विशिष्ट अंदाज में सुख-दु:ख बयान करती है ‘खुदा की देन’

भूपिंदर कौर  ‘पाली’ 
भोपाल (मध्यप्रदेश)
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पुस्तक समीक्षा…………


डॉ.तारिक असलम ‘तस्लीम’ का लघुकथा संग्रह-खुदा की देन पढ़ने का मौका मिला,जिसका मुख्य पृष्ठ ही बादलों में वह पहाड़ों की गोद में छिपे चाँद से पुस्तक की गहनता पर गंभीरता का एहसास पाठकों को अपनी ओर आकर्षित करता जान पड़ता है। लेखक के समर्पित भाव को,जो लघुकथाओं के रूप में विभिन्न व्यक्तित्व से जुड़े हर लम्हें चुभन और एहसास को,जिसने दिल के खालीपन को अपने सफलता के रंग से भरने का अथक प्रयास किया है।
पटना से प्रकाशित इस पुस्तक में शत एहसासों से सराबोर लगभग १०० लघु कथाएँ अपने विशिष्ट अंदाज में सुख-दु:ख बयान करती हैं,चाहे ‘खुदा की देन’ के रूप में नसीहत ही क्यों ना हो। आज की युवा पीढ़ी ‘छोटी-सी बात’ कहकर अंधी दौड़ में शामिल हो जाना चाहती है। ‘आज की पीढ़ी’ किसी भी जात-मजहब की हो भारतवासी होने में गर्व महसूस करती है,और ‘खेमेबाजी’ की बात पर कुछ सोचने पर मजबूर हो जाती हैl बुरे दिनों में परेशान आदमी चाहे हिंदू हो,या मुसलमान ‘तावीज़’ के नाम पर कटाक्ष पर सोचने पर मजबूर पर मानव मजबूर हो जाता हैl एक उदाहरण देखिए-“दोजक में जाने वालों में एक बहुत बड़ी जमात ऐसे लोगों की होगी,जो दुनिया में खुदा के नाम पर कुरआन की आयतों को किसी बहाने बेचा करेंगे। कहीं झूठ पर टिकी शादी का ‘अफसोस’ है तो कहीं बेटी अपने पापा से प्रश्न करती नज़र आ रही है-ऐसा क्यों किया पापा ?
दहेज लोलुप्ता का ‘वास्तविकता’ में पूर्णता दर्शन हो जाता है। पर उपदेश कुशल बहुतेरे।पत्र का हाल देखिए गलत जगह गया पत्र ‘आरजू’ तुषारापात कर गया। आज भी औरतों को ‘सोने का अंडा’ देने वाली मुर्गी ही समझा जाता है,चाहे वह विधवा ही क्यों न हो। ‘भेदभाव’ लघुकथा दिली भेदभाव के दर्शाती हुई सामाजिक कुरीति व नकारात्मक सोच पर करारी चोट करती है। ‘भद्दा मजा़क’ लघुकथा सभी को आगाह करती सरासर सही जान पड़ती है। अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत। अनचाहे राज का पर्दाफाश करती लघुकथा खुदा खैर करे करारा व्यंग्य जान पड़ता है।
यह लघुकथा संग्रह शुद्ध रूप में मुस्लिम समाज व संस्कृति को पेश करने में पूर्णता सफल रहा है। ज्यादातर लघुकथाएँ वर्णनात्मक शैली में लिखी गई हैl बड़े संवादों की बौछारें भी दिखाई पड़ती हैं। कहीं-कहीं लघु कथाएं प्रश्न पूछती दिखती हैं। इस पुस्तक से मुस्लिम भाषा,परिवेश व उनकी परम्पराएँ रीति-रिवाज का भी पाठक सहज ही जानकार हो जाता है,तो कुछ शब्दों को समझने में भी अपने-आपको असमर्थ पाता हैl मानव के मूल स्वभाविक गतिविधियां सोच- विचार हो चाहे,किसी भी समाज व धर्म का जानने वाला हो उनकी सोच में कहीं भी फर्क नहीं दिखाई देताl इस बात को लेखक पाठकों तक पहुँचाने में पूर्णत: सफल रहा है। आगे भी लेखक से अपेक्षा है कि,इस तरह के लघुकथा संग्रह हमें और पढ़ने को मिलेंगे।

परिचय-भूपिंदर कौर का साहित्यिक उपनाम ‘पाली’ है। जन्म तारीख १ अप्रैल १९५७ तथा जन्म स्थान-पटियाला (पंजाब)है। आपका वर्तमान और स्थाई पता भोपाल (म.प्र.)है। पंजाबी एंव हिन्दी का भाषा का ज्ञान रखने वाली भूपिंदर  कौर एम.ए.और बी.एड. शिक्षित हैं। स्वतंत्र लेखन ही कार्यक्षेत्र है। सामाजिक  गतिविधि के अंतर्गत कई सामाजिक व साहित्यिक संस्थाओं में सक्रियता से जुड़ी हुई हैं। इनकी लेखन विधा-कविता, कहानी,लघुकथा,समीक्षा,बाल साहित्य, हायकु और वर्ण पिरामिड आदि है। प्रकाशन में आपके खाते में-वो हुए न हमारे(कथा संग्रह)है। पंजाबी भाषा सहित अन्य पत्र-पत्रिकाओं में लघुकथाएँ और समीक्षा आदि प्रकाशन हुआ है। इनकी विशेष उपलब्धि-साझा संग्रह-शत हाइकुकार,लघुकथा संग्रह-खंड-खंड जिंदगी और सहोदरी लघुकथा है। पाली की लेखनी का उद्देश्य-स्वांतः सुखाय ही है। प्रेरणा पुंज-पूज्य माता जी हैं। 

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