हँसी-हँसी में….

श्रीकृष्ण शुक्ल
मुरादाबाद(उत्तरप्रदेश) 
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कुछ दिन पहले ही किसी पत्रिका में एक लेख पढ़ा था। विषय था-“हँसना आज भी सर्वोत्तम औषधि है।”
अब ज़नाब यह तो निश्चित ही है कि सर्वोत्तम औषधि यदि इतनी सुलभ हो और बिना हींग या फिटकरी लगाए प्राप्त हो जाए तो उसे प्राप्त न करना मूर्खता ही कहलाएगी,और हम स्वयं को कभी भी मूर्ख कहलाने को सहमत हो ही नहीं सकते। तो जनाब बस शुरु कर दिया बिना पैसे की औषधि का सेवन।
नुस्खा कुछ यूँ था कि प्रातःकाल उठकर ताजी हवा फेफड़ों में भरो और ठहाके लगाओ। दिन भर चेहरे पर मुस्कान बनाए रखो। जरा-जरा-सी बात पर खुलकर ठहाका लगाकर हँसो।
अगले दिन भोर में उठते ही छत पर पहुँचे,क्योंकि ताजी हवा तो छत पर ही मिलनी संभव थी। दो-तीन लंबी सांसें खींचकर बेसाख्ता ठहाके लगाने शुरु कर दिये। अभी नुस्खा पूरी तरह से गले उतरा भी नहीं था कि नीचे से बच्चों के जोर-जोर से रोने की आवाजें आने लगीं। पत्नी घबराकर ऊपर छत पर आ गई,और हमें ठहाके लगाते देखकर रोने लगी।
ऐसी स्थिति के लिए तो हम बिलकुल तैयार न थे। ठहाके लगाने तो एकदम बंद हो गये। पत्नी को किसी तरह से समझाया कि हमें कुछ नहीं हुआ है, बल्कि हम तो स्वास्थ्य लाभ के लिए हँस रहे थे।
नीचे पहुँचे ही थे कि धड़ाधड़ दरवाजा पीटा जाने लगा। देखा,दरवाजे पर पड़ोसियों और पड़ोसनों की लाइन लगी हुई थी। सभी हमारे पागल हो जाने की शत-प्रतिशत उम्मीद लिये हुए थे और हमको पूरी तरह सामान्य देख कर सभी को निराशा हो गई। जो सहानुभुति के शब्द वो कहने आये थे,नहीं कह पाए,ऊपर से अलसुबह नींद टूटने की झल्लाहट। खैर साहब,जब सबको हमारे ठहाकों का राज पता चला तो हँसी का हड़कम्प मच गया। सुबह-सुबह ही सबकी नाराजगी दूर करने के लिए चाय-पानी का इंतजाम करना पड़ा,सो अलग। और उसके बाद तरह तरह की प्रतिक्रियाएं भी सुनने को मिलीं। एक पड़ोसी बोले-साहब आप तो छुपे रुस्तम निकले। मेरी बात मानिये,आप रात में हर पंद्रह मिनट पर उठकर ठहाके लगाया करिये। इधर मुहल्ले में चोरियां बहुत हो रही हैं, आपके ठहाकों की आवाज से कोई सो ही नहीं पाएगा और चोरियां बंद हो जाएंगी। तभी एक बच्ची की फरमाइश आई-अंकल,रातभर तो नहीं,परन्तु आप रोज सुबह चार बजे जरुर ठहाके लगाया करिये। देखिये न,परीक्षा सर पर है और हमारी अलार्म क्लॉक खराब हो गई है। गोया हम इन्सान न होकर अलार्म क्लॉक हो गये। एक साहब कुछ अधिक ही प्रभावित हो गए थे शायद। बोले-कमाल है साहब, आपकी आवाज में तो बड़ी जान है। आपको तो इसका भरपूर उपयोग करना चाहिए। अरे साहब,आप तो कीजिए। और कुछ नहीं तो रामलीला में रावण की भूमिका तो आप बखूबी निभा सकते हैं। भला वह ठहाके लगाने के अलावा और करता ही क्या है। और एक बार आपने समाँ बाँध दिया फिर तो रामलीला ही क्या,नाटक और फिल्म वाले भी आपके पास दौड़े-दौड़े आएंगे।
हम मन ही मन कुढ़ रहे थे। समझ रहे थे कि सारी बातें हमारी खिंचाई करने को कही जा रही हैं।
खैर साहब,चाय-नाश्ता सूतकर धीरे-धीरे सारे पड़ोसी खिसक लिए। पत्नी की ओर देखने की हमारी हिम्मत भी न हुई,क्योंकि खामखाँ ही बैठे-बिठाए साठ-साठ रुपये की चोट जो दे दी थी, परन्तु जब वह मुस्कुराईं तो हमारी जान में जान आई।
हमने उसी समय संकल्प कर लिया कि,भूलकर भी नहीं हँसेंगे, क्योंकि किताब में तो यही लिखा था कि-हँसना सर्वोत्तम औषधि है,ये कहीं नहीं लिखा था कि हँसना सबसे बड़ी व्याधि भी है। हम तो इसे मुफ्त का नुस्खा समझे बैठे थे,परन्तु इसकी तो पहली खुराक ही साठ रुपये की पड़ी। ऊपर से पड़ोसियों की प्रतिक्रियाएं ,समय की बरबादी,स्वयं पर झल्लाहट,इन सबसे सर में दर्द भी हो गया था,जिसके लिये तो दो रुपए की गोली ही निगलनी पड़ी। हमने तो तौबा कर ली है साहब,कभी न हँसने की।
आपको भी आगाह किये दे रहे हैं कि,भूलकर भी ऐसा प्रयोग न करना..हँसी-हँसी में भी नहींl

परिचय-श्रीकृष्ण शुक्ल का साहित्यिक उपनाम `कृष्ण` हैl इनका जन्म तारीख ३० अगस्त १९५३ तथा जन्म स्थान-मुरादाबाद हैl वर्तमान में मुरादाबाद में बसे हुए श्री शुक्ल का स्थाई घर भी मुरादाबाद ही हैl उत्तर प्रदेश वासी श्री शुक्ल ने परास्नातक(अर्थशास्त्र)और तथा सीएआईआईबी की पढ़ाई की हैl आपका कार्यक्षेत्र-बैंक में नौकरी (सेवानिवृत्त अधिकारी)का रहा हैl सामाजिक गतिविधि के निमित्त आप सहजयोग आध्यात्मिक संस्था के माध्यम से ध्यान एवं तनावमुक्त जीवन यापन हेतु प्रचार-प्रसार में सक्रिय रहते हैंl लेखन विधा देखी जाए तो-गीत, ग़ज़ल,मुक्तक,दोहे,छंदमुक्त तथा सामयिक विषयों पर लेखन जारी हैl भाषा ज्ञान-हिन्दी एवं अँग्रेजी का रखते हैंl प्रकाशन के तहत साझा संग्रह-छाँव की बयार,उजास एवं काव्यधारा आपके खाते में है तो रचनाओं का प्रकाशन कई दैनिक और अन्य पत्र-पत्रिका में समय-समय पर होता रहता हैl इनको प्राप्त सम्मान में मुरादाबाद से काव्य प्रतिभा सम्मान ,रामपुर से काव्यरथी व काव्यधारा पीयूष सम्मान सहित ज्ञान मंदिर पुस्तकालय द्वारा वर्ष २०१८ का साहित्यकार सम्मान ख़ास हैl यह ब्लॉग पर भी अपने विचार रखते हैंl इनकी लेखनी का उद्देश्य-समाज को जागृत करना हैl आपके लिए प्रेरणा पुंज-प्रो.राजेश चंद्र शुक्ल हैंl रुचि-आध्यात्मिक चिंतन,ध्यान,लेखन तथा पुस्तकें पढ़ना हैl

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