संवेदना के पुल का गिरना

सुनील जैन `राही`
पालम गांव(नई दिल्ली)

********************************************************

हमारी संभावनाओं का पुल न जाने कितनी बार गिरा। हर बार पुल गिरने से हमारा मनोबल भी धराशाई हुआ। हर बार हमने पुल बनाया,सजाया,संवारा और फिर से खड़ा कर दिया,लेकिन बिना किसी तूफान-आंधी के पुल भरभराकर फिर गिर गया। जब भी भावनाओं का पुल गिरता है,हम मर्म का मलहम लगाकर जोड़ लेते हैं,लेकिन पुल फिर गिर गया। 
पुल बनाने के लिए मन के सीमेंट का उपयोग किया गया। रिश्‍तेदारों का चूना लगाया और बच्‍चों के खून-पसीने से तर पानी का उपयोग किया,लेकिन पुल फिर भी धराशाई हो गया। पुल बनाने के लिए हर बार हमने नए-नए प्रयोग किए। हमने इस बार पत्‍नी की भावनाओं से पुल बनाया,जो सस्‍ता और टिकाऊ था,लेकिन ससुराल पक्ष की उपेक्षा के कारण वह ज्‍यादा दिन नहीं टिक सका।
पुल होने के लिए पुल के दोनों किनारों पर मजबूत पाए होने चाहिए। इन पायों को हम मां-बाप कहते हैं। एक के गुजर जाने के कारण पुल के कुछ हिस्‍सों में दरार आई और दूसरे के गुजर जाने से पुल बिना रेत की दीवार की तरह ढह गया। एकसाथ दोनों किनारे के महास्तम्भ के ढह जाने से पुल गिर जाता है। 
कई दिनों तक पत्‍नी के बनाए पुल के नीचे हमने अपना जीवन व्‍यतीत किया। उसके पुल में संबंधों का जुड़ाव था,सीमेन्‍ट के स्‍थान पर उसने समर्पण का उपयोग किया था। उसके समर्पण की बदौलत ही साले-सालियां खम्‍बे बने और पुल सलामत रहा। पुल नहीं गिरता, रोजगार ने पुल को जर्जर कर दिया। खम्‍बे धीरे-धीरे स्‍थान छोड़ने लगे, आखिरकार कब तक वह पुल बिना खम्‍बों के टिके रहता। 
हर कोई पुल बनाना चाहता है। संबंधों का पुल बनाना चाहता है। घर के लिए टिकाऊ पुल बनाना चाहता है,मां-बाप को किनारों की तरह स्थिर करना चाहता है,लेकिन इस पुल की उम्र होती है,बढ़ती उम्र पुल के लिए खतरनाक होती है,माता-पिता रूपी किनारे जब गिरने को मजबूर हो जाते हैं,उन्‍हें अस्‍पताल गिरोह के माध्‍यम से खड़े करने का प्रयास किया जाता है। पुल कुछ और दिन चल जाता है। आखिर हर पुल की उम्र तय होती है। हर पुल को एक दिन गिरना है।  
गरीबों का पुल नहीं होता,वे पुलिया निर्माण करते हैं। जब भी बारिश आती है,उनके बच्‍चे रूपी `पाए` पानी में बह जाते हैं। उनके घर जो पुलों के नीचे होते हैं,उन पर बारिश का असर नहीं होता,लेकिन प्रशासन की नजर में वह नजरौटा के समान काले धब्‍बे होते हैं और इसीलिए प्रशासन उन्‍हें बिना बारिश के हटा देता है। उनकी पुलिया कृत्रिम पुल की तरह होती है। कहीं भी फटाफट तैयार हो जाती है,उसे सीमेन्‍ट की जरूरत नहीं होती। थोड़ी जगह में संबंधों की पुलिया तैयार हो जाती है। संबंधों की पुलिया के लिए समर्पण से ज्‍यादा भीख की रोटी महत्‍वपूर्ण होती है।  
अमीर पुल नहीं बनाते,वे कोठी बनाते हैं। उन कोठियों में स्तम्भ  के रूप में नौकर होते हैं। नौकर पुल के पाए तो होते हैं,लेकिन उनमें संवेदना की सीमेन्‍ट नहीं होती। आत्‍मीयता की रेत नहीं होती। पुल को जोड़ने में मजबूती का काम करे,वह चूना नहीं होता,इसीलिए ये पुल कमजोर होते हैं और पुल के दोनों किनारे अक्सर वृद्धाश्रम में खड़े होते हैं। 
बनारस में पुल गिरा,संवेदनाओं का पुल भी गिरा। मीडिया को संवेदनाएं नहीं दिखाई दीं। मीडिया ने देखा-कारों के दबने के चित्र,कारों का चकनाचूर होना,कारों की कीमत और जाम की समस्‍या। काश,पुल के गिरने से संवेदनाओं के गिरने की धमक भी सुनाई देती। बस, मुआवजे की आवाज सुनाई देती है,मिले या न मिले। नदी के ऊपर पुल होना चाहिए,नदी में पानी हो या न हो इससे फर्क नहीं पड़ता। संवेदनाओं का कोई मुआवजा तय नहीं हो सकता,लेकिन बात हमेशा मुआवजे की होती है। 
परिचय-आपका जन्म स्थान पाढ़म(जिला-मैनपुरी,फिरोजाबाद)तथा जन्म तारीख २९ सितम्बर है।सुनील जैन का उपनाम `राही` है,और हिन्दी सहित मराठी,गुजराती(कार्यसाधक ज्ञान)भाषा भी जानते हैं।बी.कॉम.की शिक्षा खरगोन(मध्यप्रदेश)से तथा एम.ए.(हिन्दी,मुंबई विश्वविद्यालय) से करने के साथ ही बीटीसी भी किया है। पालम गांव(नई दिल्ली) निवासी श्री जैन के प्रकाशन खाते में-व्यंग्य संग्रह-झम्मन सरकार,व्यंग्य चालीसा सहित सम्पादन भी है।आपकी कुछ रचनाएं अभी प्रकाशन में हैं तो कई दैनिक समाचार पत्रों में लेखनी का प्रकाशन होने के साथ आकाशवाणी(मुंबई-दिल्ली)से कविताओं का सीधा और दूरदर्शन से भी कविताओं का प्रसारण हो चुका है। राही ने बाबा साहेब आम्बेडकर के मराठी भाषणों का हिन्दी अनुवाद भी किया है। मराठी के दो धारावाहिकों सहित करीब १२ आलेखों का अनुवाद भी कर चुके हैं। इतना ही नहीं,रेडियो सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में ४५ से अधिक पुस्तकों की समीक्षाएं प्रसारित-प्रकाशित हो चुकी हैं। आप मुंबई विश्वविद्यालय में नामी रचनाओं पर पर्चा पठन भी कर चुके हैं। कुछ अखबारों में नियमित व्यंग्य लेखन करते हैं। एक व्यंग्य संग्रह अभी प्रकाशनाधीन हैl नई दिल्ली प्रदेश के निवासी श्री जैन सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रीय है| व्यंग्य प्रमुख है,जबकि बाल कहानियां और कविताएं भी लिखते हैंl आप ब्लॉग पर भी लिखते हैंl आपकी लेखनी का उद्देश्य-पीड़ा देखना,महसूस करना और व्यक्त कर देना है।

Hits: 22

आपकी प्रतिक्रिया दें.