हिन्दी पखवाड़ा सम्मेलन

मनोज कुमार ‘जानी’
फ़रीदाबाद (हरियाणा)
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हिंदी दिवस स्पर्धा विशेष………………
जैसे शादी-ब्याह का दिन नजदीक आते ही वर-कन्या के घर सजने लगते हैं,और शादी-ब्याह के बाद सब पहले जैसा हो जाता है,उसी तरह सितम्बर शुरू होते ही सभी सरकारी विभागों के राजभाषा विभाग के दफ्तर सजने- सँवरने और चहकने लगते हैं। जनवरी के ‘हैप्पी न्यू ईयर’ तथा फरवरी के ‘वेलेंटाइन-डे’  के बाद सितम्बर में जाकर पता चलता है कि भारत की राजभाषा हिन्दी है। अक्तूबर तक आते आते,हिन्दी उसी तरह गायब हो जाती है,जैसे विधवा के माथे से बिंदी।
सित. के शुरुआती दो सप्ताहों तक हिन्दी पखवाड़ा मनाया जाता है,और पानी पी- पी कर या तो अंग्रेजी को कोसा जाता है, या छाती पीट-पीटकर हिन्दी की दुर्दशा पर विधवा विलाप की रस्म निभाई जाती है। कुछ स्वनाम धन्य हिन्दी प्रेमी इसे हिन्दी की ‘बरसी’ समझकर मनाते हैं,तो कुछ हिन्दी साहित्य में अपना नाम चमकाने का सुअवसर समझकर इसका भरपूर फायदा उठाते हैं। हिन्दी पखवाड़े के दौरान हिन्दी प्रेमियों का वश चले तो अंग्रेजी साहित्य की पढ़ाई भी हिन्दी में ही करवाएँ। हिन्दी में ही खाएँ,हिन्दी में ही पीएं। ये अलग बात है की पीने में अंग्रेजी को तरजीह देते हैं।
वैसे पीने का साहित्य से बहुत ही गहरा नाता है। देशी पीकर आदमी अंग्रेजी बोलता है,और अंग्रेजी पीकर हिन्दी समेत सभी भाषाएं बोल सकता है। वैसे भी हमारे देश में,होश में हिन्दी बोलता ही कौन है ? मिलते ही शुरुआत के एक-दो वाक्य धुआंधार अंग्रेजी से शुरू होता है और तीसरे चौथे वाक्य तक जाते-जाते अपनी औकात यानी हिन्दी पर आ जाता है।
हाँ,तो बात हो रही थी हिन्दी पखवाड़े की। इन दिनों जितना नामी हिन्दी का साहित्यकार होता है,उतनी ही दूर विदेश में हिन्दी की सभाएँ करके हिन्दी को बढ़ाता है। जैसे छोटे और मझोले टाइप साहित्यकार सूरीनाम जाकर हिन्दी पखवाड़ा मनाते हैं,बड़े साहित्यकार अमेरिका या लंदन जाकर,लेकिन किसी की क्या मजाल कि दिल्ली में ऐसे सम्मेलन कर ले। आखिर दिल्ली वाले भूलकर भी हिन्दी का एक शब्द भी नहीं उगलते। इसलिए,अटलबिहारी जैसे हिन्दी के कवि और प्रधानमंत्री भी अमेरिका में तो हिन्दी में भाषण दे लेते हैं, लेकिन दिल्ली में,ना बाबा ना! आखिर दिल्ली में हिन्दी समझता कौन है ? इसीलिए उनको अपनी कविताएँ लिखने के लिए कुल्लू-मनाली जाना पड़ता था।
हाँ,तो हमारे संस्थान में भी हिन्दी का पखवाड़ा बड़े ही धूमधाम से मनाया गया। हालांकि,इस बात पर मतभेद है कि सरकारी पैसा फूँकने के लिए पखवाड़ा मनाया जाता है कि पखवाड़ा मनाकर पैसा फूंका जाता है,लेकिन सभी सरकारी संस्थानों का यह परम कर्त्तव्य बन गया है,इसलिए हमारे संस्थान ने भी अपना कर्त्तव्य निभाया। पखवाड़े के अंत में मंत्रालय के एक बड़े अधिकारी को पुरस्कार वितरण और समापन के लिए बुलाया गया। कार्यक्रम के अंत में मुख्य अतिथि महोदय ने अपना भाषण पढ़ा और हिन्दी का अन्तिम संस्कार और बरखी,सम्पन्न हुई। भाषण इस प्रकार था:
“रेस्पेक्टेड आफिसर्स,इम्प्लाईज़, राजभाषा डिपार्टमेन्ट के सभी आफिसर्स,जेंट्स एण्ड लेडीज़। जैसा कि ‘वेल नोन’ है,कि हम आज हिन्दी पखवाड़ा ‘सेलिब्रेट’ करने ‘कलेक्ट’ हुए हैं। यह ‘अनुअल’ ‘फंक्शन’ हमें हर साल ‘सेलिब्रेट’ करना चाहिए। इससे हिन्दी की ‘ग्रोथ’ होती है। हिन्दी ‘लैंगवेज़’ का ‘डेवलपमेंट’ होता है। ‘वर्कप्लेस’ में हिन्दी को ‘एक्सपैंड’ करने में ‘हेल्प’ होती है। हमारा ‘सेल्फ रेस्पेक्ट’ ‘इंक्रीज’ होता है। हिन्दी हमारी ‘मदर टंग’ है। हमें मैक्सिमम पासिबुल वर्क’ हिन्दी में करना चाहिए। हिन्दी से ही हमारी ‘सोसाइटी’ और ‘कंट्री’ का ‘प्रोग्रेस’ हो सकता है। आपने हिन्दी पखवाड़े में ‘पार्टीसिपेट’ किया, ‘प्राइज़’ लिए,यह ‘गुड’ ‘अटेम्प्ट’ है। मैं राजभाषा ‘डिपार्टमेन्ट’ का ‘थैंकफुल’ हूँ,जो मुझे ‘प्राइज़’ ‘डिस्ट्रीब्यूशन’ के लिए ‘इनवाइट’ किया। ‘थैंक्स टू आल।‘ थैंक्स टू राजभाषा डिपार्टमेन्ट।” इस तरह सभा सम्पन्न हुई और सभी लोग अगले पखवाड़े की जुगाड़ में लग गए।
(विशेष-व्यंग्य विधा और अंग्रेजी में हिन्दी दिवस मनाने की भावना की अभिव्यक्ति की वजह से ही इस रचना में अंग्रेजी शब्दों का उपयोग यथावत रखा गया है।प्र.सं.)
परिचय–मनोज कुमार की जन्म तारीख ७ जुलाई १९७६ और जन्म स्थान-जौनपुर (उत्तर प्रदेश)है। इनका साहित्यिक नाम `जानी` है। आप फ़रीदाबाद (हरियाणा) स्थित एनएचपीसी कालोनी में रहते हैं।वैसे स्थाई गाँव-भैंसौली (तहसील-शाहगंज,जौनपुर) है। इलाहाबाद से  अभियांत्रिकी (विद्युत)में स्नातक के साथ ही वाराणसी से एम.टेक.एवं एमबीए भी किया है। इनका कार्यक्षेत्र भूटान के ट्रोड्रग्सा (एनएचपीसी इकाई) में प्रबंधक का है। आपके लेखन की विधा-व्यंग्य, ग़ज़ल तथा कविता है। ‘चिकोटी’, `ठिठोली(व्यंग्य संग्रह-२०१५)` सहित `आईने के सामने(काव्य संग्रह)` प्रकाशित हैं। उपलब्धि यह है कि,प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं में १९९८ से सतत व्यंग्य रचनाएं छप(१००० से अधिक)रही हैं। आपको `चिकोटी` के लिए उत्तर प्रदेश सरकार से वर्ष २०१४ का `शरद जोशी सम्मान` मिला है।आप लेखन में ब्लॉग पर भी सक्रिय हैं। विशेषज्ञता व्यंग्य लेखन में हैl श्री कुमार के लेखन का उद्देश्य-सामाजिक और राजनीतिक जागरुकता पैदा करना है। आपके लेखन के लिए प्रेरणा पुंज सूर्य कुमार पाण्डेय हैंl 

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