वर्ग भेद का युद्ध का आगाज़

डॉ.अरविन्द जैन
भोपाल(मध्यप्रदेश)
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भारतीय इतिहास में वर्ग भेद के कारण रामायण और महाभारत के युद्ध हुए और ग्रंथों का निर्माण हुआ। जैसे रामायण में सौतेले भाई और माँ के कारण झगड़ा हुआ,वैसे ही महाभारत में भी सौतेले भाई के कारण युद्ध हुआ। युद्ध के लिए दो पक्ष होना आवश्यक होता है,जहाँ एक पक्ष के साथ भेदभाव और दूसरे को राजाश्रय देना झगड़े का कारण होता है। राजा हमेशा बांटो और शासन करो,शासन में हमेशा असंतोष बनाओ या पैदा कराओ,इसी नीति पर चलकर ही अपने राज्य में जानबूझकर पक्षपात करता है,जिससे दोनों पक्ष आपस में विवादित रहते है,जबकि शासक मजे से बंसी बजाते रहते हैं।
जिस राज्य में शासक अपने काबीना मंत्री और संत्री यानि सचिवों द्वारा ऐसे निर्णय लेते हैं,जिसका आगामी प्रभाव संघर्ष होता भी या ही होता है,शासक द्वारा दो पुत्रों में से एक को स्थाई और दूसरे को अस्थाई पुत्र की संज्ञा देना ,जबकि दोनों एक ही माता की संतान हैं। पिता अलग-अलग रहे हों,पर संतान तो एक की ही मानी जाएगी,किन्तु शासक दोनों से अलग-अलग व्यवहार करता है, सौतेला व्यवहार करता हैं,ऐसा क्यों ?
सरकार ने जानबूझकर संविदा वर्ग तैयार किया,जिससे उनके ऊपर एक मनोवैज्ञानिक दबाब रहता है। वे दीन-हीन अवस्था में रहते हैं,प्रतिवर्ष अपनी योग्यता को बताने के लिए चमचागिरी ,हाथ-पाँव जोड़ने और अप्रत्यक्ष में घूसखोरी को बढ़ावा देने का यह एक उपक्रम है। संविदा की नियुक्ति निश्चित स्थान पर रहती है,पर भ्रष्टाचार के कारण उनका स्थानांतरण मनमाफिक कराने में सुविधा होती हैं।
संविदा के कारण कम पैसे मिलने से वे भयग्रस्त होने से अपनी योग्यता का प्रदर्शन नहीं कर पाते। अच्छे से अच्छे योग्य लोग कुंठाग्रस्त होने से भविष्य के प्रति आशंकित रहते हैं। अनेक वर्ष तक इसी प्रक्रिया के कारण उनको वेतन वृद्धि और स्थाई कर्मचारियों के लाभ से वंचित होने से वर्गवाद की खाई बढ़ने से असंतोष फैलने लगता है और यही क्रम वर्षों से होने के कारण उनका विरोध शासक के प्रति होने लगता है। शासक एक प्रकार का हृदयहीन पत्थर के समान,मन रहित और संवेदना से अप्रभावित रहता हैं और उसका विकल्प हड़ताल होता है।
हड़ताल वैसे अहिंसक होती है और आंदोलन हिंसक ही होते हैं। सरकार मांग मानने के समय मांग नहीं मांगती, पर जब आंदोलन का उग्र रूप होता है,तब कुछ आश्वासन देती है। उसके पहले नहीं, ऐसा क्यों ! सरकार इतनी बेदर्द होती है कि,वह कोर्ट के आदेश को भी नहीं मानती। उनके आदेशों में अपना बचाव करने के अनेक तर्क-कुतर्क देकर समय बर्बाद करती है,जिससे उनको मांग को पूरी करने समय के साथ पैसों की बचत होती है,वहीं पक्ष में सरकार के साथ होकर हड़ताल को निष्क्रिय करने में आतुर होती है। इससे सामान्य समस्या जटिल हो जाती है।
इस प्रकार राज्य एक,संतानें दो…एक प्रिय और दूसरी अवैध। इनमें कैसे एकता होगी,जो असंतोष का कारण होता है।
कौरव और पांडव के साथ कर्णका युद्ध में रहना,कैकयी और मंथरा का होना ,रावण से युध्द का कारण बना,इसी प्रकार स्थाई और अस्थाई का किया जाना भी युद्ध का कारण बना है।
सरकार तो चाहती ही यह है कि लड़ो आपस में और आओ हमारे पास भीख मांगने,पर इससे सरकार का समय, संपत्ति,धन का नुकसान होता है। समझ से परे है कि, क्यों ऐसा कदम उठाते हैं,अवैध संतान को भी आगे चलकर मानना होगा। इनको भी अपनाओ अपने सगे पुत्रों जैसे,कारण यही है कि सब स्थाई जैसे ही काम करते हैं।

परिचय- डॉ.अरविन्द जैन का जन्म १४ मार्च १९५१ को हुआ है। वर्तमान में आप होशंगाबाद रोड भोपाल में रहते हैं। मध्यप्रदेश के राजाओं वाले शहर भोपाल निवासी डॉ.जैन की शिक्षा बीएएमएस(स्वर्ण पदक ) एम.ए.एम.एस. है। कार्य क्षेत्र में आप सेवानिवृत्त उप संचालक(आयुर्वेद)हैं। सामाजिक गतिविधियों में शाकाहार परिषद् के वर्ष १९८५ से संस्थापक हैं। साथ ही एनआईएमए और हिंदी भवन,हिंदी साहित्य अकादमी सहित कई संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। आपकी लेखन विधा-उपन्यास, स्तम्भ तथा लेख की है। प्रकाशन में आपके खाते में-आनंद,कही अनकही,चार इमली,चौपाल तथा चतुर्भुज आदि हैं। बतौर पुरस्कार लगभग १२ सम्मान-तुलसी साहित्य अकादमी,श्री अम्बिकाप्रसाद दिव्य,वरिष्ठ साहित्कार,उत्कृष्ट चिकित्सक,पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी() आदि हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-अपनी अभिव्यक्ति द्वारा सामाजिक चेतना लाना और आत्म संतुष्टि है।

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