संयुक्त परिवार कल और आज

ओम अग्रवाल ‘बबुआ’
मुंबई(महाराष्ट्र)
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विषय पर चिंतन करने से पहले हमें विषय को समझना होगा। परिवार का मतलब ही संयुक्त होना है। एकल व्यक्ति का परिवार होता ही नहीं,परन्तु संयुक्त परिवार से हमारा तात्पर्य अपने माता-पिता,भाई,भाभी,बहन और यदि अधिक विस्तार दें तो दादा-दादी,चाचा-चाची, ताऊ-ताई और उनके बच्चों को भी शामिल किया जा सकता है। अतीत में ऐसे ही परिवार होते थे और इन्हें ही परिवार कहते थे। बाद में शनै:-शनै: हमारी मानसिकता संकुचित होती गई और हम शादी के बाद पत्नी को साथ लेकर अन्य परिजनों से परे अपनी अलग दुनिया बसाने लगे और इसे एकल परिवार का नाम दिया गया।
दरअसल,जब सभी परिजन एकसाथ रहते हैं तो परिवार का दायित्व बँट जाता है। फिर चाहे आर्थिक दायित्व हो,अथवा शारीरिक श्रम। परिणामस्वरूप परिवार के हर सदस्य पर नगण्य भार पड़ता है। इसी प्रकार सामाजिक दायित्व भी सब मिलकर निभाते हैं। सुख-दुख भी सब आपस में साझा करते हैं। शारीरिक बीमारियों से लड़ने मे भी सबका सहयोग मिलता है। यानी जीवन सहज,सरल और सुगम हो जाता है। साथ ही सामूहिकता से रहने पर प्रति व्यक्ति आर्थिक बोझ भी कम होता है। बाहरी व्यक्ति से लड़ाई झगड़ा होने पर आत्मबल अत्यधिक होता है।
इसके विपरीत एकल परिवारों में स्थितियां बिल्कुल उलट होती हैं। फलस्वरूप जीवन कठिन और दूभर हो जाता है। सामाजिक और आर्थिक दायित्व बढ़ जाते हैं। सामान्यतया असुरक्षा का भाव अधिक होता है,जिससे प्रायः अवसाद की स्थिति आ जाती है।
उपरोक्त तो एकल और संयुक्त परिवार की तुलनात्मक विवेचना मात्र है जो आज का विषय है ही नहीं,परन्तु परिवारों की पृष्ठभूमि को समझे बिना विषय के साथ न्याय नहीं किया जा सकता, इसलिए उपरोक्त विवेचना जरूरी भी थी।
आईए,अब मूल विषय पर आते हैं। मेरे विचार से संयुक्त परिवार जैसे कल थे वैसे ही आज भी हैं,और वैसे ही आगे भी रहेंगे। संयुक्त परिवारों के अस्तित्व में बने रहने के लिए परिवार के सदस्यों को कुछ मूलभूत शर्तों का पालन करना होता है,जैसे-एक-दूसरे के प्रति प्रेम और सौहार्दपूर्ण व्यवहार,दयाभाव,क्षमा भाव, सहनशीलता,अधिकार अथवा प्रतिस्पर्धा से परे संतुष्टि का भाव आदि। जाहिर है कि ऐसे उच्च स्तरीय मानवीय मूल्यों से धनी परिवार सुखी,सम्मानित और समृद्ध तो होगा ही,वह अपने व समाज के लिए कल्याणकारी भी होगा। जब इन मानवीय मूल्यों का ह्रास होता है तो परिवार टूटने लगते हैं और विपदाओं के बीज अंकुरित होने लगते हैं। आजकल यही हो रहा है,इसीलिए संयुक्त परिवार अब कम दिखाई देते हैं,मगर जो भी संयुक्त परिवार आज हैं वे उतने ही महत्वपूर्ण,लाभकारी और गुणकारी आज भी हैं,जितने कल थे। संयुक्त परिवार और कुछ नहीं,बस नेह स्नेह का उपवन है। यदि हममें नेह स्नेह के बीज अंकुरित होते हैं तो हम स्वत: ही संयुक्त परिवार की तरफ अग्रसरित हो जाते हैं और यदि नहीं तो फिर संयुक्त परिवार की कल्पना ही बेमानी है,इस पर विचार अवश्य करें।
परिचय-ओमप्रकाश अग्रवाल का साहित्यिक उपनाम ‘बबुआ’ है।आप लगभग सभी विधाओं (गीत, ग़ज़ल, दोहा, चौपाई, छंद आदि) में लिखते हैं,परन्तु काव्य सृजन के साहित्यिक व्याकरण की न कभी औपचारिक शिक्षा ली,न ही मात्रा विधान आदि का तकनीकी ज्ञान है।आप वर्तमान में मुंबई में स्थाई रूप से सपरिवार निवासरत हैं ,पर बैंगलोर  में भी  निवास है। आप संस्कार,परम्परा और मानवीय मूल्यों के प्रति सजग व आस्थावान तथा देश-धरा से अपने प्राणों से ज्यादा प्यार है। आपका मूल तो राजस्थान का झूंझनू जिला और मारवाड़ी वैश्य है,परन्तु लगभग ७० वर्ष पूर्व परिवार उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में आकर बस गया था। आपका जन्म १ जुलाई को १९६२ में प्रतापगढ़ में और शिक्षा दीक्षा-बी.कॉम.भी वहीं हुई है। आप ४० वर्ष से सतत लिख रहे हैं।काव्य आपका शौक है,पेशा नहीं,इसलिए यदा-कदा ही कवि मित्रों के विशेष अनुरोध पर मंचों पर जाते हैं। लगभग २००० से अधिक रचनाएं आपने लिखी होंगी,जिसमें से लगभग ७०० का शीघ्र ही पाँच खण्डों मे प्रकाशन होगा। स्थानीय स्तर पर आप कई बार सम्मानित और पुरस्कृत होते रहे हैं। आप आजीविका की दृष्टि से बैंगलोर की निजी बड़ी कम्पनी में विपणन प्रबंधक (वरिष्ठ) के पद पर कार्यरत हैं। कर्नाटक राज्य के बैंगलोर निवासी श्री  अग्रवाल की रचनाएं प्रायः पत्र-पत्रिकाओं और काव्य पुस्तकों में  प्रकाशित होती रहती हैं। आपकी लेखनी का उद्देश्य-जनचेतना है।   

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