हिन्दी का गुणगान करें

अवधेश कुमार ‘अवध’
मेघालय
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हिन्दी दिवस विशेष …………………….
हिन्दी ने सब-कुछ सिखलाया,हिन्दी का गुणगान करें,
जिसने जना चंद जगनिक कवि,उसका हम सम्मान करें।
खुसरो की ‘कह मुकरी’ जिसकी गोदी में मुस्काती हो-
ऐसी पावन भाषा से नित,नूतन नवल विहान करें।
हिन्दी का गुणगान करें…॥
पद्मावत रच दिए जायसी,बीजक दास कबीर रचे,
सागर सूर साख्य केशव सँग,राधारानी पीर रचे।
रामचरित मानस तुलसी कृत,पुरुषोत्तम की मर्यादा-
रामचन्द्रिका में केशव के,अलंकार का भान करें।
हिन्दी का गुणगान करें…॥
भूषण घनानन्द सेनापति,नानक मीरा पीर पगे,
वीर भक्ति वात्सल्य रीतिरत,धन्य सतसई नेह लगे।
इंसाअल्ला श्रीनिवास अरु भारतेन्दु की कविताई-
प्रियप्रवास हरिऔध रचित का आओ फिर से ध्यान करें।
हिन्दी का गुणगान करें…॥
प्रेमचंद दिनकर प्रसाद औ वर्मा पंत निराला गुप्त,
हिन्दी माता की संतानें,कभी नहीं होना रे सुप्त।
एक सूत्र में बँधकर भारत,हिन्दी का पर्याय हुआ-
अरुणांचल कश्मीर केरला,तमिलनाडु जयगान करें।
हिन्दी का गुणगान करें…॥
सवा अरब की जनवाणी में,हिन्दी भाषा बोल उठी,
अपनों और परायों  से पाए ज़ख़्मों को खोल उठी।
उपभाषा औ बोली के सँग,पुन: आज इठलाती है-
हिन्दी माथे की बिन्दी,हिय से हिन्दी का मान करें।
हिन्दी का गुणगान करें…॥
हिन्दी मात्र नहीं भाषा बस,यह माँ की शुचि बोली है,
वैज्ञानिक स्वर व्यंजन सज्जित,सुर सप्तक रंगोली है।
शब्दकोश उपभाषा बोली,आँचल में रख हरषाती-
वाणी यह है सवा अरब की,भारत-सी यह भोली है॥
हिन्दी ने सब-कुछ सिखलाया,हिन्दी का गुणगान करें॥
परिचय-अवधेश कुमार विक्रम शाह का साहित्यिक नाम ‘अवध’ है। आपका स्थाई पता मैढ़ी,चन्दौली(उत्तर प्रदेश) है, परंतु कार्यक्षेत्र की वजह से गुवाहाटी (असम)में हैं। जन्मतिथि पन्द्रह जनवरी सन् उन्नीस सौ चौहत्तर है। आपके आदर्श -संत कबीर,दिनकर व निराला हैं। स्नातकोत्तर (हिन्दी व अर्थशास्त्र),बी. एड.,बी.टेक (सिविल),पत्रकारिता व विद्युत में डिप्लोमा की शिक्षा प्राप्त श्री शाह का मेघालय में व्यवसाय (सिविल अभियंता)है। रचनात्मकता की दृष्टि से ऑल इंडिया रेडियो पर काव्य पाठ व परिचर्चा का प्रसारण,दूरदर्शन वाराणसी पर काव्य पाठ,दूरदर्शन गुवाहाटी पर साक्षात्कार-काव्यपाठ आपके खाते में उपलब्धि है। आप कई साहित्यिक संस्थाओं के सदस्य,प्रभारी और अध्यक्ष के साथ ही सामाजिक मीडिया में समूहों के संचालक भी हैं। संपादन में साहित्य धरोहर,सावन के झूले एवं कुंज निनाद आदि में आपका योगदान है। आपने समीक्षा(श्रद्धार्घ,अमर्त्य,दीपिका एक कशिश आदि) की है तो साक्षात्कार( श्रीमती वाणी बरठाकुर ‘विभा’ एवं सुश्री शैल श्लेषा द्वारा)भी दिए हैं। शोध परक लेख लिखे हैं तो साझा संग्रह(कवियों की मधुशाला,नूर ए ग़ज़ल,सखी साहित्य आदि) भी आए हैं। अभी एक संग्रह प्रकाशनाधीन है। लेखनी के लिए आपको विभिन्न साहित्य संस्थानों द्वारा सम्मानित-पुरस्कृत किया गया है। इसी कड़ी में विविध पत्र-पत्रिकाओं में अनवरत प्रकाशन जारी है। अवधेश जी की सृजन विधा-गद्य व काव्य की समस्त प्रचलित विधाएं हैं। आपकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी भाषा एवं साहित्य के प्रति जनमानस में अनुराग व सम्मान जगाना तथा पूर्वोत्तर व दक्षिण भारत में हिन्दी को सम्पर्क भाषा से जनभाषा बनाना है। 

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