शानदार साहित्यकार थे बालकवि बैरागी

 हरि सिंह पाल
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एक शानदार कवि,एक बेमिसाल इंसान और एक लोकप्रिय जननेता बालकवि बैरागी का निधन सबके लिए क्षति है। नीमच के ख्यातनाम साहित्यकर व कवि बालकवि बैरागी का जन्‍म १० फरवरी १९३१ को हुआ था।
मूलत : मनासा क्षेत्र के बालकवि बैरागी साहित्‍य और कविता के सा‍थ राजनीति के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे। वे राज्‍यसभा के सदस्‍य रहे। इस सरस्‍वती पुत्र को कई सम्‍मानाें से नवाजा गया था। श्री बैरागी का मनासा में भाटखेड़ी रोड पर कवि नगर में निवास है। वहीं पर उन्‍होंने अंतिम सांस ली।
श्री बैरागी की गिनती कांग्रेस के वरिष्‍ठ नेताओं में होती थी। वे मध्‍यप्रदेश में अर्जुन सिंह सरकार में खाद्य मंत्री भी रहे। कवि बालकवि बैरागी काे मध्यप्रदेश सरकार के संस्कृति विभाग द्वारा `कवि प्रदीप सम्मान` भी प्रदान‍ किया गया।
उनकी यह रचना आज याद आती है-
चाहे सभी सुमन बिक जाएं
चाहे ये उपवन बिक जाएं
चाहे सौ फागुन बिक जाएं
पर मैं गंध नहीं बेचूंगा-अपनी गंध नहीं बेचूंगा
जिस डाली ने गोद खिलाया जिस कोपल ने दी अरुणाई
लक्षमन जैसी चौकी देकर जिन कांटों ने जान बचाई
इनको पहिला हक आता है चाहे मुझको नोचें तोड़ें
चाहे जिस मालिन से मेरी पांखुरियों के रिश्ते जोड़ेंl

ओ मुझ पर मंडराने वालों
मेरा मोल लगाने वालों
जो मेरा संस्कार बन गई वो सौगंध नहीं बेचूंगा
अपनी गंध नहीं बेचूंगा-चाहे सभी सुमन बिक जाएं।

मौसम से क्या लेना मुझको ये तो आएगा-जाएगा
दाता होगा तो दे देगा खाता होगा तो खाएगा
कोमल भंवरों के सुर सरगम पतझारों का रोना-धोना
मुझ पर क्या अंतर लाएगा पिचकारी का जादू-टोना
ओ नीलम लगाने वालों पल-पल दाम बढ़ाने वालों
मैंने जो कर लिया स्वयं से वो अनुबंध नहीं बेचूंगा
अपनी गंध नहीं बेचूंगा-चाहे सभी सुमन बिक जाएं।

मुझको मेरा अंत पता है पंखुरी-पंखुरी झर जाऊंगा
लेकिन पहिले पवन-परी संग एक-एक के घर जाऊंगाl

भूल-चूक की माफी लेगी सबसे मेरी गंध कुमारी
उस दिन ये मंडी समझेगी किसको कहते हैं खुद्दारी
बिकने से बेहतर मर जाऊं अपनी माटी में झर जाऊं
मन ने तन पर लगा दिया जो वो प्रतिबंध नहीं बेचूंगा
अपनी गंध नहीं बेचूंगा-चाहे सभी सुमन बिक जाएं।

(सौजन्य-वैश्विक हिंदी सम्मेलन,मुंबई)

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