‘वेलेंटाइन-डे’ एक अभिशाप…

मंगल प्रताप चौहान
सोनभद्र(उत्तर प्रदेश)

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धर्म,शिक्षा और साहित्य के लिए विश्वविख्यात देश में आज प्रेम का प्रतीक माना जाने वाला ‘वेलेंटाइन-डे’  भारतवर्ष की सभ्यता एवं संस्कृति के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं है। वर्तमान युवा पीढ़ी अपने कर्तव्यों एवं जिम्मेदारियों से विमुख होते हुए अपने चरित्र का सत्यानाश रोज- डे,चाॅकलेट-डे,प्रपोज-डे,हग डे (गले मिलना),किश डे और अंत में वेलेंटाइन-डे के चक्कर में
पड़कर कर रही है। ये वही आर्यावर्त है,जहां कभी श्रवण एवं मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जैसे आज्ञाकारी पुत्र अपना पूरा जीवन माँ-बाप की सेवा एवं वचनों का पालन करने में व्यतीत कर देते थे। ये वही हिंदुस्तान है,जहां कभी राणा कुम्भा,राणा सांगा,बप्पा रावल,दाहिरसेन,पृथ्वीराज चौहान,दुर्गादास राठौड़,छत्रपति शिवाजी और महाराणा प्रताप जैसे शूरवीर योद्धाओं ने जन्म लिया। ये वही भारत है जहां महारानी लक्ष्मीबाई,अवंतीबाई, महारानी पद्मिनी और सुभद्रा कुमारी चौहान जैसी नारी शक्तियों ने जन्म लिया और अपने मान-सम्मान एवं स्वाभिमान के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। ये वही हिंदुस्तान है जहां हजारों वर्षों की गुलामी सहने के बाद हमारा देश इन्हीं महान शूरवीरों और सैकड़ों महान क्रांतिकारियों जैसे भगतसिंह, रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद,सुभाषचन्द्र बोस आदि के देशप्रेम और देशभक्ति की बदौलत आजाद है। यदि पहले की युवा पीढ़ी भी वर्तमान युवा पीढ़ी की तरह ऐसे ढोंग में पड़ी होती तो शायद हमारा देश आज भी गुलाम होता। ‘रिवोल्यूश्नरी एंड द ब्रिटिश राज’ में श्रीराम बक्शी लिखते हैं- “१४ फ़रवरी १९३१ में पं. मदन मोहन मालवीय ने वायसराय को टेलीग्राम किया और अपील की कि भगत सिंह,राजगुरू और सुखदेव को दी गई फांसी की सज़ा को उम्रक़ैद की सज़ा में बदल दिया जाए।” लेकिन देश के हीं कुछ अराजक तत्व और देश के लिए धब्बा कहे जाने वाले नेहरू एवं गांधी जैसे लोगों ने इसका समर्थन नहीं किया और बाद में इसे खारिज कर दिया गया। वेलेंटाइन-डे अंग्रेजों द्वारा पश्चिमी देशों से आया हुआ एक ऐसा अराजक नशा है जो देश, समाज और लोगों के चारित्रिक एवं मानसिक विकास को नष्ट करके भारतीय संस्कृति को आघात पहुंचाना चाहता है। यदि इंसान सच में किसी से सच्ची मोहब्बत करता है तो उसे इजहार करने के वर्ष के कुल ३६५ दिन होते हैं सिर्फ वेलेंटाइन-डे हीं नहीं। भारत और अमेरिका सहित दुनिया के कई देशों में इसके मनाने पर विरोध एवं प्रतिबंध होने लगे हैं। अमेरिका के ६० प्रतिशत उच्च पदों पर भारतीय मूल के निवासी काबिज हैं। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने अमेरिकी नागरिकों को सावधान किया,उनका मानना था कि भारतीय अपने मन को केन्द्रित करते हुए गहन अध्ययन करते हैं और अपने चारित्रिक एवं नैतिक मूल्यों का विकास करते हैं इसलिए आज वो हमारे देश में इतने अधिक और उच्च पदों पर आसीन हैं। आज के युवाओं को अपने मन को केन्द्रित करने, अपने कर्त्तव्यों,जिम्मेदारियों को समझने और देश की उन्नति के लिए विज्ञान,शिक्षा एवं तकनीकी के क्षेत्र में नये अनुसंधानों की खोज करने की सख्त जरूरत है। देश के भविष्य कहे जाने वाले युवाओं को वेलेंटाइन के चक्कर में ना पड़कर अपना समय देशहित के कार्यों में,माता-पिता की सेवा में,गरीब-दुखियों की सेवा में,धर्म, शिक्षा एवं साहित्य के क्षेत्र में, मानवता,इंसानियत और सार्वभौमिकता की भावना में और देश की ऐतिहासिक धरोहरों एवं संस्कृति की रक्षा करने में व्यतीत करना चाहिए। वेलेंटाइन-डे पर  देश की रीढ़ की हड्डी कहे जाने वाले किसानों एवं सीमा पर तैनात जवानों को शत्-शत् नमन..वंदे मातरम् जय हिन्द,जय जवान जय किसान।

परिचय-मंगल प्रताप चौहान की जन्मतिथि २० मार्च १९९८ और जन्म स्थान-ग्राम अकछोर राबर्ट्सगंज, जिला सोनभद्र(उत्तर प्रदेश) है। यहीं आपका निवास है। वाणिज्य से स्नातक श्री चौहान ने यू.जी.डी.सी.ए., डी.एल.एड.,एन.एस.एस. और एन.सी.सी. की शिक्षा भी ली है। आपका कार्यक्षेत्र-शिक्षा,साहित्य एवं समाजसेवा है। सामाजिक गतिविधि के तहत आप समाज में व्याप्त नकारात्मक शक्तियों को अपनी कलम की लेखनी से उखाड़ फेंकने की क्षमता के साथ सक्रिय हैं। इनकी लेखन विधा-कविता एवं लेख है। दिल्ली स्थित प्रकाशन से आपकी रचना का प्रकाशन हुआ है। ऐसे ही हरियाणा तथा अन्य के समाचार पत्रों में भी आपकी मुख्य रचनाएं छपी हैं। मंगल प्रताप चौहान की लेखनी का उद्देश्य-हिंदी भाषा को बढ़ावा देना और अपनी लेखनी से सकारात्मक परिवर्तन लाना है।

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