सोशल मीडिया से नष्ट होता सामाजिक ताना-बाना

विशाल सक्सेना
इंदौर(मध्यप्रदेश)
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आज की आपा-धापी वाली और इंटरनेट के माध्यम से तेज दौड़ने वाली जिंदगी ने हर किसी को प्रभावित कर रखा हैl व्यक्ति जीवन के किसी भी पड़ाव में क्यों न हो,उसके जीवन का हर पल आज संचार व तकनीकी का मोहताज हो गया है। आज की तारीख में ६३ प्रतिशत जनसंख्या मोबाइल फोन व २६ फीसदी जनसंख्या इंटरनेट का प्रयोग कर रही है,जो दिन-प्रतिदिन बढ़ ही रही हैl इसके फायदे तो अनगिनत हैं ही,वहीं दुष्परिणाम कहीं ज्यादा खतरनाक है,इसलिए इसकी कार्य पद्धति और इसके इस्तेमाल करने के तरीके को भी समझना बेहद जरूरी है।
पिछले कुछ वर्षों में सोशल नेटवर्किंग सिर्फ नई पीढ़ी तक ही नहीं, बल्कि पुरानी पीढ़ी के साथ-साथ हर वर्ग के व्यक्ति के बीच लोकप्रिय हो गई हैl साथ ही इसने व्यक्तिगत रूप से हमारे मित्रों,रिश्तेदारों, शिक्षा जगत,सामाजिक पटल,राजनीतिक पटल पर सम्पर्क स्थापित करने का एक क्रांतिकारी स्त्रोत बनकर एक नई राह दिखाई है,जो व्यवसायिक दृष्टि से करोबार को स्थापित व उसका विस्तार,प्रचार- प्रसार करने में काफी सहायक सिद्ध हो रही है। एक और जहाँ हम  सोशल मीडिया से दुनिया के वास्तविक समय से जुड़कर दुनिया को मुट्ठी में करने का प्रयास लगातार कर ही रहे हैं,वहीं निःसंदेह इससे रोजगार के अवसर भी काफी बड़े स्तर तक बढ़े हैंl ये कहना कतई गलत नहीं होगा कि,कहीं-न-कहीं सोशल मीडिया हामारी रोजमर्रा की  जिंदगी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन हमारे हर कार्य में सहायक व फायदेमंद के साथ-साथ सूचना आदान-प्रदान करने में बहुत उपयोगी साबित हो रहा है।
बहरहाल,हर सिक्के के दो पहलू होते हैंl इसका दूसरा पहलू देखें तो  किसी भी चीज का अत्यधिक,अनियन्त्रित उपयोग हमें कई दुष्परिणाम व दुष्प्रभाव की और अग्रसर कर सकता हैl इस माध्यम से जहाँ गड़बड़ी,अराजकता,शंका आसानी से फैलाई जा सकती है,वहीं गुमनाम रहकर भी किसी भी कार्य को अंजाम दिया जा सकता है जिसके कारण साइबर धोखाधड़ी,हैकिंग,साइबर वार जैसे गंभीर अपराध व अपराधी बढ़े ही हैंl आज सोशल मीडिया एक लत के रूप में भी हमारे दैनिक जीवन में घर कर चुका है,जिससे हमारी एकाग्रता तो प्रभावित हुई है,साथ ही साथ हमने अपने सम्पूर्ण संबंध यहीं तक सीमित कर लिए हैंl कुछ वर्ष पहले की बात करें तो चाहे जन्मदिन हो, वैवाहिक वर्षगाँठ हो,या कोई त्योहार हो,हम अपनों के साथ मिलकर खुशियां साझा करते थे,मिलते थे बात करते थेl अब दूसरी और आज के आधुनिक जीवन में हम सिर्फ संदेश भेजकर,अंगूठा दिखाकर अपना फर्ज पूरा कर लेते हैंl बात यहीं खत्म नहीं होती,आज जब भी हम कहीं किसी पार्टी,किसी मिलन समारोह या बैठक में जाते है तो हम वहाँ होते हुए भी वहाँ नहीं होते हैं,हमारा पूरा ध्यान हमारे मोबाइल पर होता है, और गर्दन झुकी हुई होती है। शायद हम ये सोचते हैं कि,अगर वहाँ नहीं देखा तो बड़ा आर्थिक नुकसान हो जाएगा या प्रलय आ जाएगाl इन्हीं कारणों से हमारे पारस्परिक व्यवहार और अन्य कई तरह की गलत भावनाओं को हम स्वयं उत्पन्न कर रहे हैं,साथ ही हम अपने संबंधों का आकलन भी अपने सोशल मीडिया के खाते से जुड़े लोगों की संख्या से करने लगे हैंl 

बहरहाल,वास्तविक स्थिति इसके बहुत विपरीत होती हैl ये सब सिर्फ   संख्या में ही रहती है,जरूरत पड़ने पर आपके साथ कुछ वो ही लोग खड़े होंगे,जो आपसे आत्मीयता से निःस्वार्थ भाव से जुड़े हैं। अगर देखा जाए तो हमने अपने संबंध पसंद(लाइक),साझा(शेयर) व टिप्पणी (कमेंट) तक ही सीमित कर लिए हैंl `सेल्फी` के इस नए युग में कहीं हम अकेले ही न रह जाएं,क्योंकि हर व्यक्ति आज अपना संबंध, व्यवहार,रिश्ते-नाते,मान-सम्मान,उपचार,प्रचार-प्रसार,इसी माध्यम के द्वारा करना चाह रहा है,पर हाथ लग रही है निराशा,बीमारी,मानसिक तनाव और एक ऐसी बुरी लत जो बहुत बड़ी मुसीबत ला सकती हैl  अभिव्यक्ति की इस नई धारा में हमने ऐसे कई उदाहरण पिछले कुछ दिनों में भारत में ही नहीं,अपितु पूरे विश्व में इन्हीं सोशल मीडिया के जरिए देखे व सुने हैं,जिन्होंने पूरी दुनिया को दहला के रख दिया था।
जहाँ लोगों को पिछली तीन पीढ़ियां भी याद नहीं,वहां हम हजार सालों की बात करें तो क्या ये बेमानी नहीं होगी,जहाँ बचपन पहले हँसी- ठिठोली,बड़े मैदानों में खेलकूद,आस-पड़ोस के आंगन में गुजरता था,वो ही आज इस सोशल मीडिया,हाई-टेक उपकरण के व्यापक विस्तार से बच्चों में एक नकारात्मक ऊर्जा का संचार कर रहा हैl हम बच्चों को आधुनिक बनाने में आपत्तिजनक सामग्री परोसने में लगे हैं,जिन बच्चों को दोस्तों,किताबों के साथ अपना महत्वपूर्ण समय व्यतीत करना चाहिए,वो चारदीवारी में कैद होकर रह गए।
जैसा कि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं,तो सोशल मीडिया के सही इस्तेमाल को समझना होगाl समय-स्थिति का ध्यान रखना होगाl  अपनी अभिव्यक्ति को इस बदलते स्वरूप में जिम्मेदारियों के साथ इसका उपयोग सोच-विचार कर बहुत बुद्धिमानी से करना होगा,नहीं तो हम खुद अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार लेंगे,जिससे हम अपने निजी व सामाजिक संबंध भी खतरे में डाल देंगे।
परिचय : विशाल सक्सेना का जन्म स्थान शुजालपुर(मध्यप्रदेश) और जन्म तारीख २२ नवम्बर १९७७ है। वर्तमान में मध्यप्रदेश के इंदौर में बसे हुए हैं। श्री सक्सेना की शिक्षा-व्यापार प्रबंधन में स्नातकोत्तर सहित सीएफई, पीजीडीएचआर,ग्रेफोलॉजिस्ट,साइबर क्राईम इंवेस्टीगेटर और विश्लेषक की है। 
आपका कार्यक्षेत्र-नौकरी ( सहायक उपाध्यक्ष-बैंक)है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप पीपल फ़ॉर एनिमल में स्थाई सदस्य होने के साथ ही एमनेस्टी इंटरनेशन इंडिया,अखिल भारतीय  एवं अन्य प्रादेशिक संस्थाओं में पदों पर कार्यरत हैं। लेखन विधा-आलेख है,और सामाजिक-आपराधिक विषय पर लिखते हैं। अखबारों और कुछ पुस्तकों में कई लेख छपे हैं। आपको कायस्थ गौरव,रक्त दान के लिए,ईगल आई व कई प्रदेशों के पुलिस विभाग और शिक्षण संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-सामाजिक चेतना व सतर्कता का प्रचार-प्रसार करना है। 
आपके लिए प्रेरणा पुंज-स्वामी विवेकानंद,सरदार पटेल व मेनका गांधी है। आपकी विशेषज्ञता-बैंक संबंधी धोखाधड़ी पता करने और अपराध विवेचना में है। विशाल सक्सेना की रुचि सामाजिक कार्य,लेखन,गीत सुनना,नए विषयों को पढ़ना व साझा करना में है।

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