शिक्षा:एक वास्तविकता

रश्मि चौधरी ‘रिशिमा’
इंदौर (मध्यप्रदेश)
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आइए,हम बात करते हैं हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली की। पुरातन समय से ही भारत शिक्षा के क्षेत्र में बहुत आगे रहा है। उदाहरण के तौर पर हम बात करें तो आचार्य चाणक्य,स्वामी विवेकानंद, आर्यभट्ट,रामानुजन, सर्वपल्ली राधाकृष्णन की तो हम पाएंगे कि भारतीय शिक्षा प्रणाली और यहाँ के शिक्षाविदों का शिक्षा के क्षेत्र में बहुत योगदान रहा है परन्तु आज की हमारी शालेय शिक्षा का तरीका बच्चों को कहीं और ही ले जा रहा है। शिक्षित लोग किसी भी राष्ट्र के लिए बड़े  ही कीमती होते हैं,परन्तु हमारे बच्चे सिर्फ रट्टू तोते बन रहे हैं शिक्षित व्यक्ति नहीं। एक शिक्षित व्यक्ति वह होता है जो स्वयं खुश रहे,आसपास के वातावरण  को खुशनुमा रखे,समाज के लिए कुछ कर सके। उसका व्यवहार अच्छा हो,उसका परिवार मूल्यों से भरा हो,राष्ट्रहित की भावना हो। सबसे ज्यादा जरुरी बात है कि सुखी जीवन व्यतीत करता हो,परन्तु आज की युवा पीढ़ी जो हमारे देश की भावी कर्णधार है,उसमें इन सभी बातों का अभाव  है। इसका एकमात्र कारण है माता-पिता द्वारा बच्चों को समय न दे पाना और विद्यालयों में शिक्षा का पाठ्यक्रम और शिक्षा देने का तरीका। हमारे बच्चों में मूल्यों की कमी है क्योंकि￰ उन्हें पाठ्यक्रम रटवाया जा रहा है। बच्चों में पढ़ने और लिखने का कौशल ही विकसित नहीं हो पा रहा है। आजकल पाठ्यपुस्तकों को शायद ही बच्चे पढ़ते हों जबकि हम लोग पाठ्यपुस्तकों से ही सारा अभ्यास कर लिया करते थे।
जैसे कि हमने बच्चों को पढ़ा  दिया-
(ए+बी)xसी=(एxसी)+(बीxसी)
परंतु इसका हमारे दैनिक जीवन में क्या उपयोग है,न ये बात बच्चे जानते हैं,न ही उन्हें कुछ उत्सुकता है। वे बस अंकों और श्रेणी के लिए पढ़ाई करते हैं।
हमारी शिक्षा पद्धति मूल्यों पर आधारित नहीं है,हमारे पाठयक्रम में वर्षों तक ऐसा पढ़ाया जा रहा है,जो दैनिक जीवन में उपयोगी नहीं है। बात ये नहीं कि,ये सब नहीं पढ़ाना चाहिए, परन्तु कक्षा पहली से १०वीं तक का पाठ्यक्रम जो सामान्य ज्ञान है,उसे सीमित कर देना चाहिए। कुछ वर्षों तक बच्चों को सिर्फ वही पढ़ाया जाए,जिसमें उनकी रूचि है। सभी को सब-कुछ पढ़ाने में बच्चों का सारा बचपन बीत जाता हैऔर कोई भी परीक्षा या उसका परिणाम सभी की योग्यता सिद्ध नहीं￰ कर सकती।  यही एकमात्र कारण है कि,बच्चे शालात्यागी हो जाते है या तनाव  के कारण नशे की लत लगा लेते हैं। जो बहुत कोशिश करते हैं,पर सफल नहीं हो पाते,वे आत्महत्या तक जा पहुँचते हैं।
बड़े ही दुःख की बात है कि हम सब अपने बच्चों को चिकित्सक,अभियंता, प्रबंधक या जिलाधीश  ही बनाना चाहते हैं। आप ही बताइए,फिर शिक्षक,रसायन शास्त्री,सैनिक, किसान,दर्जी,रसोइए का कार्य कौन करेगा ? सच तो ये है हमें अपने बच्चों में कौशलों का विकास करना होगा,  जिसमें माता-पिता,शिक्षक,समाज एवं पाठ्यक्रम सभी को बदलना होगा। आज आवश्यकता है बच्चों को संस्कार,साहित्य की ऒर मोड़ने की। शिक्षा,साहित्य, समाज और राष्ट्र सभी एक-दूसरे से से जुड़े हैं। किसी ने बहुत ही बढ़िया बात कही है-
‘अंधकार है वहां,जहाँ आदित्य नहीं है,
मुर्दा है वो देश,जहाँ साहित्य नहीं है।’
तो दोस्तों हमें अपने देश को अंधकार की तरफ नहीं ले जाना है,कोशिश करना है वास्तविकता को समझने की और सही मायने में उसे पूर्ण करने की। शिक्षा प्रणाली ऐसी होना चाहिए, जिससे बच्चों का सर्वांगीण विकास हो। इसलिए आवश्यक है कि,हम अपनी सोच को भी बदलें। शिक्षा केवल धन उपार्जन का साधन बन कर न रह जाए,हमें प्रयास करना होंगे कि शिक्षा सम्पूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण करे। आइए,हम सब अपने अपने स्तर से इस कार्य में योगदान दें।

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