सनातन प्रश्न

डॉ.नीलम कौर
उदयपुर (राजस्थान)
***************************************************
क्या सही है,क्या गलत
निर्णय लेगा ये कौन,
प्रश्न सनातन रुप धरे था
भरी सभा में सब थे मौन।

धर्मराज तो कर बैठे
अपना घृणित कर्म,
सत्ता के अति महत्वाकांक्षी
अंध अहम में लगा बैठे द्रोपदी का मोल।

सभा उपस्थित में थे
पुत्रमोही अंध पिता,
खामोश बैठे रहे तब भी
जब कानों में गूँजा क्रूर
अट्टहास…।

भीष्म प्रतिष्ठ पितामह भी
चुरा रहे थे नज़र अपनी,
सचिव विदूर भी उस सभा में चुप की मुहर लगा बैठे।

भरी सभा थी का पुरुषों की
दांव पर लाज गृहलक्ष्मी की,
थी माता गांधारी भी पर
विवश थी वह नारी भी।

वहीं खड़े थे पार्थ धनुर्धारी
कहने को सौ हाथी से बलशाली,
पर कांधे निर्बल
बलहीन हुए थे भीम पति के।

असीधारी गदाधारी सभी तो
कायर निकले,
कहने को पति परमेश्वर
पर परपुरुष की दासी थी पत्नी बेचारी।

आहत नारी स्वाभिमान था
अट्टहास परुष अहंकार था,
इक तरफ धर्म आहत था
दूजी ओर अधर्म का सर ऊँचा था।

प्रश्न सनातन फिर भी सम्मुख था
नारी अस्मिता का रक्षक,
कौन था।

पति जिसे परमेश्वर मान
सर्वस्व जिसको सौंपा था,
या पिता-पितामह जिनकी
संरक्षकता में ही सुरक्षा थी…।

बीत गईं सदियाँ पर प्रश्न
वहीं खड़ा है,
नारी कितनी भी सशक्त पर फिर भी असंरक्षक है॥
(एक नजर यहां भी :परुष-कायर)

परिचय – डॉ.नीलम कौर राजस्थान राज्य के उदयपुर में रहती हैं। ७ दिसम्बर १९५८ आपकी जन्म तारीख तथा जन्म स्थान उदयपुर (राजस्थान)ही है। आपका उपनाम ‘नील’ है। हिन्दी में आपने पी-एच.डी. करके अजमेर शिक्षा विभाग को कार्यक्षेत्र बना रखा है। आपका निवास स्थल अजमेर स्थित जौंस गंज है।  सामाजिक रुप से भा.वि.परिषद में सक्रिय और अध्यक्ष पद का दायित्व भार निभा रही हैं। अन्य सामाजिक संस्थाओं में भी जुड़ाव व सदस्यता है। आपकी विधा-अतुकांत कविता,अकविता,आशुकाव्य और उन्मुक्त आदि है। आपके अनुसार जब मन के भाव अक्षरों के मोती बन जाते हैं,तब शब्द-शब्द बना धड़कनों की डोर में पिरोना और भावनाओं के ज्वार को शब्दों में प्रवाह करना ही लिखने क उद्देश्य है।

Hits: 12

आपकी प्रतिक्रिया दें.