हिन्दी साहित्य का भारतीय वैचारिक अधिष्ठान

डॉ. विकास दवे
इंदौर(मध्य प्रदेश )

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भारतवर्ष में साहित्य रचना के लिए ‘तपस्या‘ और ‘साधना‘ जैसे शब्दों का प्रयोग होता रहा है। हमारे यहां व्यास जी से लेकर अब तक की परम्परा सदैव ‘‘बहुजन हिताय,बहुजन सुखाय‘‘ नहीं अपितु ‘सर्वजन हिताय,सर्वजन सुखाय‘ रही है। यहाँ साहित्य का सृजन एकल नहीं सामूहिक दायित्व रहा है। वर्षों  तक यह तक स्मरण नहीं रख पाए कि भोजन-पानी कौन कर रहा है ? ग्रंथ पूर्ण होने पर परिचय हुआ अरे! यह तो उनकी ब्याहता अर्द्धांगिनी थी। पूरे सम्मान के साथ ग्रंथ का नामकरण किया भामती।
पिता-पुत्री की सहज जिज्ञासु चर्चा रोज होती रहती थी। विज्ञान के जटिल प्रश्न बेटी के और सहज सरल उत्तर पिता भास्कराचार्य जी के। विज्ञान के इतने सिद्धांत प्रकट हुए कि आज के वैज्ञानिक भी चमत्कृत रह जाएं। आश्रम की शिष्य मंडली इस चर्चा को ताड़ पत्रों पर अंकित करती रही और ग्रंथ तैयार होते ही उसका नामकरण पुत्री के नाम पर किया ‘लीलावती‘।
वास्तव में भारतीय साहित्य रचा गया कुछ मूलभूत हिन्दू सिद्धान्तों को आधार बनाकर,जिसके कारण वह सार्वकालिक तो रहा ही चिरजीवी भी बना। हमारे साहित्य का मूल आधार रहा ‘‘व्यक्ति से समष्टि और समष्टि से परमेष्टि‘‘ हमने कहा-‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः।‘‘ ‘ग्लोबल‘ शब्द के अविष्कार से हजारों वर्ण पहले हमने कहा ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम।‘‘ कण-कण में भगवान को देख हमने ही कहा-‘‘इदं खल्विदं ब्राहमं तभी तो हमारा साहित्य‘‘ सर्वभूत हितरत‘ की भावना से ओतप्रोत रहा।
और हम ओछे पुरस्कारों की लालसा में पश्चिम को ताकते रहे। इतना ही नहीं,हमने बिना कुछ सोचे-समझे शेक्सपीयर को पूरब का कालिदास तक कह डाला। क्या हमने कभी विचार किया कि कालीदास का नायक दुष्यंत नायिका शकुंतला को देखकर कहता है-‘‘यह ब्राम्हण नहीं,क्षत्रिय कन्य होगी अन्यथा मेरे मन में इसे देखकर कभी अनुराग पैदा नहीं होता।‘‘
और इधर शेक्सपीयर का नायक अपनी माँ को पहचाने बगैर उससे विवाह कर उसको अपनी पत्नी बना लेता है।
हमारे साहित्य की आत्मा सदैव राष्ट्र चिंतन रही है। यहां हर रचनाकार मातृभूमि को प्रणाम करना अपना प्रथम कर्तव्य मानता है। तभी तो रामायणकार कहते हैं-‘‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादऽपि गरीयसी।‘‘  महाभारतकार-‘‘भारत संकीर्तन‘‘ करते हैं। पुण्योद्गीत-‘‘समुद्र वसने देवी‘‘ कहकर भारत वंदना करते नजर आते हैं तो उधर शंकर देव-‘‘भलि भारत भूमि‘‘ का उदघोष कर राष्ट्रीय चेतना का शंख फूंकते हैं। यह क्रम बंकिम बाबू तक आता है। जब आनंद मठ में वे ‘वंदे मातरम्‘ का घोष करते हैं तो जन-जन यही घोष करते हुए राष्ट्र के लिए अपने-आपको समर्पित कर देता है,   लेकिन हमने साहित्य में आधुनिकता के नाम पर राष्ट्र,धर्म और संस्कृति के त्याग को ही प्रगतिशीलता बना लिया। हमारे लिए ये तीनों तत्व कभी पृथक नहीं रहे,  तभी तो १ वर्ष का कारागार भोग कर जब महर्षि अरविन्द वापस लौटे तो उत्तरपाड़ा में उन्होंने कहा था- ‘‘हमारा सनातन धर्म ही हमारे लिए राष्ट्रीयता है।‘‘
प्रगतिशीलता का तमगा लगाने के लिए सबसे पहली आवश्यकता लगती है सभी धर्मों को और सभी पंथों को समान माने का प्रचार करना,लेकिन वामपंथी भूल जाते हैं कि जिन पद्धतियों के सांमजस्य की बात वे आज करते हैं उसकी घोषणा हमारा हनुमन्नाष्टक वर्षों पहले कर चुका है। वह कहता है-‘यं शैवा: समुपासते शिव इति ब्रम्हमेति वेदांतिनो,
बौद्धा बुद्ध इति प्रमाणपटवः कर्तेति नैयायिकाः…..’
अर्थात्-शैव जिनकी उपासना शिवरूप में करते हैं वैदान्तिक ब्रम्हरूप में,बौद्ध बुद्ध के रूप में और प्रमाण कुशल नैयायिक जिन्हें कर्ता मानते हैं। जैन जिन्हें अर्हन् और मिमांसक जिन्हें कर्म बताते हैं वे
त्रैलोक्यपति भगवान हमको वांछित फल प्रदान करें।
और यही स्वर जैनाचार्यों के साहित्य से भी समानरूप से फूटता है-
‘भव बीजांकुर जनना रागाद्याः क्षयमुपगतायस्य,ब्रम्हमावा विष्णुर्वा हरो जिनो वा नमस्तस्यै।’
अर्थात्-पुनर्जन्म के बीजांकुर उत्पन्न करने वाले,रागादि दोष जिसके नष्ट हो चुके हों उसे मेरा नमस्कार है,वह चाहे ब्रम्हा हो,विष्णु हो,शिव हो या जिन यह पंथों और मार्गों की समानता हमें विरासत में मिली है।
शिव महिम्न स्त्रोत भी कहता है-
‘‘रूचिनां वैचित्र्याद् ऋजुकुटिल नाना पथजुषां,…
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव।‘‘
अर्थात्-अपनी भिन्न-भिन्न रूचि के अनुसार सीधे या टेढ़े मार्ग पर श्रद्धापूर्वक चलते हुए सभी साधक,हे प्रभु,तुम तक उसी प्रकार पहुंचेंगे जिस प्रकार पूर्व, पश्चिम,उत्तर,दक्षिण किसी भी दिशा की ओर बहने वाली नदी समुद्र तक ही पहुंचती है।
क्या यह समन्वय की उदात्त भावना नहीं है हमारे भारतीय वांग्मय की ? और यह भाव केवल यहीं तक सीमित नहीं रहा,हमने कहा-
‘‘बीधी भगवत मिलन की
निहचै एक न होय।‘‘
और यदि ईश्वर को हर मार्ग से पाया जा सकता है तो फिर भेद कैसा ? और यह सब कोई पाण्डित्य वाले ज्ञानियों ने ही नहीं,रामकृष्ण परमहंस जैसे अनपढ़ भक्त ने भी कहा-‘‘जतो मत,ततो पथ।‘‘
किन्तु इन बातों में ‘सेकुलरिज्म थोड़े ही झलकता है। उसके लिए इसी विचार को गाली देना,हिन्दुत्व को नकारना,सनातन धर्म की परम्पराआें को कोसना बहुत जरूरी हो जाता है। शायद आचार्य विनोबा भावे भी इस तथाकथित ‘सेकुलरिज्म‘ का मर्म समझ गए थे,तभी  तो उन्होंने इसे ‘ही‘ वाद और ‘भी‘ वाद का नाम दिया। वे समझ गए थे आक्रामकता किस वाद में है। हमारी परम्पराओं पर सर्वाधिक आक्रमण प्रगतिशील साहित्यकार करते हैं।जातिभेद के नाम पर,किन्तु ये ‘‘लाल झण्डे वाले‘ भूल जाते हैं कि मुगलकाल में भी वे रामानंद ही थे जिन्होंने दृढ़ता से कहा-
‘‘जाति-पांति पूछे नहीं कोई,
हरि को भजे सो हरि का होई।‘‘
और उन्हीं के शिष्य कबीर ने भी तो दोनों पक्षों को समान रूप से लताड़ लगाते हुए कहा था-
‘‘हमरै राम,रहीम,करीमा कैसो अलह राम सति सोई।
बिसमिल मेटि बिसंभर एकै और न दूजा कोई।‘‘
लेकिन मार्क्सवादी चश्मा कबीर को तो स्वीकार लेता है पर ज्यों ही उन्हें ‘‘एकं सद्वप्रा बहुधा वंदति‘‘ याद दिलाते हैं तो वे नाक सिकोड़कर कहते हैं-‘‘ये तो मनुवादियों का प्रपंच है।‘‘ ऐसी ही सोच वाले बाबर को फटकार लगाते हुए गुरू नानकदेव जी ने कहा था-‘‘हिन्दूस्थान संभालसि बोला।‘‘
हमारी इस उदार संस्कृति के प्रति ‘अपनों‘ का व्यवहार चाहे जो रहा हो  लेकिन बुद्धिशाली ‘परायों‘ ने भी हमारे साहित्य के इस गुणधर्म को स्नेह से गले  लगाने में संकोच नहीं किया। याद आते हैं रसखान जो बादशाहों का साथ छोड़ कृष्ण भक्ति में लीन होकर कह उठे थे-
‘‘या लकुटी अरू कामरिया पर,
राज तिहूंपुर को तजि डारौं।‘‘
और बादशाह वंश के अकबर के ही फुफेरे भाई अब्दुर्रहीम खानखाना माँ गंगा की हृदय से आराधना करते हैं तो भावों की निर्झरिणी कुछ यूँ बह उठती है-
‘‘अच्युत चरण तंरगिणी शिव सिर मालति माल, हरि न बनायो सुरसरी कीजौ इन्दवभाल।‘‘
अर्थात्-हे गंगा माँ! तुम मुझे विष्णु मत बनाना,क्योंकि आप उनके चरणों से निकली हो। मुझे शिव बनाना,ताकि आपको मस्तक पर धारण कर सकूं।
यह सदभाव और समरसता यहीं समाप्त नहीं होती। वे रामचरित मानस को वेद और कुरआन के समान बताने में भी नहीं हिचकते-
‘‘रामचरित मानस विमल,संतन जीवन-प्राण।
हिन्दूआन को वेद सम,जवनहिं प्रगट कुरान॥‘‘
आज के प्रगतिशील तो इस जीवटता का परिचय देनें में ही घबराएंगे। पता नहीं कौन-सा ठप्पा लग जाए,और हम किन्हीं बुकर पुरस्कारों की लिस्ट से बाहर हो जाएँ ?
मलिक मुहम्मद जायसी को किसी पुरस्कार की चाह नहीं थी,इसलिए खुलकर कह गए-
‘‘बिधना के मारग हैं तेते,
सरग नरवत तन रोवां जेते।‘‘
तब न तो कोई फतवा उन्हें डिगा पाया और न उन पर दक्षिणपंथी साहित्यकार का ठप्पा लगा। यदि ऐसी मानसिक गुलामी के शिकार होकर ही साहित्य सर्जन किया जाता तो क्या कभी मीर तकी मीर लिख पाते-
‘‘उसके फरोगे-हुस्न से झमके हैं सब चिराग,शम्मा हरम हो या कि दिया सोमनाथ का।‘‘
वास्तव में ऐसी हिम्मत दिखाने वाले ही असली सेकुलर साहित्यकार थे। याद करिए कृष्ण भक्ति में रमे नजीर अकबराबादी को जो मस्त हो गाते थे-
‘‘यारों सुनो य दधिके, लुटैय्या का बालपन,क्या-क्या कहूं मैं कृष्ण कन्हैया का बालपन।‘‘
पर लानत है इन वैचारिक आतंकवादियों को,जिन्होंने सत्ता की साठ-गांठ से साहित्य से यह सेकुलरपन पूरी तरह समाप्त कर एक अजीब-सी घिन आने वाली आक्रामक अभारतीय शैली विकसित कर दी और उसे दुशाला ओढ़ा दिया प्रगतिशीलता का।
भारतीय साहित्य में आज दो धड़े साफ दिखाई देते हैं। एक ओर रामानंद , कबीर,तुलसी,गुरूनानक,रसखान, अब्दूर्रहीम खानखना,जायसी,मीर,नजीर से लेकर आधुनिक युग के नरेन्द्र कोहली मृदुला सिन्हा,क्षमा कौल,नीरजा माधव और डॉ. देवेन्द्र दीपक जैसे साहित्यकार हैं जिन्हें ‘कम्यूनल‘ कहा जाता है। दूसरी ओर वह धड़ा है जिसके बड़े नाम लेने में ही मुझे कोफ्त होती है। इस सेकुलर धड़े ने अल्लामा इकबाल पैदा किए जिनकी दुकानें-‘‘सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा,हम बुलबुलें हैं उसकी,ये गुलिस्तां हमारा।‘‘ कहकर चलती रही लेकिन देश का विभाजन होते ही ये बुलबुलें उड़कर पाकिस्तान चली गई और वहां गाने लगी-
‘‘सारे जहां से अच्छा पाकिस्तां हमारा,
मुस्लिम हैं हम वतन है सारा जहां हमारा।‘‘
भारतीय जनमानस अब चेत रहा है। इस राष्ट्र को,इसके धर्म को और संस्कृति को आत्मसात करने वाले साहित्यकारों को वह पलकों पर बैठाएगा और भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की तरह कहेगा-‘‘ इन मुसलमान हरिजनन पे,
कोटिक हिन्दू वारिये।‘‘
और यदि वामपंथ के विषाणु से ग्रसित सोच रखकर ‘हंस‘ जैसी पत्रिका के संपादकीय में हनुमान को दुनिया का पहला आतंकवादी करने की हिमाकत की तो साहित्य के शरीर को पक्षाघात का शिकार होना ही इसकी नियति होगी। पाठक वामअंग को लकवाग्रस्त बनाने को सिद्ध है। सावधान!!!
परिचय-डॉ. विकास दवे का निवास इंदौर (मध्यप्रदेश)में है। ३० मई १९६९ को निनोर जिला चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) में जन्मे श्री दवे का स्थाई पता भी इंदौर ही है। आपकी पूर्ण शिक्षा-एम.फिल एवं पी-एच.डी. है। कार्यक्षेत्र-सम्पादक(बाल मासिक पत्रिका) का है। करीब २५ वर्ष से बाल पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्यरत हैं। सामाजिक गतिविधि में डॉ.दवे को स्वच्छता अभियान में प्रधानमंत्री द्वारा अनुमोदित एवं गोवा की राज्यपाल डॉ. मृदुला सिन्हा द्वारा ब्रांड एम्बेसेडर मनोनीत किया गया है। आप केन्द्र सरकार के इस्पात मंत्रालय की हिंदी सलाहकार समिति में सदस्य हैं। इनकी लेखन विधा-आलेख तथा बाल कहानियां है। प्रकाशन के तहत सामाजिक समरसता के मंत्रदृष्टा:डॉ.आम्बेडकर,भारत परम वैभव की ओर, शीर्ष पर भारत,दादाजी खुद बन गए कहानी (बाल कहानी संग्रह),दुनिया सपनों की (बाल कहानी संग्रह), बाल पत्रकारिता और सम्पादकीय लेख:एक विवेचन (लघु शोध प्रबंध),समकालीन हिन्दी बाल पत्रकारिता-एक अनुशीलन (दीर्घ शोध प्रबंध), राष्ट्रीय स्वातंत्र्य समर-१८५७ से १९४७ तक(संस्कृति मंत्रालय म.प्र.शासन के लिए),दीर्घ नाटक ‘देश के लिए जीना सीखें’,(म.प्र.हिन्दी साहित्य अकादमी के लिए) और हिन्दी पाठ्य पुस्तकों में ४ रचनाएं सम्मिलित होना आपके खाते में है। १००० से अधिक रचनाओं का प्रकाशन बाल पत्रिका सहित विविध दैनिक-मासिक पत्र-पत्रिकाओं में है,जबकि ५० से अधिक शोध आलेखों का प्रकाशन भी हुआ है।डॉ.दवे को प्राप्त सम्मान में बाल साहित्य प्रेरक सम्मान २००५,स्व. भगवती प्रसाद गुप्ता सम्मान २००७, अ.भा. साहित्य परिषद नई दिल्ली द्वारा सम्मान २०१०,राष्ट्रीय पत्रकारिता कल्याण न्यास,दिल्ली सम्मान २०११,स्व. प्रकाश महाजन स्मृति सम्मान २०१२ सहित बाल साहित्य जीवन गौरव सम्मान २०१८ प्रमुख हैं। आपकी विशेष उपलब्धि म.प्र. शासन के पाठ्यक्रम में नैतिक शिक्षा समाहित करने हेतु गठित सलाहकार समिति में सदस्य,म.प्र. शासन के पाठ्यक्रम में गीता दर्शन को सम्मिलित करने हेतु गठित सलाहकार समिति में सदस्य,म.प्र. साहित्य अकादमी के पाठक मंच हेतु साहित्य चयन समिति में सदस्य। होना है। आपको ७ वर्ष तक मासिक पत्रिका के सम्पादन का अनुभव है। अन्य में सम्पादकीय सहयोग दिया है। आपके द्वारा अन्य संपादित कृतियों में- ‘कतरा कतरा रोशनी’(काव्य संग्रह), ‘वीर गर्जना’(काव्य संग्रह), ‘जीवन मूल्य आधारित बाल साहित्य लेखन’,‘स्वदेशी चेतना’ और ‘गाथा नर्मदा मैया की’ आदि हैं। विकास जी की लेखनी का उद्देश्य-राष्ट्र की नई पौध को राष्ट्रीय चेतना एवं सांस्कृतिक गौरव बोध से ओतप्रोत करना है। विशेषज्ञता में देशभर की प्रतिष्ठित व्याख्यानमालाओं एवं राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों में १५०० से अधिक व्याख्यान देना है। साथ ही विगत २० वर्ष से आकाशवाणी से बालकथाओं एंव वार्ताओं के अनेक प्रसारण हो चुके हैं। आपकी रुचि बाल साहित्य लेखन एवं बाल साहित्य पर शोध कार्य सम्पन्न कराने में है।

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