श्रम ही ईश्वर 

बोधन राम निषाद ‘राज’ 
कबीरधाम (छत्तीसगढ़)
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श्रम ही ईश्वर रूप है,श्रम ही है भगवान।
श्रम से ही जीवन भला,कर लो श्रम इंसान॥

जागा सूरज भोर में,तू भी आँखें खोल।
हे मानव कर प्रार्थना,हरि से कुछ तो बोल॥

जीवन है अनमोल रे,कर ले कुछ तो नाम।
ना जाने कब उड़ चले,पंछी हुए तमाम॥

बचपन कितना प्यार से,पलता बढ़ता यार।
चिंता ना गम होत है,सुन्दर-सा संसार॥

सुन्दर मीठे फल वही,श्रम  से उपजा होय।
श्रम की यही महानता,श्रम बिन मिले न कोय॥

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