स्वार्थ सर्वोपरि

वन्दना पुणताम्बेकर
इंदौर (मध्यप्रदेश)
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स्वार्थ हमारा सर्वोपरि है,
हम कहीं भी जाते,स्वार्थ ले जाते हैं।

हम मन्दिर जाते हैं तो मुरादें पाना चाहते हैं।
हम भगवान से अपने मन की इच्छा पाना चाहते हैं।

हम सेवा में जाते हैं तो नाम कमाना चाहते हैं,
स्वार्थ सर्वोपरि है,हम निस्वार्थ नहीं रह पाते हैं।

हम सत्ता में जाते हैं तो कुर्सी पाना चाहते हैं,
सीधी-साधी जनता को निशाना बनाकर ताज कमाना चाहते हैं…
स्वार्थ सर्वोपरि है,हम धन कमाना चाहते हैं।

स्वार्थपरस्त इस दुनिया में हर इंसान अकेला है,
फिर भी भीड़ में घुसकर अपना मुक़ाम बनाना चाहते हैं…
स्वार्थ सर्वोपरि है,हम सब-कुछ पाना चाहते हैं।

घर है,मकां हैं,रिश्तों का इम्तहाँ है।
हर कोई अपने घाक का राग गाना चाहते है।

जीवन की आपाधापी में हम गुले बाग सजाना चाहते हैं,
स्वार्थी होकर सारे इंसा अपना वजूद बनाना चाहते हैं।
कैसी यह माया की माया,
सब इंसा एक-दूसरे को गिराना चाहते हैं।

हम सब-कुछ जानते हैं,फिर भी इस मतलबपरस्त दुनिया में
एक उम्मीद की आस में जागना चाहते हैं…
स्वार्थ हमारा सर्वोपरि है,हम निस्वार्थ नहीं रह पाते हैं।

हम निःस्वार्थ होकर कुछ तो करें,
किसी की खुशी के लिए जीकर तो देखो।

किसी को छोटी-सी खुशी देकर देखो,
किसी की खुशी के लिए कुछ तो छोड़ो।

खुशी से सराबोर हो जाओगे,
निःस्वार्थ होकर जीना सीखो।
स्वार्थ तो सर्वोपरि है।।

परिचय:वन्दना पुणतांबेकर का स्थाई निवास मध्यप्रदेश के इंदौर में है। इनका जन्म स्थान ग्वालियर(म.प्र.)और जन्म तारीख ५ सितम्बर १९७० है। इंदौर जिला निवासी वंदना जी की शिक्षा-एम.ए.(समाज शास्त्र),फैशन डिजाईनिंग और आई म्यूज-सितार है। आप कार्यक्षेत्र में गृहिणी हैं। सामाजिक गतिविधियों के निमित्त आप सेवाभारती से जुड़ी हैं। लेखन विधा-कहानी,हायकु तथा कविता है। अखबारों और पत्रिकाओं में आपकी रचनाएं प्रकाशित हुई हैं,जिसमें बड़ी कहानियां सहित लघुकथाएं भी शामिल हैं। आपकी लेखनी का उद्देश्य-रचनात्मक लेखन कार्य में रुचि एवं भावनात्मक कहानियों से महिला मन की व्यथा को जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास है। प्रेरणा पुंज के रुप में मुंशी प्रेमचंद जी ओर महादेवी वर्मा हैं। इनकी अभिरुचि-गायन व लेखन में है।

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