सरकार सड़क पर…

सुनील जैन `राही`
पालम गांव(नई दिल्ली)

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सरकार पटरी पर नहीं चल सकती,पगडंडी पर भी नहीं,इसलिए वह सड़क पर आ जाती है। हर कोई चाहता है सरकार सड़क पर रहे। सरकार को सड़क पर लाने के लिए लोग सड़क पर आ जाते हैं। सड़क पर आने से सरकार सड़क पर नहीं आ जाती। कुछ लोग सरकार को पलटना,कमजोर और बीमार करना चाहते हैं। अपनी तरह चलाना चाहते हैं। सरकार बोलती है तो हंगामा,नहीं बोलती तो हंगामा। सरकार बैठी है,तो क्‍यों बैठी है, सरकार चल रही है,क्‍यों चल रही है।
सरकार चमचम का मुरब्‍बा नहीं,जो आए गप से मुंह में डाले और चलता बने। सरकार न चले इसलिए गांधी की मूर्ति संसद के बाहर है,ताकि उसके सामने जाकर बैठ सकें और सरकार न चले। जब गांधी जी सरकार चला नहीं सकते तो,उसे चलने से रोक कैसे सकते हैं। महात्‍मा गांधी ने सरकार सौंपी है अब तुम जानो,वह सड़क पर चले या संसद में।
सरकार के पहिए नहीं होते,फिर भी वह चलती है। सरकार बिना कुर्सी के बैठती है। सरकार का परिवार नहीं होता,फिर भी भ्रष्‍टाचार होता है। सरकार के भाई-बहन नहीं होते,फिर भी भाई-भतीजावाद होता है।
सरकार के बारे में अकसर लोग कहते हैं-निकम्‍मी है। सरकार निकम्‍मी कैसे हो सकती है,शोध का विषय है। लेकिन सरकार किसी के बाप की नहीं,वह जनता की नहीं,ना नेता की,वह तो अपनी सरकार है। जब सरकार अपनी है तो कोई दिक्‍कत नहीं। सरकार किसी की भी हो, उसे चलना चाहिए। कुछ लोग मानते हैं सरकार नहीं चलती है,लेकिन सरकार चलती है तो केवल सड़क पर चलती है।
जो सड़क पर आ जाए वह सरकार नहीं,लेकिन सरकार हमेशा सड़क पर होती है। आज रविवार को घर से निकला तो देखा सरकार मेरे आगे-आगे,मैं पीछे-पीछे। वाकई बड़ा बुरा लगा जब पास बैठे सज्‍जन ने कहा-आपको शर्म आनी चाहिए,सरकार का पीछा करते हुए। मैंने बड़ी उद्दण्डता से कहा-और किसका पीछा करुं, जिसका पीछा करुंगा वही लतिया देगा।
खैर सरकार आगे-आगे और मैं पीछे-पीछे। सरकार की गति शुरू के वर्षों में धीमी लगती है और बाद में लगता सरकार तेजी से दौड़ने लगी। कुछ वर्षों बाद ऐसा लगता है,जैसे सरकार के पीछे कुत्‍ते दौड़ रहे और वह तेज से तेज होती जा रही है। क्‍या सरकार कुत्‍तों से डरती है ? या सरकार पीछा करने वालों से डरती है। सरकार किससे डरती है आज तक स्‍पष्‍ट नहीं,लेकिन इतना अवश्‍य है कि सरकार अदालत से नहीं डरती है।
हां,सरकार सड़क पर सरपट दौड़े जा रही थी। उसके पीछे मैं था और मेरे पीछे उसके चार साल थे। मैं लगातार चार साल से सरकार का पीछा कर रहा हूं। जानना चाहता हूं कि सरकार सड़क पर चलने के अलावा और क्‍या-क्‍या करती है। सरकार सड़क पर क्‍या कर रही है। सरकार हर रविवार को पिकनिक मनाने कभी बुद्धा गार्डन,तो कभी नहाने वाटर पार्क चली जाती है। सरकार रविवार को ही सड़क पर क्‍यों दिखाई देती है,क्‍या सरकार की भी छुटटी होती है।
रविवार की तरह सरकार होती है। रविवार को बैठे- ठाले काम करते हैं,नहीं भी करते हैं,देर से सोकर उठते हैं, देर से नहाते,देर से खाना खाते और दोपहर को फिर सरकार की तरह सो जाते हैं। चार घंटे या चार साल चलने के बाद फिर थोड़ा-सा सक्रिय हो जाते हैं। सरकार को सक्रिय करने में विपक्षी पक्षियों के शोर का महत्‍व होता है। पक्षी भी चार साल से पहले शोर नहीं मचाते। मशाल नहीं जलाते,दंगा नहीं करवाते,मोमबत्तियां नहीं जलाते, पुरस्‍कार संभालकर रख लेते हैं पांचवे साल के लिए। सभी काम अंतिम समय में ही होते हैं।
जनता अंधी और बहरी होती है,उसे चार साल तक विकास और विनाश दोनों न तो दिखाई देते हैं और ना ही सुनाई देते हैं। सरकार की अवधि पांच साल से घटाकर एक साल कर देनी चाहिए। आखिरी साल में काम होता है, विकास होता है,विनाश होता है और होती है नई सरकार की कोशिश।
सरकार शब्‍द जिस दिन से बना,उस दिन से लतियाया जा रहा है। मेरी सरकार (पत्‍नी),निकम्‍मी सरकार,बेकार सरकार,चोटटी सरकार,कमीनी सरकार और न जाने कितनी सरकार। सरकार पनघट पर पत्‍थर पर रस्‍सी की तरह आती-जाती है। जनता वह पत्‍थर है जिस पर रस्‍सी घिसटती है और पत्‍थर कटता जाता है…।
परिचय-आपका जन्म स्थान पाढ़म(जिला-मैनपुरी,फिरोजाबाद)तथा जन्म तारीख २९ सितम्बर है।सुनील जैन का उपनाम `राही` है,और हिन्दी सहित मराठी,गुजराती(कार्यसाधक ज्ञान)भाषा भी जानते हैं।बी.कॉम.की शिक्षा खरगोन(मध्यप्रदेश)से तथा एम.ए.(हिन्दी,मुंबई विश्वविद्यालय) से करने के साथ ही बीटीसी भी किया है। पालम गांव(नई दिल्ली) निवासी श्री जैन के प्रकाशन खाते में-व्यंग्य संग्रह-झम्मन सरकार,व्यंग्य चालीसा सहित सम्पादन भी है।आपकी कुछ रचनाएं अभी प्रकाशन में हैं तो कई दैनिक समाचार पत्रों में लेखनी का प्रकाशन होने के साथ आकाशवाणी(मुंबई-दिल्ली)से कविताओं का सीधा और दूरदर्शन से भी कविताओं का प्रसारण हो चुका है। राही ने बाबा साहेब आम्बेडकर के मराठी भाषणों का हिन्दी अनुवाद भी किया है। मराठी के दो धारावाहिकों सहित करीब १२ आलेखों का अनुवाद भी कर चुके हैं। इतना ही नहीं,रेडियो सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में ४५ से अधिक पुस्तकों की समीक्षाएं प्रसारित-प्रकाशित हो चुकी हैं। आप मुंबई विश्वविद्यालय में नामी रचनाओं पर पर्चा पठन भी कर चुके हैं। कुछ अखबारों में नियमित व्यंग्य लेखन करते हैं। एक व्यंग्य संग्रह अभी प्रकाशनाधीन हैl नई दिल्ली प्रदेश के निवासी श्री जैन सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रीय है| व्यंग्य प्रमुख है,जबकि बाल कहानियां और कविताएं भी लिखते हैंl आप ब्लॉग पर भी लिखते हैंl आपकी लेखनी का उद्देश्य-पीड़ा देखना,महसूस करना और व्यक्त कर देना है।

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