वो लाल कपड़ों वाली औरत

डॉ.समृद्धि शर्मा
जयपुर(राजस्थान)
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कुछ घटनाएं मन के किसी कोने में इतने गहरे तक पैठ जाती है कि विश्वास ही नहीं होता कि,वह सत्य नहीं है। फिर चाहे कोई उसे माने या न माने।
बात अभी कुछ समय पहले की हैl हम सबकी योजना बनी कि,हम लोग भानगढ़ घूमने चलें। उसके विषय में इतना सुन रखा था कि मैं थी कि,  जीवन में एक बार जरूर भानगढ़ जाया जाए। हम पांच-सात सदस्यों के अलावा वहाँ जाने को कोई भी तैयार न हुआ। जाने की इच्छा और बलवती हो गई,जब लोगों ने कहा कि वहाँ भूत-प्रेत का वास है। नियत समय पर निकलने का दृढ़ संकल्प कर सुबह जल्दी उठे,पर दिल में
अजीब-सी बेचैनी हो रही थीl पता नहीं,पर कुछ था जो नहीं चाहता था कि मैं वहाँ जाऊं,पर मन से हठी! मैं सामान पैक कर निकली कि माँ ने दूध का गिलास थमाते हुए कहा कि-`इसे पी जा,सारा दिन कहाँ भूखी  घूमती रहेगी`l हाथ में फ़ोन था,सो उसे रखते हुए गिलास पकड़कर कन्धे पर बैग टांग रही थी कि,सोचा ग्लास टेबल पर रख दूँ,नहीं तो गिर जाएगाl सोचा ही था कि ग्लास रखते-न रखते टेबल की जगह सीधे नीचे गिर गया। थोड़ी देर तक समझ नहीं आया कि,कैसे हुआ,पर माँ के डर से उसे बिना साफ किए ही भाग गई। खाली पेट और पहुँचने की जल्दी,सब इतनी जल्दी में हुआ कि,कुछ खरीद भी नहीं पाई। सोचा किसी ढाबे पर जाकर खाना खा लेंगे,पर हाय री! फूटी किस्मतl सब घर से नाश्ता करके आए थे तो किसी की सलाह न बनी कि अभी कुछ खाया जाए। खैर!,मन मसोसकर मैं भी चुप ही बैठी रही। वहाँ पहुचते हुए लगभग १२ बज गएl हम सब पूरी मस्ती में हर जगह को घूम-घूम कर तस्वीरों में कैद कर रहे थे कि,मुझे अहसास हुआ कि मैं जिस भी तस्वीर को कैद रही हूं,वो खींच ही नहीं पा रही। देखा तो कैमरा बिल्कुल सही था,सबकी तस्वीरें खिंच रही थी सिवा मेरे। समझ नहीं आया, माज़रा क्या हैl बार-बार कैमरे पर एक धुंध की परत आ रही थी। थककर मैंने तस्वीर खींचना छोड़ वहीं बैठकर प्रकृति का आनंद लेना चाहा कि,महसूस हुआ-प्यास लग रही है।
अपनी सखी नीलम को बोल मैं पानी ढूंढने लगी। दूर एक औरत लाल कपड़े पहने मटका लिए बैठी थीl उसका मुँह ढंका हुआ था,सो मैंने बिना बोले ही इशारे से पानी के लिए बोला,पर वह बहुत देर तक मुझे देखती रहीl फिर हाथ में लौटा ले पानी भरकर दे दिया। पानी पीने के बाद मैं कुछ कदम चली ही थी कि,मुझे एहसास हुआ कि यहाँ घूमने वाले सारे लोग गायब हो गए हैं,चारों तरफ अजीब कपड़े पहने लोग कुछ खरीददारी कर रहे हैं। मैं बड़ी परेशानी में थी कि,यहाँ हो क्या रहा है।थोड़ी दूर चलने पर वही लाल कपड़े वाली औरत वही मटका लिए बैठी थी। मैं उससे पूछने ही वाली थी कि,उसने अपना घूंघट हटा दिया। मैं चीख मारकर गिर पड़ी। वो….वो…..वो औरत आधी जली हुई थीl उसका ….उसका चेहरा अभी भी जल रहा था,मांस के जलने की बू नथुनों से टकरा गई। वो मुझ पर पानी का लोटा लिए झुक रही थी…l मैं बेहोश होने लगी। जब होश आया तो सारे दोस्त मेरे पास थे। उन्होंने बताया कि मैं घूमते हुए भानगढ़ के बाजार की और चली गई थीl भूख और प्यास की वजह से चक्कर आ गए। मैं समझ नहीं पाई कि,ये मेरे साथ क्या हो रहा है,पर रह-रहकर वो लाल कपड़ों वाली ठेठ राजस्थानी औरत याद आ रही थी। घर पहुँचने पर जब मां को पता लगा तो,उन्होंने पहले तो डांटा,फिर नज़र उतारी। उन्हें भी लगा कि मैं भूख और प्यास से बेहोश हो गई थी,पर…उन्हें कैसे बताती कि वो सब सच था। वो औरत…..आज भी……मेरे साथ…..मुझमें रहती हैl
परिचय-डॉ.समृद्धि शर्मा की जन्मतिथि -२० नवम्बर १९८१ है। राजस्थान राज्य के जयपुर में टोंक मार्ग पर आपका निवास है। आपकी शिक्षा विद्या वारिधि (पी.एच-डी),अधिस्नातक (हिंदी)तथा स्नातक (हिंदी प्रतिष्ठा)है। निजी शाला में हिन्दी अध्यापिका आपकी सम्प्रति है।डॉ.शर्मा की सम्मान-उपलब्धियां देखें तो राजस्थान के प्रसिद्ध पत्र में कहानियों का निरंतर प्रकाशन और जयपुर में शोध-पत्र प्रकाशन होना है। ऐसे ही विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन जारी है। दूरदर्शन व आकाशवाणी में भी  सहभागिता करती हैं। सांझा काव्य संग्रह ‘शब्द मुखर हैं’ में रचना प्रकाशन हुआ है। आपको काव्य सम्पर्क सम्मान मिला है। 

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