माध्यम के रूप में जारी है। हिन्दी और भारतीय भाषाओं को नहीं रखा गया। मैंने स्वयं सी-डैक(नोएडा) में हिन्दी में एम.टेक.(भाषा प्रौद्योगिकी)और   डिप्लोमा टेक्नॉलॉजी की पढ़ाई हिन्दी में शुरू कराई थी,जिसमें कई छात्रों ने प्रवेश भी लिया था,लेकिन न तो सरकार से सहयोग मिला और न ही हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा से। इसलिए,दो वर्ष यह पाठ्यक्रम चलाकर बंद करना पड़ा। इसलिए,इस संबंध में सरकार,चिकित्सकों, चिकित्सा अध्यापकों,अभियंताओं और हम सबको गंभीरता से विचार करना होगा,तथा इसे ईमानदारी और निष्ठा से कार्यान्वित करना होगा। यह राष्ट्रहित और लोकहित का मामला है।

   (सौजन्य:वैश्विक हिंदी सम्मेलन,मुंबई)

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