सरकारी भंडारा

संदीप सृजन
उज्जैन (मध्यप्रदेश) 
******************************************************

भंडारे का हमारे देश में सदा से ही बड़ा महत्व रहा है,भंडारा करना या जबरन लोगों से चंदा लेकर करवाना पुण्य उपार्जन का कर्म माना जाता है तथा भंडारे में प्रसाद मानकर पेट भरकर जीमना भाग्यवान लोगों को ही नसीब होता है,ऐसा माना जाता है।

किसी जमाने तक भंडारे नवरात्रि,पर्व विशेष और दिन विशेष पर होते थे,लेकिन लोकतंत्र की बलिहारी है अब तो सात दिन के सप्ताह में पन्द्रह भंडारे हो जाते हैं।हर मोहल्ले में भंडारे करने वाले दादा,नहीं-नहीं समाज सेवक हैं,जो लोगों को भंडारे खिला-खिलाकर निष्क्रिय करने,निठल्ले बनाने में अपना महत्वपूर्ण दे रहे हैं।

लोगों को निठल्ला बनाने में हमारे देश और प्रदेश की सरकारें भी कम योगदान नहीं दे रही हैं। सरकार द्वारा अनुदान की योजनाएँ तो देश की आजादी के साथ ही शुरु हो गई थी,लेकिन समय के साथ यह योजनाएं अनुदान की योजना कम,भंडारे नुमा योजना बनती चली जा रही है। लोग प्रसाद पाने के लिए जिस तरह भंडारे में कतार में लगे होते हैं,उसी तरह अनुदान (सब्सिडी)की योजनाओं से लाभ पाने के लिए लोगों की लंबी-लंबी कतारें सरकारी कार्यालयों के बाहर दिखाई देने लगी है। अनुदान तक तो सब-कुछ ठीक था,लेकिन सरकार की जो योजनाएं हैं,उनमें अब जन्म से लेकर मृत्यु तक सरकारी मदद दी जा रही है,याने छप्पन पकवान का भंडारा तभी तो मुफ़्तख़ोरी की पराकाष्ठा हो रही है। मुफ़्त दवा,मुफ़्त जाँच,मुफ़्त राशन,मुफ़्त शिक्षा,मुफ़्त विवाह,मुफ़्त ज़मीन,मुफ़्त मकान बनाने के पैसे,बच्चा पैदा करने पर पैसे,बच्चा पैदा नहीं(नसबंदी)करने पर पैसे,विद्यालय में खाना मुफ़्त,मुफ़्त बिजली,मुफ़्त तीर्थ यात्रा,मरने पर भी पैसे,और तेरहवीं पर भी सरकारी सहायता। जन्म से लेकर मृत्यु तक सब-कुछ सरकार करेगी,मुफ़्त में याने भंडारे में। केन्द्र और प्रदेश सरकार के बीच मुफ़्त बाँटने की होड़ मची है,याने सरकार द्वारा लोगों को लुभाने के लिए नित-नए पकवानों(योजनाओं)के भंडारे चलाए जा रहे हैं। फिर कोई भी व्यक्ति काम क्यों करेगा ? निठल्लों की तो सरकार ने पौ बारह कर दी है इस सरकारी भंडारे ने।

ऐसा भी नहीं है कि,सिर्फ भूखे ही इस सरकारी भंडारे में जीम रहे हैं,सरकारी भंडारे में जीमने वालों में अच्छे -अच्छे अमीरों का भी नाम शामिल है। सरकारी भंडारा जनता द्वारा `कर` के रूप में जमा की गई धनराशि से होता है। और ये राशि स्वेच्छा से जमा की गई या जबरिया जमा करवाई गई है,यह तो सरकार और दाता ही जाने।

ऐसे ही चलता रहेगा,तो यह तो तय है कि पिछले दस सालों से लेकर आगे बीस सालों में एक ऐसी पूरी पीढ़ी तैयार हो रही है,जो पूर्णतया मुफ़्तखोर होगी! निठल्ली होगी,और सरकारी भंडारे पर ही अपना जीवन-यापन करेगी। काश हमें भी किसी सरकारी भंडारे में भरपेट लाभ मिल पाता…।

परिचय-संदीप जैन (फाफरिया) का साहित्यिक उपनाम-संदीप सृजन है। इनकी जन्मतिथि-५ जुलाई १९८० और जन्म स्थान-नलखेड़ा है। आप वर्तमान में उज्जैन (मध्यप्रदेश) में बसे हुए हैं। मध्यप्रदेश के श्री जैन ने स्नातक की शिक्षा प्राप्त की है। इनका कार्यक्षेत्र-वस्त्र व्यवसाय है। सामाजिक गतिविधि में साहित्य,कला एवं संस्कृति के लिए संस्था के माध्यम से तीन सौ से अधिक लोगों को सम्मानित किया है। आपकी लेखन विधा-गद्य और पद्य की सभी विधाओं में समान रूप से है। नई दिल्ली से ‘गाँव की बेटी एक’ पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है,वहीं देश के लगभग हर साहित्यिक पत्र-पत्रिका में लेख,कविता,समीक्षा,व्यंग्य,कहानी,गीत  लघुकथा और ग़ज़ल आदि का प्रकाशन हुआ है। पत्रकारिता और लेखन के लिए करीब १५ सम्मान प्राप्त संदीप सृजन ब्लॉग पर भी लिखते हैं। लेखनी का उद्देश्य-जानकारी से ज्ञान प्राप्त करना है। प्रेरणा पुंज-स्वयं को मानने वाले श्री जैन की विशेषज्ञता-पत्रकारिता में है आप संस्था शब्द प्रवाह के सम्पादक भी हैं।

Hits: 31

आपकी प्रतिक्रिया दें.