सभ्‍यता का प्रतीक-गले का पटटा

सुनील जैन `राही`
पालम गांव(नई दिल्ली)

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  मैं आवारा हूं। हां,राजकपूर के गले में पटटा नहीं था, इसीलिए उन्‍होंने कहा-`मैं आवारा हूं।` राजकपूर के साथ जिस-जिसने काम किया,उन सभी के गले में पटटा था,इसीलिए किसी  को आवारा नहीं कहा। हां,लोग आवारा नहीं कहें,इसलिए जरूरी है गले में पटटा होना। अगर गले में पटटा नहीं है,तो आपके लिए खतरे बढ़ जाते हैं। लोग आपको आवारा समझते हैं,पत्‍थर मार सकते हैं,आप उनकी नजरों में आवारा के साथ-साथ बदचलन भी हो सकते हैं। नगर पालिका की गाड़ी की नजरों में चढ़ सकते हैं। अगर गले में पटटा है,तो नगर पालिका के लोग आपको बड़े सम्‍मान से देखेंगे,इज्‍जत करेंगे। यह मान लेंगे कि आप किसी रईस के पालतू हैं। फिर वे आवारा न कहकर `साहब का डॉगी` कहेंगे। आपके सम्‍मान में कसीदे काड़े जाएंगे। नस्‍ल की चर्चा होगी,रंग की बात करेंगे,गुणों का वर्णन होगा,तुलना अन्‍य प्राणियों से की जाएगी। जैसे इससे तो वह अच्‍छा है,पटटेधारी डॉगी है। 
खैर,अब पटटा कुत्‍ते के लिए जरूरी है और आदमी के लिए भी। कुत्‍ते की पहचान पटटे से और आदमी की पहचान टोपी से होती थी। अब आदमी और कुत्‍ते की पहचान पटटे से होती है। कुत्‍ते के पटटे एक ही रंग के होते हैं,जो उनके शरीर के रंग से भिन्‍न्‍ा होते हैं। 
आदमी पटटामय हो गया है। कुछ आदमी पटटाधीश हुआ करते थे। उनके नाम कई पटटे होते थे। अब पटटाधीश नहीं,पटटे वाले होते हैं। किसान का कोई पटटा नहीं होता,उसके लिए तो फंदा होता है। 
कुत्‍ते के गले में पटटा कुत्‍ते को विशेष बना देता है। पटटा विशेषता का प्रतीक है। कुछ के पटटा नहीं होता,लेकिन फिर भी उन्‍हें कुत्‍ता समझ लिया जाता है। बिना पटटे के भी कुत्‍तापन आ जाता है। किसी की बातों से कुत्‍तापन दिखाई देता है,तो कोई कुत्‍तागिरी पर उतर आता है। 
पटटा सभ्‍यता का प्रतीक है,जिसके गले में पटटा नहीं है,वह शरीफ नहीं है। कार्यालय जाने के लिए गले में पटटा होना चाहिए। उस पटटे को `आईडी` कहते हैं। कार्यालय में अब कर्मचारी के गले में पटटा होता है। कार्यालय में काम करने वाला आदमी आवारा नहीं है। आवारा आदमी कार्यालय नहीं जा सकता।कार्यालय में प्रवेश के समय,वीआईपी आगमन के समय,विशेष बैठक के समय,अस्थाई पटटाधारी ही प्रवेश पा सकते हैं। गले के पटटे से आदमी के ओहदे की परख होती है। 
कार्यालय के आदमी के पटटे कई रंग के होते हैं। पटटे को देखकर लोग पहचान लेते हैं कि यह किस नस्‍ल का है। पटटे से नस्‍ल और व्‍यवहार से उसके पद का ज्ञान होता है। कुछ कार्यालय  में शाखा के हिसाब से पटटे दिए जाते हैं। खूनी शाखा के (खाते) पटटे का रंग लाल,खेती किसानी विभाग का रंग हरा,धार्मिक खाते वालों का पटटा धर्म के अनुसार होता हैl आत्‍महत्‍या करने वालों के पटटे का रंग सफेद होता है,जिससे उन्‍हें कफन की अनुभूति होती रहे।
जब समय समाप्‍त हो जाता है तो गले में पट्टे के स्‍थान पर माला पड़ जाती है। पटटा और माला दोनों ही अंतिम यात्रा की निशानी है। एक में स्‍वाभिमान स्‍वाहा होता है तो एक में शरीर। एक में सम्‍मान की अर्थी निकलती है तो दूसरे में जीवन की। आप गले में पटटा डाल लीजिए। उस पटटे का रंग आप चुन सकते हैं। आपके चाहने वाले चुन सकते हैं। गले के पटटे का रंग क्‍या होगा, यह औकात पर निर्भर करता है। 
पट्टा शराफत का प्रमाण-पत्र है। गले का पटटा प्रतीक है संबंधों का,स्थिति का,लाचारी का,दासता का,उपहास का और आपकी दूसरे पर निर्भरता का। 

 

परिचय-आपका जन्म स्थान पाढ़म(जिला-मैनपुरी,फिरोजाबाद)तथा जन्म तारीख २९ सितम्बर है।सुनील जैन का उपनाम `राही` है,और हिन्दी सहित मराठी,गुजराती(कार्यसाधक ज्ञान)भाषा भी जानते हैं।बी.कॉम.की शिक्षा खरगोन(मध्यप्रदेश)से तथा एम.ए.(हिन्दी,मुंबई विश्वविद्यालय) से करने के साथ ही बीटीसी भी किया है। पालम गांव(नई दिल्ली) निवासी श्री जैन के प्रकाशन खाते में-व्यंग्य संग्रह-झम्मन सरकार,व्यंग्य चालीसा सहित सम्पादन भी है।आपकी कुछ रचनाएं अभी प्रकाशन में हैं तो कई दैनिक समाचार पत्रों में लेखनी का प्रकाशन होने के साथ आकाशवाणी(मुंबई-दिल्ली)से कविताओं का सीधा और दूरदर्शन से भी कविताओं का प्रसारण हो चुका है। राही ने बाबा साहेब आम्बेडकर के मराठी भाषणों का हिन्दी अनुवाद भी किया है। मराठी के दो धारावाहिकों सहित करीब १२ आलेखों का अनुवाद भी कर चुके हैं। इतना ही नहीं,रेडियो सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में ४५ से अधिक पुस्तकों की समीक्षाएं प्रसारित-प्रकाशित हो चुकी हैं। आप मुंबई विश्वविद्यालय में नामी रचनाओं पर पर्चा पठन भी कर चुके हैं। कुछ अखबारों में नियमित व्यंग्य लेखन करते हैं। एक व्यंग्य संग्रह अभी प्रकाशनाधीन हैl नई दिल्ली प्रदेश के निवासी श्री जैन सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रीय है| व्यंग्य प्रमुख है,जबकि बाल कहानियां और कविताएं भी लिखते हैंl आप ब्लॉग पर भी लिखते हैंl आपकी लेखनी का उद्देश्य-पीड़ा देखना,महसूस करना और व्यक्त कर देना है।

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