सच्चा-सम्मान

दुर्गेश कुमार मेघवाल ‘डी.कुमार’
बूंदी (राजस्थान)
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हिंदी दिवस प्रतियोगिता विशेष …………………………..

“अभिवादन मान्यवर,आज मेरा प्रतिस्थापन दिवस है। क्या आप मुझे बधाई एवं शुभकामनाएँ नहीं देना चाहेंगे ?”
रैम ने आँखें मसलते हुए फेसबुक स्टेट्स देखा और संदेश घर में-हाई… लिखकर अन्य स्टेट्स में व्यस्त हो गया।अब तक रैम नींद से पूरी तरह जाग चुका था। कमला चाय रखकर जा चुकी थी,अतः कप से एक चुस्की लेकर वो फेसबुक की अन्य पोस्ट के मजे ले रहा था कि पुनः नया नोटिफिकेशन अलर्ट आया।देखा तो पूर्व की बातचीत से अगला संदेश था।
“शायद आपने मुझे पहचाना नहीं।” लिखा था।
उसने पुनः पूर्व सन्देश को ध्यान से पढ़ते हुए सम्पर्क को पहचानने के लिए दिमाग पर जोर डाला,लेकिन कुछ याद नहीं आया। ‘प्रतिस्थापन’, ‘अभिवादन’ और ‘मान्यवर’ शब्दों को दिमाग पर जोर देते हुए पढ़ा,पर समझ नहीं सका। सम्पर्क आइकॉन में तस्वीर देखकर पहचानने का विचार आया तो आइकॉन देखा।
हल्के हरे रंग की पृष्ठभूमि में गहरे नीले रंग से “१४ सितम्बर” सुंदर शैली में लिखा हुआ था और कुछ अन्य वर्ण आपस में एक-दूसरे में मिले से बने थे,पर कुल मिलाकर आइकॉन आकर्षक था,परन्तु रैम तो अब भी अनभिज्ञ-सा सम्पर्क को पहचानने का प्रयास कर रहा था।
“मोनी का जन्मदिन १३ अगस्त को निकल गया…।
टीना से उसका ब्रेक-अप हो गया…,तो यह कौन है
…?? जिसका १४ सितम्बर से सम्बन्ध हो सकता है।
रैम ने बहाना बनाते हुए चैट किया,-“हाँ,याद आया मिंटी,है न,हैप्पी बर्डे टू यू।”
अब तक रैम की जिज्ञासा बढ़ गई थी,अतः प्रतिउत्तर का इंतजार करने लगा।
“नहीं मान्यवर,मैं मिंटी नहीं,हिंदी हूँ।” प्रतिउत्तर पढ़कर पुनः रैम का माथा ठनका। “लड़कियां भी कैसे-कैसे नाम रख लेती हैं।”
सोचते हुए उसने सन्देश बॉक्स में लिखा-“सॉरी,मैं हिंदी को नहीं जानता ? क्या आप मुझे जानती हैं ?” और प्रतिउत्तर की प्रतीक्षा करते हुए उसके मन में कई विचार आते और जाते जा रहे थे।
“आपके दादाजी हरिप्रसाद जी ने बड़े प्यार से आपका नाम रामप्रसाद रखा था,क्योंकि वे श्रीराम के बड़े उपासक थे और उनकी बड़ी आकांक्षाओं से ही आपका जन्म हुआ था।” संदेश लिखा हुआ आया। संदेश पूरा समझ तो नहीं आया,फिर भी दादाजी का और स्वयं का असली नाम पढ़कर एकबारगी तो सिर चकरा गया।
“ओह,इंद्रा आंटी,जिसे मॉम इंदी-इंदी कहा करती थी। आपने तो मुझे डरा ही दिया था।” उसने आगे चैट किया।
” नहीं मान्यवर,मैं हिंदी, भारतीयों की मातृभाषा,भारत देश की राजभाषा, और सभी भारतीयजनों को एकता के सूत्र में बांधने में प्रयासरत हिंदी भाषा हूँ,जिसको भारत के संविधान ने ही १४ सितम्बर को राजभाषा का मान देते हुए इस दिन को मेरा अर्थात हिंदी दिवस के रूप में मनाने का मार्गदर्शिका(कैलेण्डर) में निर्धारण किया था।”
रैम अब पूरी तरह पहचान गया था,परन्तु हिंदी भाषा में तो उसका हाथ वैसे ही तंग था तो पूरे संदेश को समझ पाना तो उसके बूते के बाहर की बात थी,अतः उसने पुनः संदेश दिया।
“सॉरी,मैं जान नहीं पाया,परन्तु किसी अन्य को यह मत बताना कि मेरा वास्तविक नाम रामप्रसाद है। मुझ पर मेरे ही मित्र हँसेंगे भी और मजाक भी बनाएंगे। प्लीज…प्लीज…।”
“हाँ…मान्यवर मजाक तो अब मेरा बनता जा रहा है कि युवा पीढ़ी मुझे न तो पूरी तरह जान पा रही है और न ही पहचान पा रही है। तभी तो उच्च शिक्षा प्राप्त ज्यादातर युवाओं को भी मेरी सौतेली बहिन अंग्रेजी की वर्णमाला तो पूरी कण्ठस्थ याद होती है,परन्तु मेरी अर्थात आपकी अपनी मातृभाषा हिंदी की वर्णमाला की एक पंक्ति अटक-अटककर भी याद आ जाए तो भी बड़ी बात है।”
“शायद,वो तो मुझे भी याद नहीं है।” रैम ने मन में टटोलते हुए सन्देश दिया।
“यह केवल आपकी ही बात नहीं है मान्यवर,इसलिए आप मन में कुंठित न हों। व्यक्ति को जो ज्यादा अच्छा लगता है,वो उसे ही प्रयोग में लाना अधिक पसन्द करता है या जिस कार्य में उसे सहजता महसूस हो,व्यक्ति वो ही कार्य करता है। और मुख्य बात बच्चा तो जो ज्यादा प्रचलन में हो,उसे ही अपनाता है भले ही उसमें बुराई की ही भरमार क्यों न हो,परन्तु मैं भारत और भारत के संविधान के रक्षकों से तो अपनी पीड़ा कहना ही चाहूंगी कि आपने मुझे संविधान में मान्यता देकर मान दिया। मातृभाषा,राजभाषा,राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया। १४ सितम्बर हिंदी दिवस के रूप में प्रतिस्थापित किया,परन्तु आजादी के ७० वर्ष के पश्चात भी मैं अपने-आपको कमजोर क्यों महसूस करती हूँ…??? थोड़ा विचार करें। मेरे कई रक्षक मेरी रक्षा और उन्नति में तन-मन-धन से प्रयासरत हैं,फिर भी स्थितियां आज भी मेरे लिए विपरीत क्यों है ?केवल वर्ष में एक दिन हिंदी-हिंदी के यशोगान से मेरी उन्नति न हो पाएगी। पौधे के केवल पत्तों में पानी देने से ज्यादा कुछ नहीं होगा,जब तक जड़ों में पानी नहीं दिया जाएगा। इसीलिए,मैं सभी समर्थजनों से निवेदन करना चाहूंगी कि यदि आप मेरा वास्तव में सम्मान करना चाहते हैं तो मुझे मन से अपनाएँ और ज्यादा से ज्यादा प्रचलन में लाएं,ताकि नई पीढ़ी की जड़ों तक मेरा विस्तार हो सके। वो ही मेरा सच्चा सम्मान होगा।
संदेश लम्बा था,पर उसने रैम की आँखें खोल दी। उसने प्रतिउत्तर दिया-“मैं आपकी भावना को समझ सकता हूँ और मैं प्रयास करूँगा कि आपके इस संदेश को सभी भारतीयों तक पहुँचा सकूँ।” और संदेश भेज दिया। साथ ही मुख्य संदेश को आगे भी अपने मित्रों को भेजने का निर्देश करते हुए अपने सभी मित्रों को भेज दिया। शाम तक मातृभाषा हिंदी का सन्देश पूरी तरह प्रसारित हो चुका था।

परिचय-आप लेखन क्षेत्र में डी.कुमार के नाम से पहचाने जाते हैं। दुर्गेश कुमार मेघवाल की जन्मतिथि-१७ मई १९७७ तथा जन्म स्थान-बूंदी (राजस्थान) है। आप राजस्थान के बूंदी शहर में इंद्रा कॉलोनी में बसे हुए हैं। हिन्दी में स्नातकोत्तर तक शिक्षा लेने के बाद शिक्षा को कार्यक्षेत्र बना रखा है। सामाजिक क्षेत्र में आप शिक्षक के रुप में जागरूकता फैलाते हैं। लेखन विधा-काव्य और आलेख है,और इसके ज़रिए ही सामाजिक मीडिया पर सक्रिय हैं।आपके लेखन का उद्देश्य-नागरी लिपि की सेवा,मन की सन्तुष्टि,यश प्राप्ति और हो सके तो अर्थ प्राप्ति भी है। २०१८ में श्री मेघवाल की रचना का प्रकाशन साझा काव्य संग्रह में हुआ है। आपकी लेखनी को बाबू बालमुकुंद गुप्त साहित्य सेवा सम्मान-२०१७ सहित अन्य से सम्मानित किया गया है|

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