संजा व्रत और मालवी गीत की घटती परम्परा

विनोद वर्मा `आज़ाद`
देपालपुर (मध्य प्रदेश) 

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मालवा के दूरस्थ अंचलों तक भारतीय बालाओं की संस्कृति और संस्कार से जुड़ा यह व्रत उसकी प्रणय आकांक्षाओं और स्पंदन भावनाओं का आईना है। संजा बाई के व्रत करने से उसे श्रेष्ठ पति की प्राप्ति होगी। आस्था और विश्वास पर आधारित बालाओं का यह सोलह दिवसीय व्रत उनकी आकांक्षाओं की कलापूर्ण प्रकटता है।
भादव की प्रतिपदा से नवरात्रि की प्रतिपदा तक चलने वाला यह १६ दिवसीय व्रत सूर्यास्त के समय घर की बाहरी वेदी पर गोबर से चौकोर लीप कर उस पर गोबर से प्रतिदिन अलग-अलग मायने रखने वाली रचनाएं बनाई जाती है। उन्हें गुलतेवड़ी के फूलों के साथ अन्य फूलों की पंखुड़ियों और रंग-बिरंगी पन्नियों से सजाया जाता है। फिर कुंवारी कन्याएं इकट्ठा होकर संजाबाई के गीत गाकर आरती करती है व प्रसाद का भी वितरण किया जाता है।
क्रमानुसार संजा की आकृति बनाई जाती है।
१६ दिवस में प्रथम दिवस-सूरज चाँद और बीच में ५ टिपके बनाती है। द्वितीय दिवस-चन्द्रकोर और चौरस मांडती है। तीसरे दिन-छाबड़ी,चौथे दिन-घेवर,कुमार और कुमारियां,पांचवे दिन-पंचमी पूजन करती है। छठे दिन-चौपड़,सातवें दिन-स्वस्तिक और सप्तऋषि के सात टिपके लगाती है। फिर अष्टमी को अष्ठतीर्थ (८पंखुड़ियों वाला)फूल,नवमी को नागों की जोड़ी व गजलक्ष्मी की कृति बनाई जाती है। दशमी को पंखा,ग्यारहवें दिन केले का वृक्ष,बारहवें दिवस बिरन बाई की गाड़ी,तेरहवें दिन संजा बाई की कथा का प्रमुख पात्र ‘खोड़यो बामण’ की आकृति बनाई जाती है। चौदह दिवस क़िलाकोट बनाया जाकर विशेष पूजा होती है। १५वें दिवस खीर-पूरी का भोग लगाया जाता है। सोलहवें दिवस अंतिम पूजा की जाकर कुमारियों द्वारा बनाई गई समस्त प्रकार की संजा की आकृतियों को दीवार पर से निकालकर नदी-तालाबों में विसर्जित कर दिया जाता है।
#माँ पार्वती की आराधना का पर्व है ये संजा व्रत
माँ पार्वती का मायका(पीहर) मालवांचल को माना गया है। भोलेनाथ को पाने के लिए मैया पार्वती ने कठिन तप किया था,तब भगवान भोलेनाथ जैसे वर उन्हें प्राप्त हुए थे। इसी भावना के केन्द्र में मालव क्षेत्र की कुमारियाँ यह व्रत बड़ी संजीदगी और सेवा-भावना के साथ करती है। इस विश्वास के साथ कि हमें भी विशिष्ट वर प्राप्त हो।
प्रति रात्रि जगह-जगह गाये जाने वाले गीत के अन्तरे प्रस्तुत हैं,जिनसे आपकी यादें जीवंत होंगी-
१-संजा तू थारा घर जा,के थारी माँ मारेगी,के कूटेगी,के डेली में पछाड़ेगी।

चाँद गयो गुजरात,हिरनी का बड़ा-बड़ा दांत,छोरा-छोरी डरपेगा भय डरपेगा।
२-म्हारा आंगने केल उगी-केल उगी,उगजो अच्छी-सी डाली।

म्हारा बिराजी चढ़वा लाग्या-चढ़वा लाग्या,चढ़जो अच्छी सी डाली-चढ़जो अच्छी-सी डाली।

म्हारा देवरजी चढ़वा लाग्या-चढ़वा लाग्या।

चढ़जो सड़ी-सी डाली-चढ़जो सड़ी-सी डाली।

म्हारा बिराजी पढ़वा लाग्या-पढ़वा लाग्या।

लऊ रे गादी ने ताकिया,लऊं रे गादी ने तकिया।

म्हारा देवरजी पढ़वा लाग्या-पढ़वा लाग्या।

लऊं रे कांटा ने भाटा-लऊं रे कांटा ने भाटा।

इसी प्रकार भाई यानी बिराजी के लिए हलवा पूरी,देवर के लिए सूखा-सा रोटा की बात की जाती है। भाई के बेटे के लिए झगल्या ने टोपी लाने का कहकर देवर के बेटे को सिल्ला पर पटकने का गीत गाया जाता है।
३-काजल-टीकी लो भई काजल टीकी लो,काजल टीकी लई ने म्हारी संजा बई ने दो।

सन्जाबाई का पीहर पागा में,पदम पधारिया घडियल में।

गुलाम थारी चाकरी,गुलाम थाका देस।
छोड़ो म्हारी चाकरी,पधारो थाका देस।
४-संजा तू एकल्ली मत जा,साथे उषा ने लई जा।

उषा तू एकल्ली मत जा,साथे संगीता ने लई जा।

५-जामुन के पेड़ नीचे गिरा में बटुवा।
चाँद-सूरज की बऊ ने चुराया मेरा बटुवा।

चांदी ले-ले,सोना ले-ले,दे-दे मेरा बटुवा।
वैशाली की मम्मी ने चुराया मेरा बटुवा।
६-संजा के पीछे मेंदी को झाड़-मेंदी को झाड़,

एक दो पट्टी गिरती जाय-गिरती जाय।
संजा एक दो पत्ती चुनती जाय-चुनती जाय,

उधर से आई गैया-गैया,गैया ने दिया दूधे-दूधे।
दूध की बनाई खीरे-खीरे,खीर चटाई मामा को-मामा को……..

7-कोट चढ़-चढ़ देख म्हारो कौन सो बीरो आयो,
म्हारो चाँद-सूरज बीरो आयो,कई लायो?

गाड़ी लायो,गाड़ी में छोटी-सी लाड़ी लायो।

लाड़ी का पांव में पायजब,घुंघरू वाला पायजब।

संजा गीत में संजा कुछ मांगती भी है-

संजा तो मांगे हरो-पीलो गोबर,
काँ से लव बई संजा,हरो-पीलो गोबर।

संजा का दादाजी ग्वाल घरे गया, वां से लव बई संजा हरो-पीलो गोबर…।

छोटी-छोटी बिछिया घड़ई दीजो,सासरिया में पेरांगा,

सासरिया का ओड़ा लोग,खाये खजुरा बेचे बोर,
बोर की गुठली लइग्या चोर,चोर का घर में नाचे मोर।

मोर-मुरकल्या उड़ी गया,सासू रांड रई गया।

संजा तू बड़ा बाप की बेटी,खाय-खाजा रोटी ।

तू पैने माणक-मोती,

पठानी चाल चाले,गुजराती बोली बोले।

संजा एवड़ो ले,माथे बेवड़ो ले।

तोता-तोता रे थारी चौंच पीली,

जाजे-जाजे रे संजा बई का सासरे,

लाजे-लाजे रे हवई जहाज में बिठई के।

कुड़-कुड़ रे म्हारा खोडिया बामण,

संजा ने लेवा आयो रे,साथे कय लायो रे ।
लायो थो बई लायो थो, बाटे भूली आयो थो।

संजा का सासरे जावांगा,खाटों- रोटो खावांगा।

संजा की सासू धुतड़ली-धुतड़ली,

काम करे धमका से-धमका से।
मैं बैठूंगा गादी पे-गादी पे,ऊके बिठवँगा खूंटी पे-खूंटी पे।

#ससुराल वालों को विभिन्न प्रकार की उपमा से सम्बोधित करते हुए गीत गाया जाता है-

संजा बई का ससुराजी कैसा ? हाथ में लकड़ी बूढ़ा जैसा।

संजा बई की सासू कैसी ? हाथ में…जैसी।

संजा बई का जेठ कैसा ?…बन्दर जैसा। जेठानी-लखारन देवर-राण्ड्या जैसा,देवरानी-पनिहारिन

संजा बई आपका पति देव कैसा ?
कुर्सी पे बैठे कलेक्टर जैसा।

संजा बई आप कैसी ? दीवाल में बैठी लक्ष्मी जैसी।

म्हारा उरा पे कौन-सो बीरो पौथी बांचे रे भम्मरिया,
म्हारा उरा पे चांद-सूरज बीरो पौथी बांचे रे भम्मरिया।

चांद-सूरज बीरा की बऊ के ओढ़ते नी आय पेरते नी आय,

संजा ननद के बुलवाओ रे भम्मरिया।

संजा ननद की ऊंची नाक-नीची नाक काली पाटी,

लाल चूड़ा,मोत्या से मांग भरई दो रे भम्मरिया।

गाड़ी नीचे जीरो बोयो,सात सहेलियां जी,
वणी जीरा की मैं साग रान्दी,सात सहेलियां जी,

वाय साग मैंने बीराजी के मिली,सात सहेलियां जी,

बिराजी बोले म्हने कवड़ी-कवड़ी  लागे,सात सहेलियां जी।……

संजा बाई के पति देव पर गीत

संजा बई का लाड़ा जी,लुगड़ो लाया जाड़ा जी,

असो कय लाया आरी को,
लाता गोट किनारी को।

संजाबई तो फैशनदार-फैशनदार,
उनको लुगड़ो रेशमदार-रेशमदार।

#पीहर आते वक्त संजाबई की चंचलता देखते ही बनती है-

छोटी-सी गाड़ी रुढ़कती जाय-रुढ़कती जाय,
जिमें बैठ्या संजा बाई,घाघरो घमकाता जाय,

चूड़िलों खनकाता जाय,बिछिया बजाता जाय,
ब्यानजी की नथनी झोला खाय-झोला खाय,

पीयर की बात बताता जाय।

संजा गांठ गठीली,संजा भोत हठीली।

वा तो मांगे सोना की अंगूठी,ऊपर मोर नचैया,
नीचे घुंघरू डलैया,भैया-भाभी के विनय्या ।

अंत में आरती की जाती है…

संजा जीमले-चुटले,मैं जीमव सारी रात,

फुला भरी रे परात।

एक फूलो घटी गयो संजा माता रूठी गय,

क्यों रूठे संजा माता चुड़ैलों पिन्नाय दूँ,
चूड़ा ऊपर मोर नाचे,मोरिया नचाय दूँ।

मोरिया भय मोरिया गुलतेवड़ी का फूल,

सोय राधा-रुखमा थाल परोसे,  संजा माता जीमण छे।

अंत में एक गीत और…

सालभर में अईं वो संजा,सोला दिन पूजई रे।
गोबर से हमने उकी सोभा बढ़ई रे,साल भर में…

इसमें एक बात और होती है,जब लड़की की शादी हो जाती है तब वह पीहर में रहकर संजा व्रत को पूर्ण करती है। १६ दिवस इसी प्रकार से गीत-आरती के बाद अंतिम दिन शादी-शुदा लड़की व्रत का उद्यापन करती है। एक छोटी टोपली में गेहूं,फल और पैसे रखकर कुंवारी कन्याओं को भेंट की जाती है। अब बांस की छबडी नहीं मिलती है,इसलिए स्टील की कटोरी या प्लेट लेकर यह सामग्री भेंट की जाती है।
#विडम्बना
आजकल कई जगह गोबर को कन्याएं हाथ नहीं लगाती,इसका असर ये हुआ कि रेडीमेड रंगीन ताव,कागज की संजा बनी-बनाई बाजार में उपलब्ध रहती है,उसी का इस्तेमाल किया जाने लगा है,जो साहित्य-संस्कृति रुपी परम्परा के लिए दुखद है|

परिचय-विनोद वर्मा का साहित्यिक उपनाम-आज़ाद है। जन्मतिथि १ जून १९६२ एवं जन्म स्थान देपालपुर (जिला इंदौर,म.प्र.)है। वर्तमान में देपालपुर में ही बसे हुए हैं। श्री वर्मा ने दर्शन शास्त्र में स्नातकोत्तर सहित हिंदी साहित्य में भी स्नातकोत्तर,एल.एल.बी.,बी.टी.,वैद्य विशारद की शिक्षा प्राप्त की है,तथा फिलहाल पी.एच-डी के शोधार्थी हैं। आप देपालपुर में सरकारी विद्यालय में सहायक शिक्षक के कार्यक्षेत्र से जुड़े हुए हैं। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत साहित्यिक,सांस्कृतिक क्रीड़ा गतिविधियों के साथ समाज सेवा, स्वच्छता रैली,जल बचाओ अभियान और लोक संस्कृति सम्बंधित गतिविधियां करते हैं तो गरीब परिवार के बच्चों को शिक्षण सामग्री भेंट,निःशुल्क होम्योपैथी दवाई वितरण,वृक्षारोपण,बच्चों को विद्यालय प्रवेश कराना,गरीब बच्चों को कपड़ा वितरण,धार्मिक कार्यक्रमों में निःशुल्क छायांकन,बाहर से आए लोगों की अप्रत्यक्ष मदद,महिला भजन मण्डली के लिए भोजन आदि की व्यवस्था में भी सक्रिय रहते हैं। श्री वर्मा की लेखन विधा -कहानी,लेख,कविताएं है। कई पत्र-पत्रिकाओं में आपकी रचित कहानी,लेख ,साक्षात्कार,पत्र सम्पादक के नाम, संस्मरण तथा छायाचित्र प्रकाशित हो चुके हैं। लम्बे समय से कलम चला रहे विनोद वर्मा को द.साहित्य अकादमी(नई दिल्ली)द्वारा साहित्य लेखन-समाजसेवा पर आम्बेडकर अवार्ड सहित राज्य शिक्षा केन्द्र द्वारा राज्य स्तरीय आचार्य सम्मान (५००० ₹ और प्रशस्ति-पत्र), जिला कलेक्टर इंदौर द्वारा सम्मान,जिला पंचायत इंदौर द्वारा सम्मान,जिला शिक्षण एवं प्रशिक्षण संस्थान द्वारा सम्मान,भारत स्काउट गाइड जिला संघ इंदौर द्वारा अनेक बार सम्मान तथा साक्षरता अभियान के तहत नाट्य स्पर्धा में प्रथम आने पर पंचायत मंत्री द्वारा १००० ₹ पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। साथ ही पत्रिका एक्सीलेंस अवार्ड से भी सम्मानित हुए हैं। आपकी विशेष उपलब्धि-एक संस्था के जरिए हिंदी भाषा विकास पर गोष्ठियां करना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिंदी भाषा के विकास के लिए सतत सक्रिय रहना है।

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