स्मार्ट गड्ढे…

विजयसिंह चौहान
इन्दौर(मध्यप्रदेश)
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शहर में इन दिनों चहुंओर विकास की गंगा बह रही है,शहर सुन्दर होगा,बड़ी-बड़ी कम्पनी व मेट्रो आएंगी,ढेरों रोजगार लाएगी,चारों तरफ खुशियां लहलहाएगी। हम स्मार्ट हों या न हों,हमारा शहर `स्मार्ट सिटी` कहलाएगा,ऐसा आमजन को बताया जा रहा है,मानो नाक पकड़कर दवाई पिलाई जा रही हो। सपने हैं,आप चाहें तो दिन में देखें या रात में जैसे भी हैं,…..अपने हैं।
आप बखूबी जानते हैं कि विकास के नाम पर हमें क्या क्या सहना पड़ रहा है। झाड़ कटे,हरियाली हटी और दूर-दूर तक सड़क पर सन्नाटा पसरा है। पक्षियों का न तो दर बचा है,और न दाना…फिर भी हमें यह सुनकर अच्छा लगता है कि,हमारा शहर विकास की ओर बढ़ रहा है। आज शहर की हर गली,चौराहा,पगडंडी सीना तानकर के समान हक मिलने की बात बड़े गर्व से कह रहे हैंl एकरूपता इतनी कि,सारे गडढे आपस में बिना लाउडस्पीकर के बतिया सकते हैं,भाई-भतीजावाद कोसों दूर के शब्द हैं। सब एक जैसे नजर आते हैं और हम हैं कि,विकास की राह मे रोड़े ढूंढते नजर आते हैं। राष्ट्रीय,प्रादेशिक या शहरी मार्ग में इतनी एकरूपता पहले कभी नजर नहीं आई। सारी सड़क एक समान हो चली है,फर्क करना मुकिल है कि रोड निगम का, प्रदेश का या राष्ट्रीय राजमार्ग का है। सड़क को तलना हो तो उन्हें गडढों के गिरेबां में देखा जा सकता है।
शहर खुदा पड़ा है और हम हैं कि,विकास की राह में थोड़ी-सी कुर्बानी- कष्ट भी नहीं सहन कर सकते। सड़क पर यात्रा करने के लिए तो हमारे यहां कहावत भी प्रचलित है कि अन्य प्रदेशों के बाद जैसे ही वाहन मध्यप्रदेश में प्रवेश करता है तो मानों यात्रियों में भूचाल-सा आ जाता है,पेट में पड़ा गरिष्ठ भोजन भी आसानी से दचके के सहारे पच जाता हैl यही नहीं,गहरी निंद्रा में सोया व्यक्ति भी बता सकता है कि,मध्यप्रदेश आ गया। देश के दिल में विराजित प्रदेश और प्रदेश के मध्य में इन्दौर इन दिनों चारों और से खुदा पड़ा हैl गडढों का अनुमान लगाना हरेक व्यक्ति के बूते की बात नहीं हैl विशेष दक्षता,योग्यता वाला व्यक्ति ही गडढों की गहराई तथा उम्र का अनुमान लगा सकता है। वाहन चालन के दौरान इस प्रकार का अनुमान या कयास लगाना संभव नहीं। सड़क पर यात्रा करना इन दिनों किसी प्रसव पीड़ा से कम नहीं। चौपहिया वाहन वाले भले ही खुश हों लें कि उन्हें धूल,धुएं और गन्दगी से नहीं गुजरना पड़ता,लेकिन आमजन को इन गडढों से बचते हुए अपना स्थान बनाना होता है,धूल भरे गडढों में समाई गहरी धूल भरा स्नेह का रंग हमें मुंह चिढ़ाते हुए अपनी उपस्थिति दर्ज कराता हैl हडडी-पसलियां भी शाम को सही-सलामत हुई तो अपने भगवान का शुक्रिया अदा करती है।
`स्लीप`,`कट` और `जम्प` अब खेल मैदान के शब्द के स्थान पर सड़क पर यात्रा करते समय याद किए जाने वाले शब्द हो चले हैं। ऐसा लगता है कि,इन्दौर अविकास के नाम पर पंचवर्षीय योजना के इरादे में है, सियासी लोग हों या प्रशासनिक,सभी रोज दो-दो हाथ करते हैं गड्ढों सेl मजाल है कि,कोई सुध ले ले। सुधी पाठक भी सड़क पर उग आए इन कील-मुहांसों से अब उब चुके हैं। समझ से परे है कि,इतना बड़ा विशाल शहर जो विकास के ढेरों सपने बगल में दबाए कभी `महापौर सम्मेलन` करता तो कभी सुचना तकनीकी कम्पनियों के आने की बाट जोह रहा हैl वह शहर के मुख मण्डल में होने वाले इन कील-मुहांसों,घावों का इलाज क्यों नहीं करता। जब भी कभी सड़क का निर्माण होना हो,तो सरकार मार्ग परिवर्तन तो आसानी से कर देती है,लेकिन यह सुध क्यों नहीं लेेती कि उक्त मार्ग की क्षमता है या नहीं,यातायात ठीक ढंग से निकलेगा या नहीं,यातायातकर्मी का स्थान इत्यादि बातों का ध्यान रखे बगैर पूरा शहर रामभरोसे छोड़कर विकास कार्य बदस्तूर जारी है। ऐसे में आवारा पशु का आवागमन,मुक्त विचरण,चरण,शयन यह सभी अवस्थाएं भी हमारे जख्मों को कुरेदने का काम करती है। सड़क के चारों ओर लगे पेड़ अब कल की बातें हैं,कभी हरियाली हुआ करती थी, राहगीर सूरज की तपन से बचने के लिए पेड़ की छांव में सुस्ताया करते थेl अब कांक्रीट के जंगल में जीवन का विकास कार्य जारी है,`हरियाली आएगी,खुशहाली छाएगी` का यह सपना सच हो जाए।

परिचय : विजयसिंह चौहान की जन्मतिथि ५ दिसम्बर १९७० और जन्मस्थान इन्दौर(मध्यप्रदेश) हैl वर्तमान में इन्दौर में ही बसे हुए हैंl इसी शहर से आपने वाणिज्य में स्नातकोत्तर के साथ विधि और पत्रकारिता विषय की पढ़ाई की,तथा वकालात में कार्यक्षेत्र इन्दौर ही हैl श्री चौहान सामाजिक क्षेत्र में गतिविधियों में सक्रिय हैं,तो स्वतंत्र लेखन,सामाजिक जागरूकता,तथा संस्थाओं-वकालात के माध्यम से सेवा भी करते हैंl लेखन में आपकी विधा-काव्य,व्यंग्य,लघुकथा और लेख हैl आपकी उपलब्धि यही है कि,उच्च न्यायालय(इन्दौर) में अभिभाषक के रूप में सतत कार्य तथा स्वतंत्र पत्रकारिता जारी हैl

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