हे बुद्ध कहाँ हो तुम

कुमारी अर्चना
 पूर्णियाँ(बिहार)
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आम्रपाली को शरण दी
फिर मैं कहाँ जाऊँ,
वो गणिका थी
मैं एक साधारण-सी स्त्री,
उसके पास चयन की स्वत्रंता थी
मेरे पास सारे विकल्प बंद हैं।
वशीभूत थी संसारिक माया में
बौद्ध धर्म में ज्ञान दे उधार किया,
हे प्रभु मेरा भी कल्याण करो
मुझे भी अपने शरण में लो।
मैं दलित ऊपर स्त्री बनी
भोग की वस्तु में ढली,
हिंदू कहता मेरी बनो
इसी धर्म में जन्म लिया,
मरते दम तक मेरी संपत्ति हो।
मुस्लिम कहता मेरी बनो
अल्लाह हमारा एक है,
जाति में हम ‘इस्लाम’ है
मिल बाँट सब खाएंगे।
क्रिश्चियन कहता मेरी बनो
सब धर्मों से अच्छा हूँ,सच्चा हूँ।
तेरा भूखा पेट मेैं भरूँगा
तेरा नंगा तन मैं ढकूँगा,
तेरे सिर में छत में दूँगा
तेरे बच्चों को मुफ्त में शिक्षा दूँगा,
तेरा उपचार भी करवाऊँगा
तुम्हारे प्राणों की सुरक्षा में
ब्रिटिश सम्राज्ञी से करवाऊँगा,
बस मेरा धर्म अपना लो।
हे बुद्ध तुमने कहा था
संसार दु:खों से भरा पड़ा है,
केवल मेरा ही धर्म तुम्हें मोक्ष देगा
मुक्ति के लिए तुम सब,
बौद्ध धर्म की शरण में आओ।
फिर क्यों तुम्हारा धर्म भी
मुझ स्त्री को मुक्ति दे नहीं पा रहा,
मेरी ही देह बाधक बनकर
तेरे धर्म में भी आ रही,
कोई भी धर्म मुझे शरण देकर भी
मेरा सम्मान की रक्षा नहीं कर पा रहा।
क्योंकि,स्त्री की कोई जाति
कोई धर्म नहीं होता है,
कोई रक्त संबंध नहीं होता
वो तो पुरूष लिए वस्तु तुल्य
उसका ‘निर्वाण’ भी मुक्ति के
बाद भी संभव नहीं,
क्योंकि उसकी देह
शव बनकर भी भोग्य है॥
परिचय-कुमारी अर्चना राजनीति विज्ञान में शोधार्थी हैं,साथ ही लेखन जारी है। आप बिहार राज्य से वास्ता रखती हैं। रचनाकार कुमारी अर्चना का जन्मस्थान-पूर्णिया तथा जन्म तिथि-११ जनवरी है। आपका वर्तमान निवास और स्थाई पता-मिरचाई बाड़ी, कटिहार(बिहार)है। शिक्षा-इतिहास (ऑनर्स)एम.ए.(राजनीति विज्ञान),नेट सहित हिंदी साहित्य है। काव्य मंच सहित आकाशवाणी-दूरदर्शन-मंच और आकाशवाणी पूर्णिया(२बार)से आपकी रचनाओं का प्रसारण हो चुका है। इनकी रचनाएं अखबारों के साथ ही ई-पत्रिका में भी छपी हैं,तो वेब पोर्टल पर भी स्थान मिला है। साझा काव्य संग्रह-काव्याकुंर, रजनीगंधा,नारी काव्य धारा,अंर्तराष्ट्रीय काव्य संकलन के अतिरिक्त काव्य संकलन-माँ,जीवंत हस्ताक्षर तथा स्वप्नगंधा आदि में भी आपकी रचनाएं आई हैं। 

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