लोकतंत्र का रण

राजेश गुप्ता ‘बादल’
मुरैना (मध्यप्रदेश)

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रणभेरी है
बज चुकी घनेरी,
आगे देखोगे
ज़ुबान कहां तक
गिरेगी और मेरी।
सच झूठ की
बात कहां ठहरी,
फिरकी लूंगा
मंदिर-मस्जिद में,
है सत्ता मेरी चेरी।
ऊंचे स्वर में
सिंह नाद-सा गरजूं,
मध्यम में तो
तुमको दिवा स्वप्न
फिर दिखलाऊंगा।‌
तेरे आँसू ही
सीढ़ी मेरी सत्ता के,
है अहसास
मिला तुझको सकूं
सत्ता कैसे पाऊंगा।
मैं लबालब
हूँ भरा आजकल,
जो गुरूर से
कलाकारी उसकी
शायद याद नहीं।
मोह है सत्ता
पैसे का खेल रही,
दल ये सारे
दलदल के सम,
एक भी नेक नहीं॥
परिचय-राजेश कुमार गुप्ता का साहित्यिक नाम `बादल` है। इनकी जन्म तारीख-१९ मार्च १९७६ हैlआपका जन्म स्थान-गाँव जावरौल, सबलगढ़ (जिला मुरैना म.प्र.)है। आप वर्तमान में कोटा (राजस्थान) में बसे हुए हैं,जबकि स्थाई पता मुरैना ही है। गणित से स्नातक श्री गुप्ता का कार्यक्षेत्र बांरा (राज.)में निजी संस्थान में गुणवत्ता अधिकारी का है। आपकी लेखन विधा-दोहा,चौपाई, रोला,ग़ज़ल तथा मुक्तक एवं मुख्यतः स्वतंत्र विधा है। इनके लेखन का उद्देश्य- सामाजिक,राजनीतिक,पर्यावरण हितार्थ एवं आत्मिक संतुष्टि का है। आपके लिए प्रेरणा पुंज-सर्वश्री आदित्य शिवपुरी,राजवीर ‘भारती’,अखलेश सिंह ‘गैव’ एवं मदन मोहन ‘सजल’ हैं। इनकी विशेषज्ञता दोहा,रोला,चौपाई ,कुण्डली एवं स्वतंत्र विधा में है।

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