हे कर्णावती! मत भेजना हुमायूँ को राखी

अवधेश कुमार ‘अवध’
मेघालय
********************************************************************

सावन के महीने में शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन राखी का त्यौहार न सिर्फ भारत,बल्कि कई अन्य देशों में भी धूमधाम से मनाया जाता है। रक्षा बंधन का यह पर्व सिर्फ भाई-बहन तक सीमित न होकर गुरु-शिष्य,पिता-पुत्री,वरिष्ठ- कनिष्ठ,मामी-भांजा,मनुष्य-वृक्ष आदि सामाजिक व पारिवारिक रिश्तों के बीच भी होता है। आज के समय में कई प्रकार की राखियों से बाजार भरा पड़ा है,किन्तु इन सबके बीच एक ही सत्य कायम है कि कोई भी व्यक्ति किसी भी व्यक्ति को इस भरोसे के साथ कच्चा धागा रूपी राखी बाँध सकता है कि समय आने पर वह उसकी रक्षा करेगा।
भारत भूमि का यह बहुत प्राचीन त्यौहार है। देव-दानव युद्ध में भी इसका प्रसंग आता है। राजा बलि की कहानी भी इससे सम्बंधित है। वृक्षों में भी कच्चा धागा लपेटने की प्राचीन परम्परा अब भी पाई जाती है। कृष्ण-द्रौपदी प्रसंग भी जगजाहिर है। सिकंदर की पत्नी ने महाराज पुरु को इस धागे से बाँधकर सिकंदर को पुरु से बचा लिया था। अन्य बहुत से ऐसे प्रसंग हैं जो वर्षों से इस पर्व को दर्शाते हैं। इनके साथ एक ऐतिहासिक प्रसंग भी है जिसके बारे में शायद ही कोई अनभिज्ञ हो। मेवाड़ के महाराज स्व. राणा सांगा की धर्मपत्नी कर्णावती और मुगल बादशाह हुमायूँ के बीच रक्षा का सम्बंध जिस तरह घटित हुआ था,उससे उन समस्त बहनों की आँखों से पट्टी हट जाएगी और उन समस्त भाइयों के दोहरे चरित्र उजागर हो जाएँगे।
सन् १५२७ ई. में खानवाँ के युद्ध में बाबर से लड़ते हुए राणा सांगा कुर्बान हुए थे। उनके दोनों बच्चे छोटे थे,जिनमें विक्रमादित्य की हत्या परिवार वालों ने कर दी थी और उदय को पन्ना धाय ने अपने पुत्र चंदन की बलि देकर बचा लिया था। रानी कर्णावती असहाय-सी हो गई थी। इधर बाबर की मृत्यु और उसके पुत्रों और रिश्तेदारों के आपसी झगड़े तथा शेरशाह की बढ़ती ताकत ने हुमायूँ को अमरकंटक के जंगलों की राह दिखाई थी। अमरकंटक के राणा ने सारी कहानी जानते हुए भी शरणार्थी हुमायूँ को परिवार सहित शरण दी थी। समय ने करवट ली,हुमायूँ फिर बादशाह बन गया और कर्णावती आन्तरिक और बाह्य शत्रुओं से घिरी रही।
हुमायूँ के बगावती भाइयों और दुश्मनों को गुजरात के बादशाह बहादुर शाह के यहाँ पनाह मिली थी। इस वजह से बहादुर शाह और हुमायूँ एक-दूसरे के जानी दुश्मन बने हुए थे। कर्णावती की मजबूरी को देखते हुए बहादुर शाह ने मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया। अमरकंटक में राणा के यहाँ शरणार्थी रहे हुमायूँ को भाई बनाकर चित्तौड़ के किले से रानी ने सहायतार्थ पत्र भेजा। हुमायूँ की मानवता हिलोरे मारने लगी और उसने सैन्य बल के साथ आगरा से चित्तौड़ के लिए अविलम्ब कूच कर दिया। उसे लगा कि इस सैन्य अभियान द्वारा वह राखी की लाज रख सकेगा और अपने दुश्मनों का नाश भी। बहादुर शाह को हुमायूँ की मंशा पता चल गई और उसने हुमायूँ के नाम एक पत्र भेजा। जब पत्र हुमायूँ को मिला,तो वह ग्वालियर तक पहुँच गया था।
पत्र में लिखा था कि ‘जब बात काफ़िर की हो तो सभी मुसलमानों को एक हो जाना ही अल्लाह का आदेश है’ और इसके साथ ही हुमायूँ के भीतर जागी राखी रूपी मानवता मज़हबी आग में जलकर राख हो गई,एवं वह इरादा बदलकर वहीं डेरा जमाए रहा।
इधर,सन् १९३५ में बहादुर शाह से लड़ते हुए सारे पुरुष खप गए। महिलाओं ने पल-पल बादशाह-भाई की राह निहारी, किन्तु सब सिफर रहा। अपने नन्हें तकरीबन ३००० बच्चों को महिलाओं ने खाईं या कुएँ में फेंककर मार डाला,  ताकि ये मुगलों के हाथ न लगें। अन्तत: १३००० क्षत्राणियों ने जौहर का व्रत किया इस आरजू के साथ कि उनका सशक्त व समर्थ भाई पहुँचता ही होगा…..। सब मिलाकर लगभग ३२००० लोगों ने अपने प्राण न्योछावर किए। तथाकथित भाई हुमायूँ वहाँ पहुँचा और लूट-पाटकर लौटती सेना के पीछे कुछ वक्त भी जाया किया,लेकिन तब तक पूरा एक साल बीत चुका था…..जौहर के ज्वाला की राख भी ठंडी होकर उड़ चुकी थी। बादशाह कर वसूली में लगा रहा।
आज के समय में हुमायूँ जैसे या उससे भी पतित और स्वार्थी भाइयों की बड़ी संख्या समाज में भोली-भाली बहनों की तलाश में है,किन्तु इसी समाज में उनसे बड़ी संख्या में राखी की लाज रखने वाले करोड़ों रक्षक भी मौजूद हैं।धर्म,मजहब, जाति,क्षेत्र और आर्थिक स्तर इसमें कहीं भी बाधक नहीं होना चाहिए। इसलिए, आवश्यक है कि राखी बाँधने वाले और बँधवाने वाले उभय पक्ष,राखी की महत्ता को न सिर्फ कायम रखें,बल्कि निभाएँ, बढ़ाएँ और सर्वव्यापी बनाएँ। यह त्यौहार तभी सार्थक होगा,जब कोई भी कलाई राखी के बिना सूनी न होगी और कोई भी व्यक्ति असुरक्षित न रहेगा।

परिचय-अवधेश कुमार विक्रम शाह का साहित्यिक नाम ‘अवध’ है। आपका स्थाई पता मैढ़ी,चन्दौली(उत्तर प्रदेश) है, परंतु कार्यक्षेत्र की वजह से गुवाहाटी (असम)में हैं। जन्मतिथि पन्द्रह जनवरी सन् उन्नीस सौ चौहत्तर है। आपके आदर्श -संत कबीर,दिनकर व निराला हैं। स्नातकोत्तर (हिन्दी व अर्थशास्त्र),बी. एड.,बी.टेक (सिविल),पत्रकारिता व विद्युत में डिप्लोमा की शिक्षा प्राप्त श्री शाह का मेघालय में व्यवसाय (सिविल अभियंता)है। रचनात्मकता की दृष्टि से ऑल इंडिया रेडियो पर काव्य पाठ व परिचर्चा का प्रसारण,दूरदर्शन वाराणसी पर काव्य पाठ,दूरदर्शन गुवाहाटी पर साक्षात्कार-काव्यपाठ आपके खाते में उपलब्धि है। आप कई साहित्यिक संस्थाओं के सदस्य,प्रभारी और अध्यक्ष के साथ ही सामाजिक मीडिया में समूहों के संचालक भी हैं। संपादन में साहित्य धरोहर,सावन के झूले एवं कुंज निनाद आदि में आपका योगदान है। आपने समीक्षा(श्रद्धार्घ,अमर्त्य,दीपिका एक कशिश आदि) की है तो साक्षात्कार( श्रीमती वाणी बरठाकुर ‘विभा’ एवं सुश्री शैल श्लेषा द्वारा)भी दिए हैं। शोध परक लेख लिखे हैं तो साझा संग्रह(कवियों की मधुशाला,नूर ए ग़ज़ल,सखी साहित्य आदि) भी आए हैं। अभी एक संग्रह प्रकाशनाधीन है। लेखनी के लिए आपको विभिन्न साहित्य संस्थानों द्वारा सम्मानित-पुरस्कृत किया गया है। इसी कड़ी में विविध पत्र-पत्रिकाओं में अनवरत प्रकाशन जारी है। अवधेश जी की सृजन विधा-गद्य व काव्य की समस्त प्रचलित विधाएं हैं। आपकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी भाषा एवं साहित्य के प्रति जनमानस में अनुराग व सम्मान जगाना तथा पूर्वोत्तर व दक्षिण भारत में हिन्दी को सम्पर्क भाषा से जनभाषा बनाना है। 

Hits: 30

आपकी प्रतिक्रिया दें.