समर्पित करने का खेल

जितेन्द्र वेद 
इंदौर(मध्यप्रदेश)
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 जीत समर्पित करना कुछ ऐसा ही है,जैसे किसी समारोह का भरपूर आनंद लेने के बाद किसी अनुपस्थित व्यक्ति को चटखारे मारने का कहना। समर्पित करने के इस खेल में न तो हींग लगती है न ही फिटकरी,फिर भी वाह-वाही का चोखा रंग आ जाता है। लोग कहते हैं क्या दरियादिल इंसान है,ऐसे तो बिरले ही होते हैं। खुद हाड़-मांस एक करने के बाद किसी अन्य को समर्पित। अन्यथा क्या जरूरत है बाढ़ पीड़ितों को समर्पित करने की। कभी कोई खिलाड़ी या नेता अपनी जीत बाढ़ पीड़ितों को समर्पित करता है तो कभी तूफान पीड़ितों को। कभी जीत के बाद भूकंप से बेघर हुए लोगों की भी इन्हें याद आ जाती है,पर क्या जीत समर्पण के इस खेल से उनके जख्मों पर मरहम लग सकता है,उनके टूटे आशियानों की ईंटें जुड़ सकती हैं…।
  ज्यादातर विजेता जीत समर्पित करने के लिए अपने स्वर्गीय माता-पिता,दादा-दादी या अन्य परिवारजन को ही खोजते हैं,पर इससे उनका कुछ बनना-बिगड़ना नहीं है। न स्वर्गीय नारकीय होंगे,न ही नारकीय स्वर्गीय।
  कुछ ज्यादा मानवीय व्यवहार अपनाने वाले अपनी जीत को तूफान,बाढ़ या भूकंप पीड़ित पर न्यौछावर कर देते हैं। उनकी भावना स्व सुखाय के बजाय सर्व सुखाय की होती है,पर   ‘सोबार ऊपरे मानुष सत्य’ की अच्छी भावना के बावजूद इन पीड़ितों के अच्छे दिन नहीं आते हैं। वे तो जस-के तस रहते हैं-दो जून रोटी के लिए जूझते हुए। दाना-पानी के लिए आसमान को निहारते हुए। इस हालात में इन मानवतावादियों का व्यवहार पाखंड ज्यादा लगता हैं-बिलकुल फोटोशापिंग के सहारे बाढ़ का मुआयना करने जैसा। इस तरह वे खिलाड़ी कम,नेता ज्यादा नजर आते हैं-पाखंड से सराबोर,दिखावटी।
  नेता का इस तरह जीत को समर्पित करना उनकी आदत व व्यवसाय के मुनासिब लगता है। हम वादा खिलाफ जनम-जनम के,आज कहेंगे,कल भूल जाएंगे। मैंने ऐसा तो नहीं कहा था-जुमला था जुमला,जुमले की तू परवाह न कर।

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