वजूद

रमेश चौरिया राही
कवर्धा (छत्तीसगढ़)
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रोज की तरह मैं,
पत्थरों को तराशता।
क्योंकि खो न पाऊँ,
अपना वजूद॥

पर टूट जाता हूँ मैं,
इन पत्थरों को तराश-तराश कर।
देता हूँ नव रुप,
और उभर आता है,
मेरा वजूद॥

थक जाता हूँ और,
तलाशता हूँ मन।
बंजर रेत की सफर में,
बुझाता हूँ प्यास॥

जब नदी की तलहटी पर,
रखता हूँ हाथ पसार।
उठाता हूँ जल,
तन से टपकती है
पसीने की धार॥

तब पता है,
टूटा हुआ दिल मेरा।
झलकता है साफ-साफ,
शीशे की तरह चेहरा॥

तब सोचता हूँ,
अब नहीं है ढूंढना मुझे
मोती और नगीना।
बस यही है मेरी दुनिया,
कुछ भी नहीं है कहना॥

पाया और खोया क्या ?
यही है मूल और सूद।
मेरा ईमान कहता है,
यही है मेरा वजूद॥

परिचय-रमेश कुमार चौरिया का उपनाम-राही है। जन्म तारीख १७ अप्रैल १९७२ और जन्मस्थान-कृतबाँधा(कवर्धा)हैl वर्तमान में कवर्धा (जिला-कबीरधाम,छत्तीसगढ़)में बसे हुए श्री चौरिया को हिन्दी और छत्तीसगढ़ी भाषा का ज्ञान है। छग वासी श्री चौरिया की शिक्षा-एम.ए. (समाज शास्त्र) एवं डी.एड. है। इनका कार्यक्षेत्र-शिक्षक (सरकारी शाला, भानपुर)है। लेखन विधा-गीत,कविता, ग़ज़ल एवं लघुकथा है। आपकी कुछ रचनाएँ पत्र-पत्रिकाओं में छपी हैं। राही की लेखनी का उद्देश्य-समाज हित एवं शौक है।

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