श्राद्ध और ब्राह्मण भोज

संध्या चतुर्वेदी ‘काव्य संध्या’
अहमदाबाद(गुजरात) 
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 आजकल एक नया फैशन और नई सोच समाज में तेजी से बढ़ रही हैl शिक्षित वर्ग इसका अनुसरण करते नजर आ रहे हैं,वहीं पुरातनवादी सोच के व्यक्ति इसका विरोध भी कर रहे हैं। क्या आप सभी में से किसी ने कभी सोचा है कि हम श्राद्ध पक्ष में ब्राह्मण को भोजन क्यों कराते हैं ? इस रीति के पीछे क्या राज है ?
हमारा समाज और उसकी परम्पराएं काफी पुरातन समय से चली आ रही है। पहले समाज चार वर्गों में बांटा गया था।
ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र।
सभी के अपने अलग-अलग कार्य नियत थे। ब्राह्मण का कार्य पूजा-पाठ और वेद पठन थाl ब्राह्मण की आय का साधन, जन्म से लेकर मृत्यु पर्यंत चलने वाले सभी संस्कारों को करना था,जिसमें मिली दक्षिणा से वह अपने परिवार और उसकी आवश्यकता को पूरा करता था। क्षत्रिय वर्ग के लोगों का कार्य समाज की रक्षा करना और संचालन करना था। समाज की नीतियों को संभालना था। अपने देश और धर्म की रक्षा करना क्षत्रिय का फर्ज थाl देश की रक्षा के लिए युद्ध करने का अधिकार क्षत्रिय वर्ग को थाl शस्त्र चलाने का अधिकार इनके पास सुरक्षित था।
तृतीय वर्ग वैश्य वर्ण के लोगों का कार्य रोजगार करना और व्यापार करना था। साहूकार से लेकर,दुकानदार तक सभी इसी वर्ण में आते थे और उनकी आय का साधन उनका अपना व्यापार था। सभी वर्ग के लोग अपना अपना कार्य करते थे।
चौथा वर्ग शूद्र था,जिस वर्ण के लोगों का कार्य सफाई करना था। चूँकि,शूद्र का कार्य समाज और मुहल्ले की सफाई का था,तो स्वास्थ्य और सुरक्षा की दृष्टि से लोग इन्हें छूते नहीं थे,क्योंकि उस समय गटर-पाइप लाइन्स नहीं थे। मल,मूत्र और गंदगी सीधा नाली में ही होती थी। शौचालय भी ऐसे होते जिसमें मल एकत्रित रहता था। उसको भरकर ये लोग नाली में बहा देते थे। तो कीटनाशक भी कहाँ थे उस समय,गोबर और कंडे जलाकर कीटाणु खत्म कर दिए जाते थे,तो कीटाणु ना फैले इसलिए,सफाईकर्मी को छूने की मनाही थी,लेकिन धीरे-धीरे कुरूतियों के कारण शूद्र को कुलीन और मलिन समझ कर समाज से नीचा और तुच्छ समझा जाने लगा,जो बनाई गई वर्ण व्यवस्था के विरुद्ध और अनुचित था।
अब बात करते हैं,प्रथम वर्ण यानी ब्राह्मण की,तो यह सबसे पूजनीय वर्ण था,इसलिए समाज में प्रथम स्थान मिला। उस समय वर्ण व्यवस्था के साथ ही चलती थी संस्कार व्यवस्था।
१६ संस्कार,जिसमें जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त सभी संस्कार जुड़े थेl इन सभी का संचालन का कार्य ब्राह्मण को था,क्योंकि संस्कार विधा के लिए वेद पढ़ने जरूरी थे।
वेद पाठन ब्राह्मण का कार्य था। ब्राह्मण को याचन हेतु मिली दक्षिणा से संतुष्ट रहना होता था। संतोष और ईश्वर भक्ति ही उनकी पहचान थी। माँगना धर्म के विरुद्ध था,इसलिए हर वर्ग का व्यक्ति,जो समाज का हिस्सा था,श्रद्धा से हर कार्य में प्रथम भाग ब्राह्मण को दे उसे सन्तुष्ट करता था।
भगवान की भक्ति और चिंतन में लीन रहने के कारण धरती पर ईश्वर को खुश करने हेतु,व्यक्ति ब्राह्मण को ही साधक मानते थे।
अपितु,वर्ण व्यवस्था की हानि से जहाँ सभी वर्ग के नीति और कार्यो में हस्तक्षेप हुआ,सभी व्यवस्था गड़बड़ा गई।
अब व्यक्ति किसी वर्ण और कार्य के बंधन से मुक्त हो अपनी रुचि अनुसार कार्य करने लगे। संस्कारों का पतन हो गया,सभी व्यवस्था क्षीण हो गई।
ब्राह्मण को भोजन इसलिए कराया जाता था,क्योंकि उसकी निज आय का कोई जरिया नहीं था। वैवाहिक कार्य में भी नियमानुसार चार महीने का निषेध था,तो इन चार मास में जब कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता था,तब उसकी आय का जरिया सिर्फ चढ़ावा या दक्षिणा ही थी।
मृत्यु के जो भी संस्कार होते हैं,वो अलग ब्राह्मण करवाते थे, क्योंकि उसकी अलग विधा और नियम होते थे। जो शुभ कार्य कराने वाले ब्राह्मण होते थे,वो इन चार महीने को आपकी भाषा में बेरोजगार समझ-बोल सकते हैं।
अब जो शिक्षित वर्ग `किसी गरीब को खाना खिला दो,श्राद्ध करने से बेहतर है`,ऐसी सोच रखते हैं,वो पढ़कर फिर सोचें कि शास्त्रों में जो भी वर्णन है,उसके पीछे बहुत गहरे राज और बहुत सोच-विचार कर ही बनाया गया होगा।
अपने घर के पितर को अगर हम एक दिन भोज नहीं दे सकते तो क्या हम सही कर रहे हैं ? मृत्यु जितना शाश्वत सच है, शास्त्र और पुराण भी उतना ही सत्य है। हम यही संस्कार अपनी पीढ़ी को टस्थानांतरित कर रहे हैं। तो,अपनी मृत्यु के पश्चात का दृश्य अभी से सोंचकर चलें। पाश्चात्यता को उतना ही अपनाएं,जितना हितकर होl बिना सोचे और जाने किया गया अनुसरण गति को नहीं,दुर्गति को आमंत्रण देता है।
परिचय : संध्या चतुर्वेदी का साहित्यिक नाम काव्य संध्या है। आपने बी.ए. की पढ़ाई की है। कार्यक्षेत्र में व्यवसाय (बीमा सलाहकार)करती हैं। २४ अगस्त १९८० को मथुरा में जन्मीं संध्या चतुर्वेदी का स्थाई निवास मथुरा(उत्तर प्रदेश)में है। फिलहाल अहमदाबादस्थित बोपल (गुजरात)में बसी हुई हैं। कई अखबारों में आपकी रचनाओं का प्रकाशन हो चुका है। लेखन ही आपका शौक है। लेखन विधा-कविता, ग़ज़ल, मुक्तक, दोहा, धनाक्षरी, कह मुकरिया,तांका,लघु कथा और पसंदीदा विषय पर स्वतंत्र लेखन है। संध्या जी की लेखनी का उद्देश्य समाज के लिए जागरुक भूमिका निभाना है। आपको लेखन के लिए कुछ सम्मान भी मिल चुके हैं

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