`सफेदी की सफेदी` और `जर्दी की जर्दी` होना जरूरी…

अजय बोकिल
भोपाल(मध्यप्रदेश) 

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जब देश में हिंदू-मुसलमान,देशी-विदेशी और `मॉब लिंचिंग` आदि के आसपास सारी राजनीति घूम रही हो,वहीं गोवा जैसे तटवर्ती छोटे और सुंदर राज्य में तमाम बहस प्लास्टिक के अंडे पर हो रही है। वहां प्लास्टिक के अंडों को लेकर राज्य विधानसभा में जमकर हंगामा हुआ। कांग्रेस विधायक अलेक्सो रेजिनाल्डो ने कहा कि,राज्य में प्लास्टिक के अंडे बेधड़क बिक रहे हैं। ऐसे तीन अंडे भी सदन में दिखाए और कहा कि ये नकली अंडे लोगों की सेहत के लिए हानिकारक हैं। उन्होने मांग की कि सरकार इसकी जांच कराए। इस पर मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर ने आश्वासन दिया कि,वे प्रयोगशाला में इन नकली अंडों की जांच कराएंगे। हालांकि,वे इस बात से सहमत नहीं थे कि प्ला‍स्टिक के अंडे भी हो सकते हैं।

वैसे भारत में प्लास्टिक के अंडे बिकने की अनुगूंज दो साल से सुनाई दे रही है। इन्हें चायनीज अंडे भी कहा जाता है। इसके पहले कोलकाता,चेन्नई और बेंगलुरू से भी ऐसी खबरें आईं थीं कि बाजार में प्लास्टिक के अंडे बेचे जा रहे हैं। पिछले साल झारखंड के रामगढ़ क्षेत्र की एक पंचायत के सरकारी विद्यालय में प्लास्टिक के अंडे से बनी अंडाकरी परोसे जाने की शिकायत सामने आई थी। मध्यप्रदेश के बैतूल‍ में भी नकली अंडा बेचे जाने का मामला उजागर हुआ था। वहां एक व्यक्ति ने बाकायदा थाने में इसकी शिकायत भी की थी। इसी तरह केरल में भी प्लास्टिक के अंडे की शिकायत दो साल पहले आई थी। वहां की तत्कालीन स्वास्थ्‍य मंत्री ने खाद्य आयुक्त को मामले की जांच के ‍निर्देश दिए थे। आगे क्या हुआ, इसकी जानकारी नहीं है।

यहां सवाल उठता है कि,क्या प्लास्टिक का अंडा जैसी कोई चीज होती है ? क्या अंडा कृत्रिम रूप से बनाया जा सकता है,है तो कैसे ? कौन इसे बनाता है ? इससे फायदा क्या है ? भारत में इसे चायनीज अंडा क्यों कहा गया ? इन सवालों की गहराई में जाएं तो खुद चीन में प्लास्टिक के अंडे का मामला १९९० के दशक में सामने आया। इसका चीन से क्या सम्बन्‍ध है,साफ नहीं है, लेकिन भारत में किसी भी नकली या चलताऊ माल को चायनीज की संज्ञा दी जाती है। खुद भारत सरकार की ओर से प्लास्टिक अंडों  के बारे में कोई रिपोर्ट नहीं है। भारत में अंडा उत्पादन को बढ़ावा देने वाली संस्था नेशनल एग को-आर्डिनेशन कमेटी(एनएसीसी)का कहना है कि प्लास्टिक अंडे जैसी कोई चीज नहीं होती। नकली अंडा बनाना असली अंडे से ज्यादा मंहगा हैl

फिर भी सोशल मीडिया और मुख्य मीडिया में प्लास्टिक अंडे के बारे में काफी कुछ कहा जा रहा है। इसे बनाने की विधि तक फैल चुकी है। इसके मुताबिक प्लास्टिक के अंडे सोडियम अल्जीनेट,कैल्शियम,जिलेटिन,ऐलम और बेंजोइक अम्ल मिलाकर बनाए जाते हैं। दिखने में यह हूबहू असली अंडे जैसे दिखते हैं। हालांकि,इनका आकार गोल होता है। इनके नकली होने की पहचान यही है कि इनका खोल(कवर)तुलनात्मक रूप से सख्‍त होता है। अंडे की जर्दी और सफेदी मिलकर एक हो जाती है। ये पानी में डूबने के बजाए तैरते हैं। चूंकि,ये केमिकल से बने होते हैं,इसलिए स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि ये अंडे चीन से बाहर भेजे जा रहे हैं।

प्लास्टिक के अंडों से भी पहले प्लास्टिक के चावल की चर्चा थी। हमारे देश में कोई भी नकली माल बनाकर बेचना बेहद आसान है,जितना चल जाए,क्योंकि किसी भी मामले में शुद्धता को लेकर हमारा आग्रह बहुत सतही है। यूं तो अंडा खाया जाए या नहीं,इस पर ही विवाद है। घोर शाकाहारी इसे भी मांसाहार ही मानते हैं। यह बात अलग है कि इसके बावजूद भारत में अंडों का उत्पादन और खपत लगातार बढ़ रही है। आज देश में सालाना करीब २८ अरब अंडों का उत्पादन होता है। २०२० तक इसके १ खरब अंडों तक पहुंचने की उम्मीद है। अंडा उत्पादन में भी देश के दक्षिणी राज्य आगे हैं। कुछ साल पहले मध्यप्रदेश में सरकारी विद्यालयों में मध्यान्ह भोजन में भी अंडा देने की बात चली थी। बच्चों को कुपोषण से लड़ने के लिए अंडे को जरूरी माना गया था,क्योंकि अंडे में काफी प्रोटीन होता है,लेकिन जैन और कुछ शाकाहारी संगठनों के कड़े विरोध के बाद इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था। कम से कम प्लास्टिक के अंडे ‍दिए जाने का खतरा तो टल गया था।

बहरहाल,जो अंडे बाजार में बिक रहे हैं,उनमें कितने प्लास्टिक के हैं,कहना मुश्किल है। अंडे पौष्टिक होते हैं, इससे कई लोगों का पेट भरता है,लेकिन प्लास्टिक के अंडे अगर हैं तो उस पर सख्‍ती से रोक लगनी चाहिए। यह भी साफ होना चाहिए कि,लोगों के स्वास्थ्य की कीमत पर ‍कथित प्लास्टिक की खाद्य वस्तुएं बनाकर देश के साथ खिलवाड़ कौन कर रहा है ? इस मामले में सरकार का रवैया अस्पष्ट है। होना तो यह चाहिए था कि जहां भी ऐसे मामले सामने आए हैं,तत्काल उसका प्रयोगशाला में परीक्षण कर दूध का दूध और पानी का पानी (अंडे के संदर्भ में कहें तो‘सफेदी की सफेदी और जर्दी की जर्दी’) हो जानी चाहिए थी।

और फिर अंडे ही क्यों,क्षुद्र स्वार्थ के लिए हम हर क्षेत्र में मिलावट करने और उसे झेलने के लिए मजबूर हैं। यह मुददा अभी गोवा में उठा है,कल को बाकी देश में भी उठेगा। आखिर सात्विकता की रक्षा तो की ही जानी चाहिए। देश की सेहत से बढ़कर कुछ नहीं है। अगर अंडों पर भी कोई सियासत की जा रही है,तो यकीन मानिए कि ऐसे अंडों से कुछ नहीं निकलेगा,सिवाय नैतिक सड़ांध के।

परिचय-अजय बोकिल की जन्म तारीख १७ जुलाई १९५८ तथा जन्म स्थान इंदौर हैl आपकी शिक्षा-एमएससी( वनस्पति शास्त्र) और एम.ए.(हिंदी साहित्य)हैl आपका निवास मध्यप्रदेश के भोपाल में हैl पत्रकारिता का ३३ वर्ष का अनुभव रखने वाले श्री बोकिल ने शुरूआत इंदौर में सांध्य दैनिक में सह-सम्पादक से की है। इसके बाद से अन्य दैनिक पत्रों में सह-सम्पादक, सहायक सम्पादक और फिर सांध्य दैनिक में सम्पादक रहकर वर्तमान में एक अन्य सांध्य दैनिक में वरिष्ठ सम्पादक के रूप में लेखन यात्रा जारी हैl आपकी लेखन विधा मुख्य रूप से आलेख और स्तम्भ ही हैl पं.माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विवि में श्री अरविंद पीठ पर शोध अध्येता के रूप में कार्यरत हैं,साथ ही `अरविंद की संचार अवधारणा’ पुस्तक प्रकाशित हुई है। प्रकाशन रूप में आपके खाते में कहानी संग्रह ‘पास पड़ोस’ सहित कई रिपोर्ताज व आलेख हैं। मातृभाषा मराठी में भी लेखन करने वाले श्री बोकिल दूरदर्शन,आकाशवाणी तथा विधानसभा के लिए समीक्षा लेखन कर चुके हैं। पुरस्कार के रूप में आपको स्व.जगदीश प्रसाद चतुर्वेदी उत्कृष्ट युवा पुरस्कार,मप्र मराठी साहित्य संघ द्वारा जीवन गौरव पुरस्कार,मप्र मराठी अकादमी द्वारा मराठी प्रतिभा सम्मान व कई और सम्मान भी दिए गए हैं। विदेश यात्रा के तहत समकालीन हिंदी साहित्य सम्मेलन कोलम्बो( श्रीलंका)में सहभागिता सहित नेपाल व भूटान का भ्रमण किया है।

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