सीख

नवल पाल प्रभाकर
झज्जर(हरियाणा)
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सूखे ठूंठ की भांति
निडर तना तू,
मत खड़ा हो
कि…,
हवा आए ना हिलाए
झुकाए ना किसी के आगे,
चाहे भले ही टूट जाए
वर्षा बरसे,तू ना तरसे
गीला होकर तुरंत तू सूखे,
चाहे कितना झूम के बरसे
आंधी आए,तूफां आए,
तुझे जड़ से उखाड़ फेंके
पर मुंह से आह ना निकले,
निडर हो तू प्राण गंवाए
पर ऐसा जीवन भी क्या,
कभी ना झुककर सीना ताने
घमंड में सिर को
ऊंचा रखना,
फिर खुद ठोंकर खाकर
औंधे मुंह जमीं पर गिरना,
मस्तक ऊंचा,फिर रहा कहाँ
भरे-पूरे पेड़ की भांति,
दो छांव हरदम दिन-राति
फलों से लदकर झुक जाते हैं,
समीर के आगे थिरकाते हैं
वर्षा में वो शर्माते हैं,
हर दिन नया सवेरा लाकर
फूलों की सुगन्ध बिखेर जाते हैं,
जीवन हमारा ऐसा हो…
जीवन हमारा ऐसा हो।
               -ः0ः-
नवलपाल प्रभाकर ‘दिनकर’

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