हिंदी की उपभाषाओं-बोलियों को शामिल करने का पाप देश विभाजन के समान

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मुंबई।

सांस्कृतिक गौरव संस्थान ने केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथसिंह सहित मानव संसाधन विकास मंत्री(भारत सरकार)प्रकाश जावड़ेकर को भी पत्र लिखा है। संविधान की ८वीं अनुसूची में हिंदी की उपभाषाओं-बोलियों को शामिल करने का पाप देश के विभाजन के समान बताकर उन्हें भी बाहर कर दिया जाने की अपेक्षा की गई है,जो देशहित में होगा।
इस प्रसंग में संस्थान के प्रमुख डॉ.महेशचन्द्र गुप्त ने निवेदन किया है कि अधिकांश बुद्धिजीवी हितैषियों का यह सुनिश्चित मत रहा है कि कांग्रेस दल ने हिन्दुस्थान के ५ टुकड़े करवाने में मुख्य भूमिका अदा की। 5 टुकड़े क्रमशः म्यांमार (तब का बर्मा),श्रीलंका, पाकिस्तान, बंगलादेश और भारत है। कांग्रेस के कुछ नेता यह जानते हुए कि जिन्ना तपेदिक का रोगी था और शीघ्र मरने वाला था,फिर भी देश विभाजन कराने से इसलिए नहीं चूके कि जल्दी से सत्ता मिल जाए। आज़ादी के बाद भी इन नेताओं ने तत्कालीन भारतीय जनसंघ के प्रबल विरोध के बावजूद भी भाषावार प्रान्त रचना कराई,अर्थात् पुनः विभाजन के बीज बो दिए, जिसके कारण अनेक संघर्ष हुए और विसंगतियाँ पैदा हुईं।

कांग्रेस का यह ध्येय रहा है कि बाँटो और राज करो,क्योंकि इन्होंने मुसलमानों को अल्पसंख्यक बताकर समाज में पुनः विभाजन को बढ़ावा दिया,जिससे बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक विभाजन हो गया। इन्होंने मुसलमानों के लिए अल्पसंख्यक वित्त और विकास संस्थान बनाकर,विभाजन के ऐसे बीज बो दिए कि मुसलमानों को मामूली-सी ब्याज दर पर ऋण मिलता है और हिन्दू हाथ मलता रह जाता है। इस प्रकार विभाजन को गहरा कर दिया।

कांग्रेस दल के नेताओं ने पंजाब के तीन टुकड़े कराने के साथ-साथ असम के भी छह टुकड़े किए। कांग्रेस पार्टी के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहनसिंह ने बड़ी चतुराई से जैनों,सिक्खों और बौद्धों को अल्पसंख्यक दर्जा दे दिया,यद्यपि अनेक देश हितैषी जैन,बौद्ध और सिक्ख इस विभाजन को आज भी अनैतिक इसलिए मानते हैं कि वे विराट से वामन हो गए। तथापि कांग्रेस अपने समाज विभाजन के एजेंडे से पूरी तरह चिपकी हुई है।

दुर्भाग्य से प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कदाचित् वोट बैंक बनाने हेतु कांग्रेस के पदचिह्नों पर चलना आरम्भ किया। उन्होंने भारतीय जनसंघ के उस विचार को तिलांजलि दे दी,जिसके अनुसार छोटे राज्यों के पक्ष में जनसंघ नहीं था। उन्होंने तीन नए छोटे राज्य बना दिए,उन्होंने देश के भीतर विभाजन का बीज बोने का प्रयत्न किया,जैसा कि कुछ विद्वानों का यह मत इसलिए बना है कि उन्होंने हिंदी जाति(आचार्य रामविलास शर्मा के अनुसार)का विभाजन किया यानि मैथिली,डोगरी,नेपाली(पहाड़ी)आदि को संविधान की ८वीं अनुसूची में शामिल कर दिया। ये हिंदी भाषा समूह की उपभाषाएँ-बोलियाँ हैं।

सांस्कृतिक गौरव संस्थान ने केन्द्रीय गृहमंत्री को लिखा पत्र,इन्हें भी बाहर करने की मांग

अब पुनः कदाचित् वोट बैंक के लालच में कांग्रेस की श्रीमती मीरा कुमार जैसी नेता भोजपुरी सम्मेलन को प्रोत्साहित करके हिंदी के विभाजन की एक और नींव डालने के लिए प्रयत्नशील हैं। वे भोजपुरी को ८वीं अनुसूची में शामिल कराने की विभाजनकारी कोशिशों को हवा दे रही हैं,जिसमें भाजपा के भी कुछ छोटे नेता उनके अनुगामी बन रहे हैं।

यह कहना आवश्यक है कि हिंदी भाषा समूह के टुकड़े होने से हिंदी की संख्या शक्ति घटेगी,और अनेक विभाजनकारी तत्व इस स्थिति का लाभ उठाते हुए इसे संघ की राजभाषा के स्थान से हटाने की मुहिम नहीं छेड़ेंगे,ऐसा कहना कठिन है। इस प्रकार भाजपा कांग्रेसी विभाजनकारी मनोवृत्ति के चंगुल में फँसेगी। चूँकि,हिंदी भाषा संपूर्ण देश को जोड़ रही है और यह भाषा भारत की लम्बी विरासत को सहेज रही है,इसलिए इसकी विभाषाओं-बोलियों को ८वीं अनुसूची में शामिल करने की बजाए अब तक की गई गलती को सुधारने हेतु इसकी विभाषाओं को,जो ८वीं अनुसूची में है,उन्हें भी बाहर कर दिया जाए तो देशहित में होगा।

उल्लेखनीय है कि भोजपुरी के बोलने वालों की संख्या २०करोड़ बताकर झूठ फैलाया जा रहा है। इसी प्रकार सर ग्रियर्सन ने राजस्थानी नाम राजपूताना की बोलियों को दिया था,जो उन्होंने यह लिखकर दिया कि यह नाम उन्होंने गढ़ा है और इस नाम की कोई भाषा नहीं है,बल्कि राजपूताना की सब बोलियाँ हिंदी की बोलियों के समूह में हैं।

विश्वास है कि इस विषय में गम्भीर चर्चा के पश्चात् ऐसे प्रयत्नों को सदा के लिए बंद कर दिया जाएगा। इस संबंध में की गई कार्रवाई की जानकारी भिजवाने का कष्ट करें।

          (सौजन्य-वैश्विक हिंदी सम्मेलन,मुंबई)

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