शब्दप्रेमी हूँ

कुलदीप गौड़ ‘जिज्ञासु’
पौड़ी गढ़वाल(उत्तराखंड)
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शब्दप्रेमी हूँ,
शब्दों के झूले में झूल रहा हूँ।
शब्द मेरी बैचेनी के,
शब्द मेरी तन्हाई के
शब्द आक्रोश के,
शब्द गलतियों के
शब्द अपने सपनों के,
शब्द अपने कर्तव्यों के
शब्द किसी के वादों के,
शब्द किसी के दावों के
शब्द मर्यादा के,
शब्द श्रद्धा के
शब्द स्नेह के,
शब्द खामोशी के
शब्द विद्रोह केl

अब पहचानो,
मैं किन शब्दों में झूल रहा हूँ ?
शब्दप्रेमी हूँ,
शब्दों के झूले में झूल रहा हूँll

मैं जानता हूँ,तुम मुझे,मेरे शब्दों के अर्थों में ढूंढते हो,
और मैं,मैं अपने को उन शब्दों में घोलता हूँ…
लेकिन पहले शब्दों को तौलता हूँl
मैं हर शब्द में समा नहीं सकता,
इसीलिए तुम्हारी खोज में आ नहीं सकता।

शब्दप्रेमी हूँ,
शब्दों के झूले में झूल रहा हूँl
शब्द कुछ कल्पना के,
शब्द कुछ सच्चाई के
शब्द कुछ बुने हुए,
शब्द कुछ चुने हुए
शब्द कुछ अनुभूति के,
शब्द कुछ परिणिति के
शब्द कुछ अनुमान के,
शब्द कुछ स्वाभिमान के
शब्दप्रेमी हूँ,
शब्दों के झूले में झूल रहा हूँ।

ये शब्द केवल सच्चाई के नहीं,
पर सच है,ये शब्द झूठ नहीं।
इन शब्दों में कल्पना है कहीं,
इन शब्दों में अनुमान है कहीं
इन शब्दों में स्वाभिमान है कहीं,
जीवन के रंगों को उभारने की लालसा है कभी,
परबुध्दि आंदोलित करने की व्यंजना है कभी।
इन शब्दों से कभी सत्य तक पहुँचने का मार्ग बनाता हूँ,
तो कहीं अशाब्दिक मनोभावों को उद्दीपित करने का यत्न करता हूँ
शब्दप्रेमी हूँ,
शब्दों के झूले में झूल रहा हूँ।

इन्हीं शब्दों में कहीं गुम हूँ मैं,
बहुत कुछ कहकर भी गुमसुम हूँ मैं।
सच तो ये है,क्या हूँ,कौन हूँ मैं ?
मन कहता है,ये प्रश्न तुम्हीं पर छोड़ दूँ मैं।

शब्दप्रेमी हूँ,
शब्दों के झूले में झूल रहा हूँl
खुद को शब्दों में ही घोल रहा हूँ,
पर शब्द ये हमेशा बिखर जाते हैं
कुछ इधर,तो कुछ उधर जाते हैं,
कैसे समेट कर ढूंढ लाओगे मुझे
कैसे इन शब्दों में पहचान पाओगे मुझे।
शब्दप्रेमी हूँ,
शब्दों के झूले में झूल रहा हूँ।

शब्द कुछ हिंदी के,
शब्द कुछ संस्कृत के
शब्द कुछ ऊर्दू के,
शब्द कुछ अंग्रेजी के
शब्द मिश्रित भाषा के,
शब्द कुछ उलझे-उलझे
शब्द कुछ सुलझे-सुलझे,
शब्द कुछ सीधे
शब्द कुछ व्यंग्य के।
शब्दप्रेमी हूँ,
शब्दों के झूले में झूल रहा हूँ।

इन शब्दों में इतना डूब गया,
अपनी औकात ही भूल गया
क्यों कोई ऐसे ढूंढे मुझको,
शब्दों के उलझे जालों में
क्या रखा है इन शब्दों में,
ऐसे ही इनको जाने दें।

शब्द हैं बिखरते रहेंगे,
कभी असरदार,तो कभी बेअसर रहेंगे
कभी दिल तक आएंगे,
कभी होंठों पर ठहर जाएंगे
कभी दिमाग में चढ़ जाएंगे,
तो कभी सत्ता हिलाएंगे।

शब्दप्रेमी हूँ बस,
शब्दों के झूले में झूल रहा हूँ
पर एक बात बताऊँ,
दुःखी बहुत हूँ,तभी ऐसे झूल रहा हूँ।
अन्यथा शब्दप्रेमी ही नहीं,
शब्दशिल्पी भी होता
पर शब्द प्रेमी हूँ,
शब्दों के झूले में झूल रहा हूँll

परिचय-कुलदीप गौड़ का साहित्यिक उपनाम-जिज्ञासु हैl ५ जुलाई १९९० को जन्मे श्री गौड़ का जन्म स्थान-ग्राम सिमल्या,तहसील-लैंसडौन,जिला-पौड़ी गढ़वाल(उत्तराखंड)है l आपका वर्तमान निवास उत्तराखंड राज्य स्थित हरिद्वार में हैl शहर सिमल्या वासी कुलदीप गौड़ की शिक्षा आचार्य (व्याकरण),संस्कृत-हिंदी में स्नातोकोत्तर सहित `नेट`-जेआएफ तथा पीएचडी जारी हैl शोधार्थी के रूप में शिक्षा ही आपका कार्यक्षेत्र हैl सामाजिक गतिविधि के निमित्त अपने निवास पर संस्कृत शास्त्रों की निःशुल्क शिक्षा देना तथा कई माध्यम से शिक्षा प्रसारित करना हैl इनकी लेखन विधा-लेख, कविता,व्यंग्य,पत्रकारिता और आलोचना हैl कुछ रचनाओं का प्रकाशन पत्र-पत्रिका में हुआ हैl सोशल मीडिया में खुद के पृष्ठ पर लेख-कविता आदि रचते हैं। आपकी लेखनी का उद्देश्य-अपने जीवन के संघर्ष व अनुभूतियों से स्वयं व पाठकों के लिए स्वयं शिक्षा का स्त्रोत स्थापित करना है। लेखन के लिए प्रेरणा पुंज- स्वयं का संघर्ष हैl

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