संसाधन मिटाने की अफरा-तफरी

शिवम द्विवेदी ‘शिवाय’ 
इंदौर (मध्यप्रदेश)
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पर्यावरण दिवस विशेष……………………………………
शोधकर्ताओं को इस बात के पुख्ता सबूत मिल चुके हैं कि अतीत में ‘मंगल’ जीवों के आवास के योग्य था। शोधकर्ताओं के एक दल ने पता लगाया है कि करीब ३.६ अरब वर्ष पूर्व मंगल पर स्वच्छ जल की  झील  थी। ‘नासा’ के क्यूरिऑसिटी रोवर द्वारा की गई छानबीन के  दौरान यह पता चला कि,मंगल ग्रह पर पानी का उन्मुक्त प्रवाह  विद्यमान था। धरती के बाशिंदों   को यह नहीं पता कि,वह अपनी जाति (मानव जाति)को मिटाने का काम बहुत तेज कर रहे हैं। वैदिक और सनातन धर्म से विमुख हो रहे विद्वानों को एक दफा मुनियों-ऋषियों की बातों पर गौर करना  चाहिए-‘यह धरती हमारी माता है और हम इसके बेटे हैं,माँ की सेवा सुरक्षा का दायित्व बेटों का ही होता है। जब माँ ही नहीं होगी तो बेटे  कैसे…?’
हमने अपने स्वार्थ के लिए पूरी पृथ्वी को तहस-नहस कर डाला है। अब भूल सुधार का कोई अवसर नहीं बचा, जलसंकट ! तेज आंधी! तूफ़ान! बाढ़! सूखा! सांस! लेने लायक हवा!(ऑक्सीजन) की कमी,अत्यधिक तापमान!अनगिनत नुकसान। पेड़ों को काटकर कारखाने बनाए,धुआँ,कचरा, रसायन बना लिए,लेकिन यह नहीं सोचा कि क्या पेड़ों के बिना छांव मिलेगी ? खेती कहां होगी,लोग कहाँ रहेंगे…? आज-कल की गैर जिम्मेदार सरकारें पर्यावरण के नाम पर हर साल करोड़ों पेड़ रोपती हैं,लेकिन वो पेड़ जमीन में नहीं,कागज़ पर उग रहे होते हैं…और  अगले साल फिर वही प्रक्रिया दोहराई जाती है। ऐसा करना आने वाली मानव पीढ़ी के अस्तित्व को मिटाने का अनचाहा किन्तु विनाशकारी प्रभाव होगा। आज के पर्यावरण के हालात को देखकर ऐसा लगता है कि,मानो इंसानों को अब ज्यादा दिन जीने की तमन्ना नहीं है। सब मानव हर एक नैसर्गिक वस्तु से पैसे की आस करता है, जबकि पर्यावरण और उससे संबधित किसी भी पहलू की चिंता-सुरक्षा तो क्या ख्याल तक नहीं।  जरा गौर कीजिए,जब हम पिकनिक पर जाते हैं तो वहाँ कई प्रजाति के पेड़,बहुत सारे रंग-बिरंगे मनमोहक पक्षी,सुंदर झील, मनभावन नदियां देखकर मन को खुश करते हैं। कभी सोच के देखो कि अगर ये अनमोल चीज़ें इस धरती से विलुप्त हो जाएँ तो…सब उजड़ा चमन!!जिन्हें आज हम जब मनचाहा देख लेते हैं,लेकिन इसी तरह का माहौल रहा तो कुछ समय बाद ये सिर्फ किताबों के पन्नों और संग्रहालय में ही बस इनकी तस्वीर मिलेगी। जंगली जानवरों का शिकार जिस स्तर पर हो रहा है,उससे तो सिर्फ यही लग रहा है कि एक दिन ऐसा आ ही जाएगा,जब ये हाथी,शेर,बाघ,हिरण, काला चीतल,हिरण,चीता,जिराफ……ये सब और इनके साथ ही लाखों प्रजाति के वन्य प्राणी पूरी तरह से विलुप्त हो जाएँगे (सफ़ेद गेंडा हाल ही में समाप्त हो चुका है।)। आज हम तो उनको देख रहे हैं और मनोरंजन या कुछ पैसों की खातिर मार देते हैं। अगर किसी व्यक्ति का अपना मात्र बीमार हो जाए तो पूरे घर में अफरा-तफरी मच जाती है,क्या उन प्राणियों का परिवार नहीं होता होगा ? उनका किसी से कोई रिश्ता नहीं होता…! विश्व के महान ग्रंथ ‘गीता’ में वर्णित है कि-‘हर प्राणी के प्राण एक समान ही हैं,चाहे इंसान हो या कोई चूहा,सबमें आत्मा एक ही होती है।’
 मनुष्य को अपने व्यक्तिगत जीवन के साथ ही पर्यावरण की महत्वपूर्ण संरचना का भी ध्यान रखना चाहिए। आज जिस तरीके से पर्यावरण का अंधाधुंध दोहन हो रहा है,अगर इसी गति से लगातार होता रहा तो आने वाले १०० वर्षों में धरती से वन गायब हो जाएँगे, हाथी से लेकर बंदर समेत पूरे वन्य जीव विलुप्त हो जाएँगे। बड़ा दुख और अचरज होता है मुझे,जब देखता हूं कि,महज एक लाख रुपए के लिए जंगल के बादशाह,धरती की शान ‘शेर’ को जान से मार दिया जाता है,दाँत के लिए ‘हाथी’ की हत्या कर दी जाती है। दुर्लभ  प्रजाति के प्राणियों  की हत्या के कारण धरती से कई प्रजातियाँ विलुप्त हो चुकी हैं। औषधियों के नाम पर छोटे प्राणियों की हत्या…! पेड़ों का तो वंश ही मिटा जा रहा है, लोग और सरकार भी वृक्षारोपण के नाम पर मात्र अपना औपचारिक काम करते हैं,ज़िम्मेदारी तो कोई समझता ही नहीं है। प्राचीन काल में मनुष्य प्रकृति के और अपने बीच के परस्पर संबंध को उचित और गंभीरता से समझता था,आज तो प्रकृति (नेचर) बोलने पर बच्चे कहते हैं-‘ये ‘नेटुरे’ क्या होता है ?’ अजीब है,ये सब हाल-चाल देखकर लगता है मनुष्यों को अब ज्यादा दिन नहीं जीना है…स्वार्थी इंसान ने अपने मतलब और हित के लिए पूरे पर्यावरण को तहस-नहस करके धरती यानि अपने आशियाने को ही छिन्न-भिन्न कर दिया है। प्रदूषण की बात ही नहीं की जा सकती, वो तो यत्र-तत्र-सर्वत्र व्याप्त है। यहाँ तक कि लोगों की सोच में भी,आज के समाज में जो भी व्यक्ति किसी भी जिम्मेदार पद पर हो तो वो आम लोगों को परेशान-तंग करेगा,ऊपर वाला अपने से नीचे वाले लोगों को दबा के ही रखता है। मानव लगातार अपने विनाश की तैयारी में जुटा हुआ है। वो तो सिर्फ विज्ञान के भविष्य की परख करता है,उसे अपने अस्तित्व के भविष्य की तनिक भी चिंता नहीं है। यह कटु सत्य है कि हर मनुष्य गैर जिम्मेदार है,वह अपने कर्तव्य-ज़िम्मेदारी दूसरों पर थोपने का काम करते हैं। पेड़ तो लगाते नहीं,बल्कि चोरी-छिपे उनको काटकर बेचने में माहिर हैं। जंगल की जमीन में जहां पेड़, पशु,पक्षी,गिलहरी आदि होने चाहिए,वहां या तो बाहुबलियों- नेताओं की विलासिता वाली इमारतें होती हैं,या फिर होता है भू-माफियाओं का कब्जा, जो दिन-रात वहां की खुदाई कर खनिज संपदाओं का अवैध दोहन किए जा रहे हैं,जिससे वन भूमि तो कम हो ही रही है,भूस्खलन भी हो रहा है। पेड़ों की कमी से जहरीली गैसें बढ़ रही हैं,उनके मुक़ाबले प्राणवायु ऑक्सीजन का अनुपात घट रहा है। आज ये जो सूखे की खबरें आती हैं,रेगिस्तान के विस्तार की आती हैं,इस सबकी वजह भी पेड़ों की कमी है। किसी भी क्षेत्र के संतुलित वातावरण हेतु अनिवार्य ३३ प्रतिशत पेड़ रोपे जाने की जरूरत है,और उनकी सुरक्षा भी की जाए,अन्यथा जीवन समाप्त होना तय है।

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