वही गरम,वही ठण्डा

ओमप्रकाश क्षत्रिय `प्रकाश`
नीमच(मध्यप्रदेश)
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राहुल को गांव आना अच्छा लगता था।  इसका कारण यह था कि जब तक वह गांव रहता,तब तक शहर के शोर-शराबे व भीड़-भाड़ से बचा रहता था,इसलिए जब भी छुट्टी होती वह गांव चला आता।
‘चलो राहुल! आज कुएँ पर नहाने चलते हैं,’ मामाजी ने राहुल से दीपावली के दो दिन पहले कहा।
‘इस ठण्ड में,’ राहुल चकित हुआ।
‘हां।’
‘ठण्ड में ठण्डे पानी से नहाना,न बाबा न..यह मेरे बस का काम नहीं है। मैं तो शहर में रोज गरम पानी से नहाता हूं।’
‘तो तुम गरम पानी से नहा लेना।’ मामाजी ने कपड़े उठाए,कंधे पर रखे,-‘अब अपने कपड़े लो और चलो।’
‘आप कुएँ में तैरोगे ?’
‘हां,चलो। ‘
राहुल को मामाजी ने पिछली गरमी में तैरना सिखाया था,वह भी कुंए में। वह पहले तो बहुत डरा था,मगर जब मामाजी ने पैजामे का फुग्गा बनाकर दिया,तब उसका डर जाता रहा।
मामाजी ने पैजामे का जीवन रक्षक कवच बनाया था। पहले,पैजामे को पानी में गीला किया। फिर उसकी दोनों मौरी को सुतली से बांधा,ऊपर के नाड़े को खींचकर कपड़े पर नाड़ा लपेट दिया, फिर पानी में पैजामें को डाला। मुंह से पैजामे में हवा भरने लगे। कुछ ही देर में पैजामा गुब्बारे की तरह फूल गया,
उस पर मामाजी सो गए। ‘अब यह पानी में डूबेगा नहीं।’ मामाजी ने कहा,तो राहुल चकित रह गया…कपड़े का गुब्बारा..वह भी पानी में तैरता हुआ,जिस पर आदमी आराम से तैर सकता है,यह तो मामाजी का अनोखा आविष्कार है।
‘सही में,यह पानी में नहीं डूबेगा ?’
‘हां।’मामाजी ने जवाब दिया,-‘हमारे यहां सभी इसी तरह के गुब्बारे से तैरना सीखते हैं।’ अब मामाजी ने गुब्बारे को अपनी दोनों बांहों के बीच फंसाया और तैरने लगे।
गुब्बारे की दोनों टांगें मामाजी की बगल से बाहर निकल रही थी,जैसे वह गुब्बारा हवा में कोई बाहर की ओर खींच रहा हो। इसी गुब्बारे पर राहुल ने तैरना सीखा था।
यह याद करते हुए वह मामाजी के साथ कुएँ पर आ गया। मामाजी ने झट कपड़े खोले,और पानी में कूद पड़े। ‘छपाक’ की आवाज हुई,मामाजी पानी के अंदर चले गए। फिर कुछ ही पल में पानी के बाहर आ गए।
राहुल के हाथ अपने जैकेट की जेब में चले गए,-मामाजी! ठण्ड लगी ?’ उसने मामाजी से जोर से चिल्लाकर पूछा।
‘नहीं भानजे!’ उधर से मामाजी ने चिल्लाकर कहा,-‘कुएं के पानी में ठण्ड नहीं लगती।’
‘क्यों भला ?’
‘क्योंकि यह ठण्ड में गरम होता है।’ मामाजी चिल्लाकर कह रहे थे,-‘चाहो तो पानी में हाथ डालकर देख लो।’
राहुल विज्ञान का विद्यार्थी था। उसने कुंए में उतरकर पानी में हाथ डाला,पानी वाकई गरम था।
‘हां,मामाजी,पानी तो गरम है।’ पानी में अपनी टांग को साइकल की तरह चला कर पानी में स्थिर खड़े मामाजी को देखते हुए राहुल ने कहा।
‘तो आ जाओ पानी में,’ मामाजी ने हाथ हिलाया।
‘आ जाऊँ,’ राहुल ने हिम्मत की।
‘हां-हां,आ जाओ।’ मामाजी के प्रोत्साहित करते ही राहुल ने कपड़े खोले और कुएँ  के पानी में उतर गया,-‘मामाजी,वाकई पानी बहुत गरम है।’
‘मैंने कहा था भानजे,तुम्हें गरम पानी में नहलाऊंगा।’
‘सही कहा था मामाजी।’ राहुल को गरम पानी की बात समझ में नहीं आई थी इसलिए वह पूछ बैठा,-‘मामाजी। कुंए का पानी गरमी में ठण्डा और ठण्ड में गरम क्यों होता है ?’
‘सीधी बात है भानजे,’ मामाजी पानी से निकलकर कुंए की सीढ़ी पर बैठते हुए बोले-‘कुंए के पानी का ताप २७ डिग्री होता है और इस समय ठण्ड में वातावरण और हमारे शरीर की त्वचा के आसपास का ताप १८-२० डिग्री होता है। इसलिए हमें २७ डिग्री ताप का पानी गरम लगता है।
‘यह तो तुम्हें पता होगा’,मामाजी ने पानी में उतरते हुए राहुल को बताया। ‘जब वातावरण के ताप से कोई चीज ठण्डी या गरम हो तो वह हमें ठण्डी या गरम महसूस होती है़।’
‘यह तो सभी जानते हैं।’
‘बस ठीक उसी तरह जब गरमी में वातावरण का ताप ३५-४० डिग्री होता है तब भी कुएँ के पानी का तापमान २७ डिग्री ही रहता है,इसलिए यह पानी गरमी में ठण्डा लगता है। यानी सीधे कहें तो वही ठण्डा और वही गरम। क्यों भानजे सही है ना।’
‘हां मामाजी,आपने तो हमारे विज्ञान का एक प्रश्न हल कर दिया।’ राहुल कुएँ से बाहर निकलकर बोला-‘आप भी कमाल के हैं।’
‘आखिर मामा किसका हूं,’ कहते हुए मामाजी भी कुएँ से बाहर आ गए थे।
दोनों बहुत देर तक तैरते रहे थे,इसलिए थक गए थे। खाने का समय भी हो गया था,राहुल को भूख लग रही थी। वह झट से बोला,-‘मामाजी! अब घर चलते हैं,  जोर की भूख लग रही है।’
‘क्यों नहीं,मेहनत करने पर जमकर भूख लगती है। क्यों सही है न भानजे,’-मामाजी ने कहा और राहुल ने ‘हां’ में गरदन हिला दी। फिर दोनों घर की ओर चल दिए।
परिचय-ओमप्रकाश क्षत्रिय का निवास  मध्यप्रदेश के नीमच जिले में है। उपनाम `प्रकाश` से लेखन जगत में सक्रीय श्री क्षत्रिय पेशे से शासकीय विद्यालय में सहायक शिक्षक हैं। इनका जन्म २६ जनवरी १९६५ को हुआ है। आपने शिक्षा में योग्यता के तहत ३ बार बी.ए. और ५ विषयों में एम.ए. किया हुआ है। मध्यप्रदेश के रतनगढ़(नीमच) में बसे हुए होकर आपकी लेखन विधा-बाल कहानी,लेख,कविता तथा लघुकथा है। विशेष उपलब्धि यह है कि,२००८ में २४,२००९ में २५ व २०१० में १६ बाल कहानियों का ८ भाषाओं में प्रकाशन हो चुका है।  २०१५ में लघुकथा के क्षेत्र में सर्वोत्कृष्ट कार्य के लिए आपको जय-विजय सम्मान सहित बालाशोरी रेडी बालसाहित्य सम्मान २०१७, स्वतंत्रता सेनानी ओंकारलाल शास्त्री सम्मान-२०१७ और इंद्रदेवसिंह इंद्र बालसाहित्य सम्मान-२०१७ प्राप्त हुआ है। हिंदी के साथ ही अन्य भाषाओं से भी प्रेम करते हैं। बाल कविता संग्रह-`उड़ा आसमान में हाथी` तथा `चतुराई धरी रह गई` आदि प्रकाशित हैl 

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