विधायिका और न्यायपालिका में फंसा मंदिर निर्माण

 डॉ.अरविन्द जैन
भोपाल(मध्यप्रदेश)
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विलम्ब से न्याय भी अन्याय का ही प्रारूप है। जी हाँ,मुद्दई,विपक्षी,वकील और जज सब मर-खप गए,पर मुद्दा वहीं खड़ा है। इतने महत्वपूर्ण मामलों में ऐसा बर्ताव होने से जनता, राजनीतिक दलों और आस्था पर धीरज टूटने लगता है और विद्रोह होने की स्थिति बनने लगती है,पर वास्तव में यह झगड़ा दो व्यक्तियों का नहीं,वरन दो जातियों का-समुदाय का और उनमें विभिन्न विचारधाराओं के लोगों के अहम का प्रश्न बन गया है। भारत में मंदिर-मस्जिद के लिए जगह की कमी नहीं है,बस कमी है तो आपसी सदभावना और सौहार्दता की।कारण,कोई किसी से कम नहीं हैं और न ही कोई होना चाहता है। इस मंदिर-मस्जिद प्रकरण ने जितनी कड़वाहट पैदा की,उतनी अन्य ने नहीं।

न्यायालय की अपनी सीमाएँ हैं और वह तालाब में एक कंकड़ फेंककर तरंगें देख रही है। वैसे न्यायालय का निर्णय सापेक्षता के नियम पर आधारित होगा,जिसे हम अनेकांतवाद या स्याद्वाद भी कह सकते हैं। कारण,यह बहुल समुदाय का प्रकरण है। यदि किसी एक पक्ष ने इस प्रकरण में थोड़ा-सा विशाल हृदय का परिचय दिया होता तो संभव यह प्रकरण इतना लम्बा न होता या चलता। प्रेम के व्यवहार से तो बड़ी-बड़ी समस्याओं का समाधान निकल आता है। सब अपनी-अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगाकर कड़वाहट का वातावरण बनाकर शांति स्थापित करना चाहते हैं,जो संभव नहीं हैं और न ही होगी।
यदि किसी भी पक्ष ने थोड़ी-सी आत्मीयता दिखाई होती तो यह समस्या बहुत पहले हल हो जाती। जैसे हमारे घरों में जब बंटवारा होता है,उसमें बड़ा भाई या छोटा भाई एक-दूसरे के भाव का आदर करके थोड़ी-सी जगह देने में कोई भी परेशानी नहीं होती है,पर दोनों पक्ष हठधर्मिता के कारण दुश्मन बन जाते हैं। यदि बड़ा या छोटा भाई दरियादिली दिखाता तो संभव होता कि,झगड़े का प्रश्न ही नहीं उठता।
आज यह प्रकरण न्यायालय, विधायिका,राजनीतिक,सामाजिक द्वन्द्ता में उलझा हुआ है,और यदि अनेकांतवाद का सिद्धांत न अपनाया,तब निश्चित ही तनाव का वातावरण बनने की पूरी संभावना होगी। किसी एक पक्ष को समझौता का भाव रखना होगा,पर उस पक्ष में अनेक विचारधाराएं होने से उम्मीद की धूमिल किरण दिखाई देती है।कारण विचारों की दरार इतनी बढ़ चुकी है कि कोई झुकना नहीं चाहता।न्यायालय का निर्णय भी वही होगा,जो इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दिया था। एक हिस्सा मंदिर,एक हिस्सा मस्जिद और एक हिस्सा अखाड़ा को दिया जाए। हाँ,अदालत के बाहर एक पक्ष अपने-आप मंदिर के लिए जगह दे सकता है,जिसकी संभावना बहुत हद तक असंभव है। इतिहास साक्षी है,पांच गांव न देने पर महाभारत हुई थी। अब कौन-सा ऐसा कारण होगा,जो जमीन छोड़ेगा,पर यदि मानवीय धरातल पर बात करें तो संभव है कि,वे जमीन दे सकते हैं,पर वह हठधर्मिता या उच्चता का भाव न रखें। कोई भी पक्ष कमजोर नहीं है। इस प्रकरण पर समस्त विश्व की आँखें लगी हैं,और एक पक्ष यह भी चाहता है कि कोई भी गलती हो तो उसका विश्वव्यापी प्रकरण बना सकें। इसमें सिर्फ बड़ा पक्ष ही विवादित है और इलज़ाम दूसरों पर लगाना ठीक नहीं होगा।
मंदिर जहाँ बनना होगा,वहीं बनेगा,पर बनाना होगा शांति से,सौहार्द से। मंदिर निर्माण के ऊपर यदि युद्ध हुआ तो वह स्थान शांतिदायक कितना होगा,यह तो भविष्य बताएगा,पर स्थान मंगलमय होना चाहिए। आज की स्थिति में जो हो रहा है,वह संतोषजनक नहीं कहा जा सकता। हठवादिता दुःख का कारण होगा और बहुमत होना कानून को प्रभावित नहीं कर सकेगा,पर बराबरी का भाव रखकर उनके पक्षों को भी अपने पक्ष में लेकर समझदारी से मंदिर बनाए तो अच्छा। ऐसा न हो कि,एक क्षण की भूल जिंदगी भर के लिए गुनाहगार बना दे,या तो न्यायालय का निर्णय का होना अति विश्वसनीय होगा। अध्यादेश में कोई भी ऐसी बात न रखी जाए कि,विवाद और बढ़े,जिसकी संभावना होना निश्चित है।
मंदिर-मस्जिद शांति का संदेश देने का पवित्र स्थान होता है और उसमें अशांति का कोई भी कारण न बने,इसलिए कुछ दिन का रुक जाना ही बेहतर होगा। उतावली का निर्णय दुखद होगा। न्यायालय के निर्णय तक धीरज रखो,यही सुख का आधार है,अन्यथा आपसी विवाद बढ़ेगा।

परिचय- डॉ.अरविन्द जैन का जन्म १४ मार्च १९५१ को हुआ है। वर्तमान में आप होशंगाबाद रोड भोपाल में रहते हैं। मध्यप्रदेश के राजाओं वाले शहर भोपाल निवासी डॉ.जैन की शिक्षा बीएएमएस(स्वर्ण पदक ) एम.ए.एम.एस. है। कार्य क्षेत्र में आप सेवानिवृत्त उप संचालक(आयुर्वेद)हैं। सामाजिक गतिविधियों में शाकाहार परिषद् के वर्ष १९८५ से संस्थापक हैं। साथ ही एनआईएमए और हिंदी भवन,हिंदी साहित्य अकादमी सहित कई संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। आपकी लेखन विधा-उपन्यास, स्तम्भ तथा लेख की है। प्रकाशन में आपके खाते में-आनंद,कही अनकही,चार इमली,चौपाल तथा चतुर्भुज आदि हैं। बतौर पुरस्कार लगभग १२ सम्मान-तुलसी साहित्य अकादमी,श्री अम्बिकाप्रसाद दिव्य,वरिष्ठ साहित्कार,उत्कृष्ट चिकित्सक,पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी आदि हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-अपनी अभिव्यक्ति द्वारा सामाजिक चेतना लाना और आत्म संतुष्टि है।

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