शारदा, ममता और सीबीआई

अशोक कुमार सेन ‘कुमार’
पाली(राजस्थान)
**********************************************************************************
पश्चिम बंगाल में शारदा चिट फंड की जांच करने गए सीबीआई अधिकारी को ही बंदी बनाकर ममता बनर्जी ने केन्द्र के खिलाफ बगावती तेवर अपना लिए हैं। संघीय ढांचे के लिहाज से यह घटना कतई शोभनीय नहीं कही जा सकती। केन्द्र और राज्य की राजनीति में जीत भले किसी की भी हो,पर जनता की हार निश्चित है। खिसकती जमीन को बचाने हेतु धरना राजनीति चरम पर है। बंगाल में रोहिंग्या और घुसपैठियों का स्वागत है, वही दल विशेष के नेताओं के प्रवेश मात्र से लोकतंत्र खतरे में आ जाता है।
आखिर जिम्मेदार कौन ? आप खुद,जी हाँ आये- दिन समाचार पत्रों में चिट फंड कंपनियों के हजारों करोड़ रुपए के घोटालों की खबरें पढ़ने को मिलती रहती है। भारतीय अर्थव्यवस्था के छेदों का फायदा उठाकर बड़े राजननेताओं, अफसरों और तथाकथित पूंजीपतियों का यह गठजोड़ आम आदमी की भावनाओं से खेलता है।
इसमें आम आदमी भी उतना ही दोषी है,जितना दोषी ये गठजोड़ है। एक बार तो कोई मूर्ख बना दे,कोई बात नहीं,पर बार-बार मूर्ख बनना समझ से परे है। नाम बदल जाता है,लोग बदल जाते हैं पर निवेशक तो वही है। नाम किसी कम्पनी का लेने की आवश्यकता नहीं है,सब लोगों को पता है सबसे बड़ा घोटाला शारदा चिट फंड के नाम से हुआ था जो पांच से ज्यादा राज्यों में फैला थाl इसमें लाखों निवेशकों का पैसा डूबा हैl किसी फिल्मी सितारे को बुलाना,बड़े होटलों में भव्य आयोजन करना, मायावी चकाचौंध से आँखें फटी रह जाती है। उस फिल्मी सितारे को तो अपने मेहनताने से मतलब होता है,उसको आम निवेशक से क्या लेना-देना। अंतिम रूप से गलती तो पैसा लगाने वाले के लालच की है।
जरा सोचिए,क्या कोई वित्तीय संस्था भारत में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया से बड़ी हो सकती है ? नहीं न,तो फिर ये उससे ज्यादा राशी वापस कैसे दे सकती है,इतनी बुद्धि तो सबमें होनी चाहिए। यह सब मनी लॉन्ड्रिंग होती है। सरकार की आँखों में धूल झोंककर या यूं कहें कि आला अफसरों की मिलीभगत से नियमों में मौजूद खामियों का फायदा उठाया जाता है। किस स्तर पर किसके साथ खिंचाया गया चित्र निवेशकों को बताना है,बाकायदा पहले से तय होता है। एजेंट अपने कमीशन के चक्कर में अपने सगे-संबंधी,मित्रों और पड़ोसियों को चैन प्रक्रिया से जोड़ता है। सबसे बड़ी बात पैसा उसके पास जाता है जिसको आप सीधे नहीं जानते। खुद फँसे लोग अपना पैसा निकालने के चक्कर में दूसरे को फँसाते हैं और यह चैन चलती रहती है। आखिर जिम्मेदार आपका लालच ही है,जो आरबीआई से तेज गति से पैसा दोगुना करना चाहता है। कम्पनियों के नाम बदल जाते हैं,पर पात्र,घटनाएं और वाक़िये सब एक जैसा होता है। यह एक दिमागी खेल होता है जिसमें सामने वाले को लगता है कि अगर समय रहते यह कम्पनी स्वीकार नहीं की तो मेरा बहुत नुकसान हो जाएगा। ऐसे कई लोग देखे हैं जो किसी की मदद के नाम पर एक रुपया नहीं निकालते,पर उन्होंने ऐसी चिट फंड कंपनियों में लाखों का निवेश कर रखा होता है मात्र ज्यादा ब्याज की लालसा में। बुरा तो उन बेचारे गरीबों के साथ होता है,जो इन जालसाज एजेंट के चक्कर में अपनी मेहनत की कमाई लुटा बैठते हैं। बहरहाल,गुजारिश है कि अपनी मेहनत की कमाई सही योजना में ही निवेश करें। एजेंट और बाबाओं से दूर तथा सुरक्षित रहें।

परिचय-अशोक कुमार सेन का उपनाम ‘कुमार’ है। जन्म तारीख ३ मई १९८२ तथा जन्म स्थान-निमाज (जिला-पाली)है। वर्तमान में स्थाई पता निमाज (पाली)ही है। हिन्दी,अंग्रेजी व राजस्थानी भाषा की जानकारी रखने वाले श्री सेन की शिक्षा- स्नातकोत्तर है। आपका कार्यक्षेत्र-राजकीय कर्मचारी(नौकरी) का है। इनकी लेखन विधा-लेख और कहानी है। कुमार ब्लॉग पर भी लिखते हैं। लेखनी का उद्देश्य-लेखनी से मानव कल्याण एवं राष्ट्रहित के मुद्दे उठाना है। श्री सेन के लिए प्रेरणा पुंज-डॉ.अब्दुल कलाम हैं। विशेषज्ञता-समसामयिक आलेखन है।

Hits: 11

आपकी प्रतिक्रिया दें.