शि‍क्षा और स्वास्थ से कब तक दूरियां

हेमेन्द्र क्षीरसागर
बालाघाट(मध्यप्रदेश)
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 रोटी-कपड़ा-मकान जीवन के अनिवार्य तत्व थे,पर अब इस दौर में दवाई-पढ़ाई-कमाई-आवाजाई और वाई-फाई जुड़ गए हैं। क्या इनके बिना अब जीवन की कल्पना की जा सकती हैं,कदाचित नहीं!  हम बात करें शि‍क्षा और स्वास्थ्य की तो वह दयानतहारी बनी हुई है,उसमें सुधार की और अधि‍क गुजांईश है। संविधान में शि‍क्षा और स्वास्थ्य मौलिक अधिकारों में शामिल है,लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण ये दोनों ही मौलिक आवश्यकताएं अभी भी आम आदमी से दूर ही हैं। यह दूरियां कब तक बनी रहेंगी,यह यक्ष प्रश्न झंझोड़ता है। हालातों में एक गरीब बेहतर इलाज और अच्छी तालीम के लिए तरसता है।आखिर! यह व्यथा इन्हें कब तक झेलनी पड़ेगी,नामालूम है।
खोजबीन में मुख्य वजह शि‍क्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सरकार की बार-बार बदलती नीतियां,भ्रष्टाचार और जिम्मेवारों की गैरजवाबदेही सामने आती है। कारणवश शि‍क्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में निजी संस्थानों ने तमाम लूट-खसोट के बावजूद अपनी जड़ें जमा ली हैं। अब तो सरकार,सरकारी शालाओं को भी निजी हाथों में सौपने की तैयारी में हैं। अमलीजामा में जरूरतमंदों के लिए स्वास्थ्य के साथ-साथ शि‍क्षा भी दूभर हो जाएगी।
अलबत्ता,सरकारों ने भले ही शि‍क्षा का अधिकार अधिनियम,शि‍क्षा गारंटी, सर्वशि‍क्षा और स्कूल चलो अभियान जैसी महत्वकांक्षी योजनाएं तो बनाई,पर वास्तविकता यह है कि सरकारी शालाओं में न बैठने की जगह है,न शि‍क्षक,न आधुनिक शि‍क्षा के संसाधन। अब सरकारी विद्यालयों के हालात यह हो गए हैं कि आम इंसान तो क्या,एक राह चलता भिखारी भी अपने बच्चे को सरकारी शाला में भेजने से कतरा रहा है।
फिलहाल,निजी शालाओं में जब लोग बच्चों को दाखिला दिलाने के लिए जाते हैं तो उनके पैरों तले जमीन खिसक जाती हैं। सर्वाधिक लूट-खसोट बड़े समूह द्वारा संचालित ऑलीशान भवनों से सुस्सजित महिमा मंडितों से विभूषित राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय और बोर्डिंग नाम से युक्त केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा मंडल मान्यता प्राप्त व जैसी अंग्रेजी शालाओं  में होती है। अनाप-शनाप शुल्क और विविध पोशाकें, पुस्तकें,प्रतियोगिता, प्रवेश परीक्षा आदि गतिविधियुक्त स्कूलों में प्रवेश के लिए भारी जतन-यतन किए जाते हैं। विपरित स्थानीय आवश्कताएं आधारित ताम-झाम विहीन हिन्दी व अंग्रेजी माध्यम धारित शालाओं में शि‍क्षा अध्ययन की लालसा कम होती जा रही हैं। मूलतः शि‍क्षा की चिंता किए बिना, अच्छा विद्यालय चाहता है देश,शाला की चिंता किए बिना,अच्छा देश चाहते हैं लोग।
 सरकार ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक नहीं अनेक योजनाएं तो बनाई हैं,लेकिन उन योजनाओं में कभी बजट नहीं रहता और रहता भी है तो अमल में नहीं लाया जाता,तो कभी उनका लाभ पात्रों को नहीं मिल पाता। इसी बीच चिकित्सकों, नर्सिग व पॅरामेडिकलकर्मियों और पैथोलॉजी,रक्त व नेत्र बैंक,रेडियोलॉजी उपकरण की कमी सहित मूलभूत भवन, वाहन अनुलब्धता में आमजन सुलभ स्वास्थ्य उपचार से वंचित रह जाते हैं। तथापि पहुंच विहीन,असहाय अस्वस्थ्य का इलाज कैसे होगा,यह गंभीर सवाल आह्रलादित करता हैं। वीभत्स,सरकारी अस्पतालों में बेबश,लाचार लोग ही इलाज कराने पहुंचते हैं,वरना निजी चिकित्सालयों में तो मरीजों की लंबी कतार लगी रहती है।
मद्देनजर, हालिया देश में औसतन २० हजार की जनसंख्या में एक चिकित्सक उपलब्ध है। पूर्व में उल्लेखित वीओएचआर(वोर) कमेटी की अनुशंसानुसार पांच हजार की आबादी पर एक चिकित्सक होना चाहिए,जो प्रभावी नही हुआ है। इस हिसाब से आज हजारों की संख्या में चिकित्सकों की आवश्कता है। इसकी पूर्ति चिकित्सकों की संख्या में भारी वृद्धि करके की जा सकती है। तब ही मांग के अनुसार पूर्ति होगी। इस अनापूर्ति से कैसे समग्र उपचार का लक्ष्य अर्जित होगा,यह एक अत्यंत विचारणीय प्रश्न है ? यह तो ‘एक अनार सौ बीमार ‘ कथन का चरितार्थ है। इस पर शासन-प्रशासन को गंभीरता से विचार कर सर्वोचित हल निकालना ही होंगा। अन्यथा अस्पतालों,चिकित्सकों के अभाव में झोला छाप चिकित्सक,झाड़-फूंक या तंत्र-मंत्र पद्धति से आमजन अपना उपचार ग्रहण कर जान बचाएंगें या देगें….!
वस्तुतःशासकीय शालाओं और चिकित्सालयों की स्थिति  में अमूल-चूल नव-परिवर्तन लाकर शासकीय योजनाओं को कागजों पर चिपकाए ना रखकर धरातल पर लाना ही एकमेव हल है। दायित्व मात्र सरकारी तंत्रों व पहरेदारों का ही नहीं,वरन् हम सब का नैतिक कर्तव्य है,इसे हर हाल में निर्वहन करना पड़ेगा,तभी दूरियां नही अपितु नजदीकियां बढ़ेंगी।

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