सौतन

बाबूलाल शर्मा
सिकंदरा(राजस्थान)
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हिन्दी दिवस प्रतियोगिता विशेष…………………………….

मेरे प्रिय सखे रचनाधर्मी,
. अशेष स्नेहाशीष।
आज मैं अपनी पीर कहानी पत्र द्वारा तुम्हें बता रही हूँ, क्योंकि राजसभा में द्रौपदी से भी बदतर स्थिति है मेरी वर्तमान में। अब तो बस श्रीकृष्ण की तरह तुम्हारा ही भरोसा शेष है। इसी आशा और विश्वास से पत्र लिख रही हूँ। ध्यान देना सखे।

मैं हिन्दी (भाषा) हूँ। माँ संस्कृत(भाषा) का मुझे अपार स्नेह व दुलार मिला है। इतना कि दुलार करते-करते माँ अब जरावस्था में पहुँच गई। मै स्वतंत्र भारत की राष्ट्र भाषा बन गई हूँ,पर यह इतर बिन्दु है कि अभी तक शासन की ही दोगली नीति के कारण मै वह सम्मान प्राप्त नहीं कर पा रही जिसकी मैं स्वयं अधिकारिणी हूँ।
हालांकि,देश की जनता मुझे राजरानी-राजमाता सम मानती है पर सरकार के प्रतिनिधि अभी तक सरकारी कार्यालय,कचहरी,संसद,विधानसभाओं में अनावश्यक रूप से मेरी उपेक्षा करते रहते हैं।
यहाँ तक कि कुटिल स्वार्थी नेता भाषायी विवाद तथा झगड़े भड़काने से भी नहीं चूकते।
खैर,मैं राष्ट्र भाषा बनी,मेरी लिपि देवनागरी है। मैं स्वयं संसार की श्रेष्ठ सम्पन्न और सुन्दर भाषाओं में सुमान्य हूँ।
भारत वर्ष ही नहीं,अपितु पड़ोसी देशों में भी मेरा व मेरी लिपि का बोलबाला है।

जहाँ प्रवासी भारतीय बसते हैं,वहाँ उन दूरस्थ देशों में भी मेरा विस्तार है।
आज मेरे कोष में सम्पन्न साहित्य है,तथा साहित्य साधकों की विशाल सूची है और खूब सम्पन्न शब्द कोष है। और भी सम्पन्नता होती,पर इतिहास में हुई मेरी ही गलतियाँ आज तक मुझे सता रही है। सखे!
मेरा जन्म तो प्राचीन काल में हस्तिनापुर में हुआ,परन्तु आयु और यौवन के जोश में मैं शीघ्र ही सबकी चहेती होती गई। मेरे चर्चे अखंड भारत में होने लगे। मुझे स्वयं पर गर्व होने लगा। मैंने सोचा सेविका रख लूँ। बस यहीं से गलती शुरू हो गई। मैंने उर्दू,अरबी,फारसी को यही सोच के अपनाया था। तब मुझे कहाँ पता था कि ये निंगोड़ी सौतन मेरा जीना हराम कर देगी। यही हुआ,मेरा जीना हराम हो गया।
८०० वर्ष के दीर्घ संघर्ष से मैं क्षीणकायः कमजोर और बीमार हो गई।
मेरे शब्द कोष तक में इन निगोड़ी सौतनों की घुसपैठ हो गई। दुख तब अधिक हुआ,जब मेरे और सरस्वती के वरद पुत्रों ने इन्हे मान्यता भी दी। खैर।

जीर्णावस्था में जब मुझे फिर से सेविका की आवश्यकता हुई तो विधि के विधान से फिर चूक होकर मुझे इस अंग्रेजी भाषा को सेविका रूप में अपनाना पड़ा। सोचा सेवा करेगी,सौतनों से बचाव भी होगा। क्या पता था यह और भी घातक सौतन बन जाएगी। आज चार सौ वर्ष हुए,इस नवेली सौतन ने तो मेरा गला घोंटने में कोई कोर कसर नहीं रखी। सखे!
इसने तो मेरी सारी ही सम्पन्नता और व्यापकता छीन ली।
मेरे शब्दकोष में घुसपैठ कर ली। मुझे दोयम,पिछड़ी और पुरातन बताने वाली सौतन ने मेरे पुत्र गद्य पद्य और छंद व प्रिय पुत्री कविता को संस्कार विहीन और श्रंगार विहीन बनाने में भी कसर नहीं छोड़ी। दुखी हूँ मेरे और सरस्वती के वरद पुत्र इसका विरोध नहीं कर रहे। अपितु नया बदलाव कहकर शब्दों को मेरे कोष में जमा करते,मान्यता देते चलते है। क्यों सखे!
ऐसे तो एक दिन मेरा शब्द कोष ही रीत जाएगा।
अब क्या कहूँ,मेरा साहित्य कोष खूब सम्पन्न है। कवि परम्परा,लेखक सभी खूब तो है,थे भी।
२१वीं सदी के आगाज ने सभी के साथ मुझे भी बौरा दिया। ताज्जुब है पिछली गलतियों से सबक न लेकर मैं बौरा गई। मेरा सारा कुनबा ही बौरा गया सखे!
मैंने सोचा,लोग मुझे पुरातन और पिछड़ी कहेंगे,मैं भी भीड़ और भेड़ चाल के वशीभूत हो गई। मैंने इंटरनेट को नई सेविका समझ अपना लिया। इसने तो सखे-अपना रंग हाथों-हाथ दिखाना शुरू भी कर दिया।
यह मेरी नई नवेली सौत वघर में क्या आई,मेरे काव्य, महाकाव्य,ग्रन्थ,पुस्तकें,पत्रिका,अखबार सभी को आलमारियों में कैद कर दिया। पुस्तकें छपना बंद हो रहा है। नए काव्य-महाकाव्य कालजयी कृतियाँ रचने पर तो मानो अघोषित रोक लगी हो।
यहाँ तक कि मेरे सम्पन्न साहित्य व शब्द कोष से अछूतों-सा बर्ताव होने लगा है। कोई हाथ तक नहीं लगा रहा।
इस नई सौतन के इश्क में दीवानों ने मोबाइल नामक यंत्र विकसित कर लिया। आज बस बुद्धिजीवी उसी के गुलाम हैं,वहीं उनकी बीबी,बच्चे,माँ,बाप,बन्धु,मित्र,समाज, परिवार,देश या वतन बनी हुई है। सौतन व उसके पुत्र के प्रति ऐसी दीवानगी,सखे!

देखकर मैं कितनी व्यथित हूँ। मन करता है आत्महत्या कर लूँ,पर यह पाप है,अपराध है,तो फिर एकांतवास में चली जाऊँ। भाई सखे! लेखक,तुम्हीं बताओ-मैं कहाँ जाऊँ,क्या करूँ?
असंतोष तो तब अधिक है,जब मेरे भावी कर्णधार कवि- लेखक वरद पुत्र सखा,संगी मेरी सौतन सुत मोबाइल पर दो या चार पंक्ति लिखकर खुद को कवि-लेखक प्रचारित करते हैं। बड़ी पीड़ा होती है इन नादान पूतों पर,पर भाई हे सखे! अब कहाँ से लाऊँ ऐसे लेखक,ऐसे कवि जो डायरी भर जाने या स्याही बीतने तक कलम चलाकर दीर्घ कविता,खंडकाव्य,काव्य या महाकाव्य रचें। फिर वे सुधि पाठक भी कहाँ से लाऊँ,जो उनका अध्ययन,पाठन व मनन करें । माता-पिता तो जनमते ही शिशु को मेरी सौतन की कथित इंगलिश मीडियम में भरती कराने चलते हैं। फिर कहाँ से पैदा होंगे वे शरतचंद्र और निराला से आवारा मसीहा,तुलसी,सूर,कबीर दादू,मीरा,रसखान,नानक से विरागी। महावीर व गौतम से त्यागी युग प्रवर्तक ? चाणक्य जैसा दृढ़ प्रतिज्ञ,
मेरी पुत्रियां जो आज राज्यों-प्रांतों की राज्य भाषा होती मात्र जागीरदार-सी बनी सिसक रही है। सखे!

और क्या क्या गिनाऊँ भाई लेखक। मेरा सिर चकरा रहा है। अब सोच लो सखे लेखक-कवि-रचनाधर्मी। श्रीकृष्ण बनकर मेरी लाज बचा सको तो,सखे!
अब पत्र को विराम देती हूँ।
जय जन,जय हिन्द
आपकी भगिनि-सखी-भाषा
हिन्दी (भाषा)
स्थायी पता-आर्यावर्त
वर्तमान पता-उत्तरी भारत

परिचय : बाबूलाल शर्मा का साहित्यिक उपनाम-बौहरा हैl आपकी जन्मतिथि-१ मई १९६९ तथा जन्म स्थान-सिकन्दरा (दौसा) हैl वर्तमान में सिकन्दरा में ही आपका आशियाना हैl राजस्थान राज्य के सिकन्दरा शहर से रिश्ता रखने वाले श्री शर्मा की शिक्षा-एम.ए. और बी.एड. हैl आपका कार्यक्षेत्र-अध्यापन(राजकीय सेवा) का हैl सामाजिक क्षेत्र में आप `बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ` अभियान एवं सामाजिक सुधार के लिए सक्रिय रहते हैंl लेखन विधा में कविता,कहानी तथा उपन्यास लिखते हैंl शिक्षा एवं साक्षरता के क्षेत्र में आपको पुरस्कृत किया गया हैl आपकी नजर में लेखन का उद्देश्य-विद्यार्थी-बेटियों के हितार्थ,हिन्दी सेवा एवं स्वान्तः सुखायः हैl

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