लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती…

देवेन्द्रसिंह सिसौदिया
बड़वाह( मध्यप्रदेश)

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मातृ दिवस विशेष………………………………..


‘माँ’ शब्द अपने-आप में सारगर्भित एवं सार्वभौमिक है। दुनिया में कोई भी शख्स ऐसा नहीं होगा,जो माँ के दुलार और प्रेम से वंचित रहा होगा। इस ममत्व की शुरुआत गर्भकाल से ही हो जाती है। कहा जाता है कि माँ के दूध का कर्ज कोई नहीं चुका सकता। ये शत प्रतिशत सत्य है। मुझे ममत्व, प्रेम,दुलार,स्नेह,संस्कार,साहस,सत्य मार्ग,शिक्षा और समाज में सम्मान सहित सब कुछ मिला एक ही व्यक्ति से। जानते हो कौन है वो ? माँ…। जी हाँ,दुनिया का केवल एक ही शख्स है ‘माँ’ जो हमें ये सब देती है। माँ के पास ममत्व का एक खजाना होता है जो कभी खाली नहीं होता। ये बगैर किसी वापसी की आशा में बस निरंतर धरा के समान देती ही रहती है। ये सम्भव नहीं कि,एक दिन में एक पृष्ठ लिखकर उनकी ममता का उदगार कर सकें।

गर्भकाल में जो प्रेम मिलता है उसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। जबसे मुझे याद है,बस ये कह सकता हूँ कि मेरे पास जो भी कुछ है वो सब उनके प्रेम-दुलार और आशीर्वाद की बदौलत है। पिताजी प्राथमिक शाला के शिक्षक थे,उस समय शिक्षकों का वेतन पर्याप्त नहीं होता था। ऐसी स्थिति में माँ को सिलाई का काम करना पड़ता था। माँ सुबह पाँच बजे उठकर घर का सारा काम निपटाने के पश्चात लगभग आठ बजे सिलाई का कार्य प्रारम्भ कर देती थी। उन दिनों मशीन पैरों से चलाई जाती थी,घर में रौशनी भी नहीं थी। ये कार्य अनवरत रात एक-दो बजे तक चलता था। हम तीन भाई थे,सबकी अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति माँ की आय से होती थी। उन्हीं की बदौलत हम सभी ने स्नातकोत्तर उपाधि के साथ कई विशेष डिप्लोमा पाठ्यक्रम किए हैं। हमारी माँ की मेहनत और लगन की बदौलत ही आज समाज में हमें विशिष्ट स्थान प्राप्त है।

ऐसा नहीं कि,माँ ने हमें कभी मारा नहीं। मारने के बाद हमारी गलती होने के बावजूद आँखों में आसूं लिए अपनी गोद में बिठाए सर पर हाथ फेरती थी।
हर व्यक्ति के भीतर ‘घमंड’ या ‘अहम’ होता है,किंतु माँ एक ऐसा रिश्ता है जहाँ इस शब्द का दूर-दूर तक स्थान नहीं होता। माँ का जीवन केवल दाता के रुप में होता है। वो हमेशा अपने बच्चों को आशा से अधिक देती है। माँ से कभी आधी रोटी मांग कर देखना, पहले तो वो पूरी देगी और फिर भी तुमने जिद की तो आधी रोटी इस प्रकार करती है जिसमें अधिकाँश हिस्सा लगभग ७०

प्रतिशत) आपको देती है। ये है माँ का दुलार,जो उम्र के साथ कभी कम नहीं होता। आज भी मां हमारी पसन्द को जानती है। जब भी मौका लगता,बगैर कहे वही बनाती है जो हमें बचपन से भाता है। माँ नींद में भी बच्चों के हष्ट- पुष्ट और प्रगति के सपने देखती है हर समय उसके दिल से दुआएं ही निकलती है ।
माँ को लेकर शायरमुनव्वर राणा कहते हैं-
‘लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती,
बस एक माँ है जो मुझसे खफा नहीं होती।’

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